भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पञ्चम उच्छ्वासः २४६ केनचित्पिशाचवार्ता विवृण्वता, केनचित्कार्तान्तिकादेशान्प्रकाशयता, केनचिदुपलिङ्गानि गायता, अन्येनानित्यतां भावयता, संसारं चापवदता, कलिकालविलसितानि च निन्दता, दैवं चोपालभमानेनापरेण धर्माय कुप्यता, राजकुलदेवताश्चाधिक्षिपता, अपरेण क्लिष्टकुलपुत्रकभाग्यानि गर्हयता, बाह्यपरिजनेन कथ्यमानकष्टपार्थिवावस्थं राजकुलं विवेश। अविरलबाष्पपयःपरिप्लुतलोचनेन पितृपरिजनेन वीक्ष्यमाणो विवि- धौषधिद्रव्यद्रवगन्धगर्भमुक्तकथां क्वाथानां सर्पिषां तैलानां च प्रपच्य- मानानां गन्धमाजिघ्रन्नवाप तृतीयं कक्ष्यान्तरम्। तत्र चातिनिःशब्दे गृहावग्रहणीप्रापिबहुवेत्रिणि, त्रिगुणतिरस्करिणी- तिरोहितसुवीथीपथे, पिहितपक्षद्वारके, परिहृतकवाटरटिते, घटितगवाक्ष- रक्षितमरुति, दूयमानपरिचारके, चरणताडनस्वनत्सोपानप्रकुपितप्रतीहारे, निभृतसंज्ञानिर्दिश्यमानसकलकर्मणि, नातिनिकटोपविष्टकङ्कटिनि, कोण- स्थिताह्वानचकिताचमनकग्राहिनि, चंद्रशालिकालीनमूकमौललोके, महा- द्रवो रसः। तत्रेत्यादौ। तत्र चैवंविधे धवलगृहे स्थितमीदृशं पितरमद्राक्षीदिति सम्बन्धः। गृहावग्रहणी देहलीद्वारारम्भदेशः। वेत्रिणो द्वाःस्थाः। तिरस्करिणी जवनिका। सुवीथी धवलगृहस्याभ्यन्तरीकृता। 'प्रच्छन्नमन्तर्द्वारं यत्पक्षद्वारं तदुच्यते'। घटितो रक्षितः। निभृतं गुप्तम्। आचमनवाही पानीयहारकः। चन्द्रशालिका धवलगृह- दैवज्ञों की कही हुई बात सुनाता; कोई उत्पातों की चर्चा करता; कोई कहता जीवन अनित्य है; कोई संसार को दुःखमय बताता; कोई कलिकाल के कार्यों की निन्दा करता; कोई दैव को दोषी ठहराता; कोई धर्म को ही उलाहना देता; कोई राजकुल के देवताओं की निन्दा करता; कोई कष्ट में पड़े हुए कुलपुत्रों के भाग्य की निन्दा करता। आँसू से भरे नेत्र वाले पिता के परिजनों द्वारा देखे गए, अनेक प्रकार की औषधि के द्रव की गन्ध से मिले हुए, औटाए जाते हुए काथों और पकाए जाते हुए तेल की गन्ध सूँघते हुए देव हर्ष तीसरी ड्योढ़ी में जा पहुँचे। वहाँ हर्ष ने पिताजी को धवलगृह में पड़े हुए देखा। धवलगृह की देहली पर अनेक वेत्रधारी पुरुष कड़ाई के साथ पहरा दे रहे थे। उसके भीतर की लम्बी-चौड़ी वीथियाँ तिहरे पर्दे से पीछे छिपी थीं। भीतर प्रवेश करने का पक्षद्वार बन्द था। सावधानी से किवाड़ लगाए-खोले जाते थे जिससे आवाज न हो। हवा से रक्षा के लिए खिड़कियाँ बन्द थीं। सेवा में लगे हुए परिचारक दुखी थे। सीढ़ियों पर चढ़ने-उतरने से किसी