भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 283

२३८ हर्षचरितम् वाभिः सिन्दूररजोराजिराजितललाटाभिर्वधूबरगोत्रग्रहणगर्भाणि श्रुतिसुभ- गानि मङ्गलानि गायन्तीभिर्बहुविधवर्णकादिग्धाम्‍गुलीभिर्ग्रीवासूत्राणि च चित्रयन्तीभिश्चित्रतालेख्यकुशलाभिः कलशांश्च धवलिताञ्शीतलशारा- जिरश्रेणीञ्च मण्डयन्तीभिरभिञ्जपुटकपायतूलपल्लवांश्च वैवाहिककङ्कणोर्णा- सूत्रसंनाहांश्च रञ्जयन्तीभिर्बलाशनाघृतघनीकृतकुङ्कुमकल्कमिश्रितांश्चाङ्ग- रागांल्लावण्यविशेषकृन्ति च मुखालेपनानि कल्पयन्तीभिः ककोलमित्राः सजातीफलाः स्फुरत्स्फीतस्फाटिककर्पूरशकलखचितान्तराला लवङ्गमाला रचयन्तीभिः समन्तात्सामन्तसीमन्तिनीभिर्व्याप्तम्, बहुविधभक्तिनिर्मा- णनिपुणपुराणपौरपुरंध्रीबध्यमानैर्बद्धैश्चाचारचतुरान्तःपुरजरतीजनितपूजा- राजमानरजकरज्यमानै रक्तैश्चोभयपटान्तलग्नपरिजनप्रेङ्खोलितैश्छायासु कणाः । आबद्धकक्ष्यैः कृतोद्योगैः । मसृणयद्भिश्चिक्कणीकुर्वद्भिः । आतर्पणं पिष्टम् । उत्तम्भयद्भिरूर्ध्वीकुर्वद्भिः । गोत्रं नाम । दिग्धा उपलिप्ताः । शीतलपक्वम् । शाराजिरं शरावम् । अभिञ्जपुटो वंशादिमयश्चतुष्कोणः पाटलाकृतिर्जालकैः क्रियते । तच्छिद्रान्तरपूरणाय कर्पासतूलपल्लवा रच्यन्ते । कङ्कणः प्रतिसरः । बलाशना पुष्पा- ख्यौषधिः तत्पक्वं घृतं रक्षार्थं क्रियते । स्फाटिककर्पूराख्यः कर्पूरभेदः । भक्तिर्वि- च्छित्तिः । कुटिलः क्रमो येषां तैः । भुजिष्यैर्भृत्यैः । भज्यमानत्वं मुष्टिदानम् । गीत गा रही थीं, कुछ तरह-तरह के रंगों में उंगलियों बोर कर कण्ठियों के डोरों पर भाँति-भाँति की बिन्दियाँ लगा रही थीं, चित्र-विचित्र फूल-पत्तियों के काम करने में चतुर कुछ स्त्रियाँ सफेदी किए हुए कलसों पर और सरइयों पर चित्र लिख रही थीं, • कुछ बाँस की तीलियों या सरकण्डे के बने खारे को सजाने के लिये कपास के छोटे-छोटे गुच्छे और ब्याह के कंगनों के लिए ऊनी और सूती लच्छियाँ रँग रही थीं, कुछ बलाशना नामक औषधि घी में पकाकर और उसे पिसे हुए कुङ्कुम में मिलाकर उबटन एवं सुन्दरता • बढ़ाने वाले मुखालेपन तैयार कर रही थीं, कुछ कङ्कोल-जायफल और लौंग की मालायें बीच-बीच में स्फटिक जैसे श्वेतकपूर की चमकदार बड़ी डलियां पिरोकर बना रही थीं । बहुत प्रकार की भक्तियों के निर्माण में नगर की वृद्ध चतुर स्त्रियों या पुरखिनें बांधनू की रंगाई के लिए कपड़ों को बाँध रही थीं, कुछ कपड़े बाँधे जा चुके थे । अन्तःपुर की बड़ी-बूढ़ी स्त्रियों के द्वारा रंगने वालों को जो नेग या पूजा-भेंट दी जा रही थी उससे प्रसन्न होकर वे लोग उन वस्त्रों को रँग रहे थे, एवं जो रँगे जा चुके थे उन्हें दोनों सिरों पर • पकड़कर परिजन लोग झकझोर कर छाया में सुखा रहे थे और कुछ सूख गए थे । एक