हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ हर्षचरितम् गौरतया च मनःशिलाशैलमिव संचरन्तम्, अनुल्बणमालतीकुसुमशेखर- निभेन निर्जिगमिषता गुरुणा शिरशि चुम्बितमिव यशसा परस्परविरुद्ध- योर्विनययौवनयोश्चिरात्प्रथमसंगमचिह्नमिव भ्रूसंगतकेन कथयन्तम्, अति- धीरतया हृदयनिहितां स्वामिभक्तिमिव निश्चलां दृष्टिं धारयन्तम्, अच्छा- च्छचन्दनरसानुलेपनशीतलं संनिहितहारोपधानं वक्षःस्थलमन्तसामन्त- संक्रान्तिक्रान्तायाः श्रियो विशालं शशिमणिशिलापट्टशयनमिव बिभ्राणम्, चक्षुः कुरङ्गकैर्घोणावंशं वराहैः स्कन्धपीठं महिषैः प्रकोष्ठबन्धं व्याघ्रैः पराक्रमं केसरिभिर्गमनं मतङ्गजैर्मृगयाक्षपितशेषैर्भीतैरुत्कोचमिव दत्तं दर्शयन्तं माधवगुप्तं ददृशतुः । प्रविश्य च तौ दूरादेव चतुर्भिरङ्गैरुत्तमाङ्गेन च गां स्पृशन्तौ नमश्च- गौरतयेतीत्थंभूतलक्षणे तृतीया । शेखरस्यानुल्बणत्वं विनयं वक्ति । गुरुणा भूयि- ष्ठेन । चुम्बितमधिष्ठितम् । गुरुणा च पित्रा निर्गच्छता पुनः शिरसि चुम्ब्यते । भ्रूसंगत कं विनयम्, उपधानं गण्डकम् । विशालं प्रशस्तम् । विशाले चाङ्गानि प्रसार्यन्ते । शीतलत्वाच्चाङ्गनिर्वृतिः । घोणा नासिका एव स्पष्टत्वाद्वंशस्तम् । उत्को- चमिवेति । दण्डमित्यर्थः । चतुर्भिरङ्गैरिति । जानुभ्यां हस्ताभ्यां चोत्तमाङ्गेन मूर्ध्ना । भूमितौ च । भी मसल डालने की क्षमता रख रहा था । दर्शन देकर खरीदे गये की तरह अपने वश में हुये लोगों को सौभाग्य के द्वारा आनन्द के हाथ मानों बेंच रहा था । उसके पीछे पीछे अवस्था में छोटे लेकिन उसकी अपेक्षा लम्बे और गोरे मैनसिल के पर्वत के समान आते हुये माधवगुप्त को देखा । वह सुन्दर मालती के फूलों के शेखर के रूप में, निकलते हुए यश की भाँति अपनी भौंहों के संगतक ( सम्मेलन ) से मानों परस्पर विरुद्ध विनय और यौवन के पहले-पहल हुए एकत्र संगम को व्यक्त कर रहा था । हृदय में निहित स्वामी की भक्ति के रूप में अत्यन्त धीर स्वभाव के कारण निश्चल दृष्टि को धारण कर रहा था । सफेद चन्दन के रस से शीतल और लटकते हुए मोटे हार से युक्त वक्षःस्थल को मानों वह अनेक सामन्तों पर संक्रमण करने से थकी हुई लक्ष्मी के विश्राम के लिए गोल तकिए की तरह हार से युक्त शिलापट्ट के पलंग के समान धारण कर रहा था । आखेट में मारे जाने से बचे हुए मृगों ने घूस के रूप में मानों उसे आँखें, वराहों ने नाक, भैंसों ने स्कन्धपीठ, बाघों ने कलाई, शेरों ने पराक्रम, गजों ने चाल आदि दिए थे, जिन्हें वह दिखा रहा था । प्रवेश करके उन दोनों ने दूर ही से अपने चार अङ्गों के साथ सिर से पृथिवी का