भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 506 में से

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पृष्ठ 303

२५८ हर्षचरितम् मानश्च दीयमानसर्वस्वम्, पूज्यमानकुलदैवतम्, प्रारब्धामृतचरुपचन- क्रियम्, क्रियमाणषडाहुतिहोमम्, हूयमानपृषदाज्यलवलिप्रप्रचलदूर्वापल्ल- वम्, पठ्यमानमहामायूरीप्रवर्त्यमानगृहशान्तिनिर्वर्त्यमानभूतरक्षाबलि- विधानम्, प्रयतविप्रप्रस्तुतसंहिताजपं जप्यमानरुद्रैकादशीशब्दयमानशि- वगृहम्, अतिशुचिशैवसंपाद्यमानविरूपाक्षक्षीरकलशसहस्रस्नपनम्, अजि- रोपविष्टैश्चानासादितस्वामिदर्शनदूयमानमान सैरभ्यन्तरनिष्पतितनिकटव- र्तिपरिजननिवेद्यमानवातैर्वार्तीभूतस्नान भोजनशयनैरुज्झितात्मसंस्कारम- लिनवेशैर्लिखितैरिव निश्चलैरनरपतिभिर्नीयमाननक्तंदिवं दुःखदीनवदनेन च प्रघणेषु बद्धमण्डलेनोपांशुव्याहृतैः केनचिच्चिकित्सकदोषानुद्भावयता, केनचिदसाध्यव्याधिलक्षणपदानि पठता, केनचिद्दुःस्वप्नानावेदयता, सदृघ्याज्ये' इति कोशः । महामायूरी बौद्धविद्या । शैवमन्त्र इति केचित् । संहिता संहिंतारूपो वेदपाठः । रुद्रैकादशी शिवमन्त्रः । वार्तांत आगतं वार्तीभू- तम् । प्रघणो बहिर्द्वारै कदेशः । कार्तान्तिको दैवज्ञः । उपलिङ्गान्यत्पाताः । अप- वदता निन्दता । करने लगे और धीरे धीरे उन्होंने राजकुल में प्रवेश किया । वहां सब कुछ दान में दिया जा रहा था । कुलदेवताओं की पूजा हो रही थी । शान्ति के लिए चरु पकाने का कार्य आरम्भ किया जा रहा था । छह आहुतियों वाला हवन किया जा रहा था । दही और घी का पृषदाज्य हवन किया जा रहा था जिसके छींट दूबों पर पड़ गए थे । महामायूरी नामक बौद्धों की विद्या का पाठ चल रहा था । गृहशान्ति का विधान हो रहा था और भूतों से रक्षा के लिए बलि दी जा रही थी। पवित्र ब्राह्मण संहिनामन्त्रों का जप करने में लगे थे । शिव के मन्दिर में रुद्र-एकादशी का जप बैठाया गया था। अत्यन्त पवित्र होकर शैव लोग भगवान् शङ्कर को दूध के हजार घड़ों से स्नान कराने में लगे थे । राजकुल के बाहर आँगन में राजा लोग दिन-रात चित्रलिखित की भाँति निश्चल होकर जमा रहते थे । महाराज के दर्शन न पाने से उनका मन खिन्न था । भीतर से निकलते हुए परिजनों द्वारा महाराज की खबर पाते थे । नहाना, सोना, खाना, सब कुछ भूल चुके थे। प्रसाधन के छूट जाने से उनका वेश मलिन हो गया था। दुःख से मुर्झाए हुए काम करने वाले नौकर द्वार से सटे हुए कोठों में एक जगह जुट कर कष्ट में पड़े हुए राजा की हालत के बारे में कानाफूसी कर रहे थे। कोई कहता, वैद्यों से ठीक-ठीक चिकित्सा न हो सकी; कोई व्याधि को असाध्य कह कर उसके लक्षण बताता; कोई अपने खराब-खराब स्वप्नों की चर्चा करता; कोई सुनाता कि पिशाच ने राजा को धरा है; कोई

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