हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ उच्छ्वासः २३१ त्यचं कर्णाभरणमयोः प्रभां बिभ्राणम्, उत्कोटिकेयरपत्रभङ्गपुत्रिकाप्रति- बिम्बगर्भकपोलं मुखं चन्द्रमसमिव हृदयस्थितरोहिणीकमुद्वहन्तम्, अच- पलस्तिमिततारकेणाधोमुखेन चक्षुषा शिक्षयन्तमिव लक्ष्मोलाभोत्तानि- मुखानि पङ्कजवनानि विनयम्, स्वाम्यनुरागमिवाम्लातकमृत्तंसीकृतं शिरसा धारयन्तम्, निर्दयया कङ्कणभङ्गभीतसकलकार्मुकार्पितामिव नम्रतां प्रकाशयन्तम्, शैशव एव निर्जितैरिन्द्रियैररिभिरिव संयतैः शोभ- मानम्, प्रणयिनीमिव विश्वासभूमिं कुलपुत्रतामनुवर्तमानम्, तेजस्विनमपि शीलेनाह्लादकेन सवितारमिव शशिनान्तर्गतेन विराजमानम्, अचला- नामपि कायकार्कशयेन गन्धनमिवाचरन्तम्, दर्शनक्रीतमानन्दहस्ते विक्री- णानमिव जनं सौभाग्येन कुमारगुप्तम्, पृष्ठतस्तस्य कनीयांसमतिप्रांशुतया
रौरवी ताम् । अम्लातकं पुष्पभेदम्, कुरण्टिकापुष्पभेदं वा । उत्तंसीकृतं शेखरतां नीतम् । शीलेनाप्यन्तर्गतेन । एतेन चास्या दाम्भिकत्वमुक्तम् । गन्धनं मर्दनम्; उद्दाहनं वा । दृष्टमेव जनं वश्यमेव सर्वं करोतीति दर्शनक्रीतता । क्रीतमावर्जि- तम् । पुनश्चानन्दोत्पादनद्वारेणानन्दवन्तं तच्छरणं करोतीति । तत्र विक्रियोत्प्रेक्षा- यत्तु वस्तु केनचिदर्थेन क्रीतं तदप्यन्यस्य विक्रीत इत्युक्तम् । विक्रीणानमिति । भुजाओं को हिलाते हुये वह मानों अत्यन्त दुस्तर यौवन रूपी समुद्र पर तैर रहा था। उसके बायें हाथ में धनुष की डोर से रगड़ पड़ने के कारण काली-सी रेखा थी जिस पर उस हाथ के विजयट के रत्न की किरणें पड़ रहीं थीं, मानों प्रकट होते हुये प्रतापानल की पल्लवाकार शिखा हो । ऊँचे कन्धे से लटकती हुयी कान के आभरण-मणि की लाल प्रभा को धारण कर रहा था मानो अस्त्र ग्रहण करने के लिये धारण की गयी रुरु मृग के चमड़े की पेटी हो । खड़ी कोर वाले केयूर में पत्रलता सहित पुतली की छाया से गर्भित कपोल वाला मुख रोहिणी को हृदय में लिये हुये चन्द्रमा की भाँति धारण कर रहा था। उसकी आँखें झुकी हुयी और पुतलियाँ स्थिर थीं, मानों लक्ष्मी के लोभ से सिर ऊँचा किये कमलों को विनय की सीख दे रहा था। अम्लातक नामक लाल पुष्प को उत्तंस बनाकर सिर से स्वामी के अनुराग के रूप में धारण कर रहा था। निर्दयता के कारण कंकण के टूट जाने के कारण डरे हुये धनुष की नम्रता को प्रकाशित कर रहा था। बाल्यकाल में ही शत्रुओं के समान जीते जाने पर संयत हुई इन्द्रियों से शोभित हो रहा था। प्रेयसी के समान विश्वास करने योग्य अपनी कुलीनता को व्यक्त कर रहा था। जैसे चन्द्रमा सूर्य को अपने अन्तर्गत कर लेता है उसी प्रकार तेजस्वी होकर भी वह अपने आह्लादक शील गुण से शोभ रहा था। उसकी देह इतनी कड़ी थी कि पहाड़ों को