भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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चतुर्थ उच्छ्वासः २३६ शोष्यमाणैः शुष्कैश्च कुटिलक्रमरूपक्रियमाणपल्लवपरभागैरपरैरारब्धकुङ्कु- मपङ्कस्थासकच्छुरणैरपरैरुद्भुजभुजिष्यभज्यमानभङ्गुरोत्तरीयैः क्षौमैश्च बाद- रैश्च दुकूलैश्च लालातन्तुजैश्चांशुकैश्च नेत्रैश्च निर्मोकनिभैरकठोररम्भागर्भ- कोमलैर्निःश्वासहार्यैः स्पर्शानुमेयैर्वासोभिः सर्वतः स्फुरद्भिरिन्द्रायुधस- हस्रैरिव संच्छादितम्, उज्ज्वलनिचोलकावगुण्ठ्यमानहंसकुलैश्च शयनीयै- स्तारामुक्ताफलोपचीयमानैश्च कञ्चुकैरनेकोपयोगपाट्यमानैश्चापरिमितैः प- ट्पटीसहस्रैरभिनवरागकोमलदुकूलराजमानैश्च पटवितानैः स्तवरकनिव- हनिरन्तरच्छाद्यमानसमस्तपटलैश्च मण्डपैरूचित्रनेत्रपटवेष्ट्यमानैश्च स्त- म्भैरुज्ज्वलं रमणीयं चौत्सुक्यदं च मङ्गल्यं चासीद्राजकुलम् । देवी तु यशोमती विवाहोत्सवपर्याकुलहृदया हृदयेन भर्तरि, कुतूहलेन क्षौमैः क्षुमाविकारैः । बादरैः कार्पासैः । लालातन्तुजैः कौशेयैः । नेत्रैः पुट्टैः (?) । निचोलकैर्वस्तुरूपकविशेषैः । स्तवरकं वस्त्रभेदः । वितानकं करकम् । पटलं छाद- नम् । उज्ज्वलं भ्राजिष्णु । कोने स दूसरे कोने तक टेढ़ी, ठप्पों से बनाई जाने वाला फूल-पत्तियों का रेखाकृतयाँ एक रङ्ग की पृष्ठभूमि पर दूसरे रंग में तैयार होने लगीं। कुछ वस्त्रों को गीले कुङ्कुम में रंगे हाथ से चित्तियाँ छोपकर मांगलिक बनाया जा रहा था। कुछ को सेवक लोग उठे हुए हाथों से चुटकी दबाकर उत्तरीय या ऊपरने की तरह प्रयुक्त वस्त्रों में चुन्नट डालकर उन्हें मरोड़ी देकर देख रहे थे। क्षौम, बादर (कपास के बने कपड़े), दुकूल, लाला- तंतुज (रेशमी) अंशुक और नेत्र आदि कई प्रकार के वस्त्र थे, जो साँप की केंचुली के समान हल्के केले के खम्भे की भीतरी पात के समान कोमल, साँस की हवा से भी उड़ जाने वाले एवं केवल छूकर ही अनुमान करने योग्य थे। हजारों इन्द्रायुष के समान ऐसे वस्त्रों से राजकुल ढंक रहा था। दान-दहेज के लिए बनाये गये पलंग पर सफेद चादरें बिछाई गयी थीं और हंसों की पंक्तियाँ लकड़ी में खोदकर बनायी गयीं थीं। पहनने के लिये जो कंचुक तैयार किये जा रहे थे, उन पर चमकीले मोतियों से कढ़ाई का काम किया गया था। अनेक प्रकार के उपयोग में आने वाली बहुत सी कपड़ों की पट्टियां चीर-चीर कर बनायी जा रही थीं। कपड़े के चन्दोवे में नये एकरङ्ग के दुकूल लगाये जा रहे थे। मढ़वे की छाजन फूल-पत्तियों से ढँक गयी थी। मण्डप के खम्भों में रंगीन नेत्र नामक वस्त्र लपेटकर बाँधे जा रहे थे। इस प्रकार राजकुल का यह दृश्य चकमक, रमणीय, भाँति-भाँति के कुतूहलों से भरा हुआ और मांगलिक हो गया था। रानी यशोवती को विवाह के बहुविध कामों में चैन नहीं मिलती थी। वह पति