भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 506 में से

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पृष्ठ 282

ण्प्रक्षाल्यमानकुसुम्भसंभाराम्भःप्लवपूरज्यमानजनपादपल्लवम् , निरू- प्यमाणयौतकयोग्यमातङ्गतुरङ्गतराङ्किताङ्गनम् , गणनाभियुक्तगणकगणगृह्य- माणलग्नगुणम् , गन्धोदकवाहिमकरमुखप्रणालीपूर्यमाणक्रीडावापीसमू- हम् , हेमकारचक्रप्रक्रान्तहाटकघटनटङ्कारवाचालितालिन्दकम् , उत्था- पिताभिनवभित्तिपात्यमानबहलवालुकाकण्ठकालेपाकुलालेपकलोकम् , च- तुरचित्रकरचक्रवाललिख्यमानमङ्गल्यालेख्यम् , लेप्यकारकदम्वकक्रियमाण- मृन्मयमोनकूर्ममकरनारिकेलकदलीपूगवृक्षकम् , क्षितिपालैश्च स्वयमाबद्ध- कक्ष्यैः स्वाम्यर्पितकर्मशोभासंपादनाकुलैः सिन्दूरकुट्टिमभूमीश्च मसृणय- द्भिर्विनिहितसरसातर्पणहस्तान्विन्यस्तालक्तकपाटलांश्च चूताशोकपल्लवला- ञ्छितशिखरामुद्वाहवितर्दिकास्तम्भानुत्तम्भयद्भिः प्रारब्धविविधव्यापारम् , आसूर्योदयाच्च प्रविष्टाभिः सतीभिः सुभगाभिः सुरूपाभिः सुवेशाभिरविध-


र्णितः । कुसुम्भकं पद्म कम् । प्लवः पूरः । यौतकं सुदायः । प्रणालं वाप्यादिपूर- णार्थं मकरमुखं कुर्वन्ति । लग्नो मेषादिः । अलिन्दो बहिर्द्वारप्रकोष्ठः । कण्ठकाः


मजदूरे हाथ में कूंची लिए, कन्धों से चूने की हंडी लटकाए, सीढ़ी पर चढ़कर राजमहल, पौरो, चहारदीवारी और शिखरों पर सफेदी कर रहे थे । पीसे जाते हुए कुंकुम के धोने से बहते हुए जल में आने जाने वाले के पैर रँग रहे थे । दहेज में देने योग्य हाथी-घोड़े आँगन में भरे हुए थे, उन्हें जाँचा जा रहा था । गणना में लगे हुए ज्योतिषी विवाह योग्य सुन्दर लग्न शोध रहे थे । मगर के मुँह की नली से गन्धजल बहकर क्रीड़ा की बौलियों में भर रहा था । राजद्वार की ड्योढ़ी के बाहर सोना गढ़ने में जुटे हुए सोनारों की ठक-ठक वहाँ भर रही थी । जो नई दीवारें वहाँ उठायी गयी थीं उन पर बालू मिले हुए मसाले का पलस्तर करने वाले मजदूरों के शरीर बालू के कण गिरने से सन गये थे । चित्रकारी में प्रवीण चित्रकार लोग मांगलिक चित्र बना रहे थे । खिलौने बनाने वाले कुम्हार मछली, कछुआ, मगर, नारियल, केला, सुपारी के वृक्ष आदि तरह तरह के मिट्टी के खिलौने बना रहे थे । कछ बाँधकर स्वयं राजा लोग मालिक के द्वारा मिले हुए काम को आकुलता के साथ कर रहे थे, जैसे कुछ सिंदूरी रंग के फर्श को माँजकर चमका रहे थे, कुछ ब्याह की बेदी के खम्भों को अपने हाथ से खड़ा कर रहे थे, कुछ ने उन्हें गीले ऐपन के थापों, आलता के रङ्ग में रंगे लाल कपड़ों और आम एवं अशोक के पल्लवों से सजाया था । इस प्रकार वे अनेक कामों में लग गए थे । सामन्तों की सती रूपवती स्त्रियाँ सुहावने वेश पहने और माथे पर सेन्दुर लगाय, सौभाग्य से अलंकृत होकर सूर्योदय से ही लेकर राजमहल के काम-काज में लग गयी थीं, कुछ वर-वधू के नाम ले-लेकर मङ्गलाचार के