भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 506 में से

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पृष्ठ 302

पञ्चम उच्छ्वासः २५७ प्रविशन्नेव च विपणिवर्त्मनि कुतूहलाकुलबहलबालकपरिवृतमूर्ध्व- यष्टिविष्कम्भवितते वामहस्तवर्तिनि भीषणमहिषाधिरूढप्रेतनाथसनाथे चित्रवति पटे परलोकव्यतिकरमितरकरकलितेन शरकाण्डेन कथयन्तं यमपट्टिकं ददर्श। तेनैव च गीयमानं श्लोकमशृणोत्- मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च। युगे युगे व्यतीतानि कस्य ते कस्य वा भवान् ॥ ३ ॥ इति। तेन चाधिकतरमवदीर्यमाणहृदयः क्रमेण राजद्वारं प्रतिषिद्धसकललोक- प्रवेशं ययौ। तुरगादवतीर्णश्चाभ्यन्तरान्निष्क्रामन्तमप्रसन्नमुखरागमन्मुक- मिवेन्द्रियैः सुषेणनामानं वैद्यकुमारकमद्राक्षीत् । कृतनमस्कारं च तम- प्राक्षीत्-‘सुषेण ! अस्ति तातस्य विशेषो न वा ?' इति। सोऽब्रवीत्- 'नास्तीदानीं यदि भवेत्कुमारं दृष्ट्वा' इति । मन्दं मन्दं द्वारपालैः प्रणम्य- विष्कम्भोऽवष्टम्भः । वितताः प्रसारिताः । व्यतिकरो वृत्तान्तः । यमपट्टेन जीवति यमपट्टिकः । मन्दं मन्दमित्यादौ राजकुलं विवेशेति संबन्धः । अमृतचरुः शान्त्यर्थं चरुः । 'प्रजापतये स्वाहा' इति षण्णां देवतानां नाम गृहीत्वा षण्णामेवाहुतीनां प्रक्षेपः षडाहुतिहोम उच्यते । दधिघृते एकीकृत्य पृषदाज्यम् । 'पृषदाज्यं विलासों ने अपने अधीन कर लिया हो। वह बिल्कुल सुनसान-सा, सुप्त-सा, लुटा हुआ- सा, लज्जित, ठगा-सा, मूर्च्छित सा हो रहा था । बाजार में घुसते ही उन्होंने यमपट्टिक को देखा । तमाशा देखने के कुतूहल से सड़क के बहुत से लड़कों ने उसे घेर रखा था। उसने बायें हाथ में ऊँची लाठी के ऊपरी सिरे पर चित्रपट फैला रखा था जिसमें भयङ्कर भैंसे पर सवार यमराज का चित्र लिखा था । वह दूसरे हाथ में सरकण्डा लिए हुए लोगों को चित्र दिखाता और परलोक में मिलने वाली नरकयातनाओं का बखान कर रहा था । उसी के द्वारा गाए गए श्लोक को सुना- 'हजारों माता-पिता और सैकड़ों पुत्र कलत्र युग-युग में हुए और बीत गए । हमेशा के लिए वे किसके हुए और आप किसके हैं ?' उसे सुन कर उनका हृदय मानों विदीर्ण हो गया । क्रम से सब लोगों के प्रवेश को रोककर राजद्वार पर पहुँचे । जैसे ही घोड़े से उतरे, भीतर से निकलते हुए सुषेण नामक वैद्यकुमार को देखा, जिसका मुख अप्रसन्न था और इन्द्रियाँ बिलकुल काम न कर रही थीं । नमस्कार के बाद उससे पूछा—'सुषेण, पिताजी की हालत में सुधार है या नहीं ?' वह बोला—'अभी तो नहीं है, आपके मिलने से कदाचित् हो जाय ।' द्वारपाल उन्हें प्रणाम १७ ह० च०

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