हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३० हर्षचरितम् गुप्तनामानावस्माभिर्भवतोरनुचरत्वार्थमिमौ निर्दिष्टौ । अनयोरुपरि भवद्भयामपि नान्यपरिजनसमवृत्तिभ्यां भवितव्यम्,' इत्युक्त्वा तयोराह्वा- नाय प्रतीहारमादिदेश । न चिराद्द्वारदेशनिहितलोचनौ राज्यवर्धनहर्षौ प्रतीहारेण सह प्रवि- शन्तम्, अग्रतो ज्येष्ठमष्टादशवर्षवयसं नात्युच्चं नातिखर्वमतिगुरुभिः पदन्यासैरनेकनरपतिसंचरणचलां निश्चलीकुर्वाणमिवोर्वीम्, अनवरताभ्य- स्तसङ्घनघनोपचयकठिनमांसमेदुरादूरुद्वयान्निष्पततेवानुल्बणजानुग्रन्थिप्र- सूतेन तनुतरजङ्घाकाण्डयुगलेन भासमानम्, उल्लिखितपार्श्वप्रकाशितक्र- शिम्ना मन्दरमिव सुरासुररभसभ्रमितवासुकिकषणक्षीणेन मध्येन लक्ष्य- माणम्, अतिविस्तीर्णेनोरसा स्वामिसंभावनानामपरिमितानामवकाशमिव प्रयच्छन्तम्, प्रलम्बमानस्य भुजयुगलस्य निभृतललितैर्विक्षेपैरतिदुस्तरं तरन्तमिव यौवनोदधिम्, वामकरकटकमाणिक्यमरीचिमञ्जरीशालिन्या समुद्भिद्यमानप्रतापानलशिखापल्लवयेव चापगुणकिणलेखयाङ्कितपीवरप्र- कोष्ठम्, आलोहिनीमुत्सांसतटावलम्बिनीमस्त्रग्रहणव्रतविधृतां रौरवीमिव न चिरादित्यादौ । राज्यवर्धनहर्षौ प्रतीहारेण सह प्रविशन्तमग्रतो ज्येष्ठं कुमा- रगुप्तं पृष्ठतश्च तस्य कनीयांसं नीतिमत्त्वं प्रकाशितम् । खर्वं वामनम् । मेदुरात्पु- ष्टात् । अनुल्वणोऽनुद्धतः । उल्लिखितमिवोल्लिखितं तनूकृतम् । रुरुर्मृगभेदस्तस्येयं शूर, सुन्दर, मालवराज के पुत्र कुमारगुप्त और माधवगुप्त नाम के दो भाई, जो मेरी दोनों भुजाओं के समान मेरे शरीर से अलग नहीं, मैंने तुम्हारे अनुचर के रूप में नियुक्त किये हैं । इन दोनों के साथ आप लोग भी सामान्य परिजनों जैसा व्यवहार नहीं रखेंगे ।' यह कहकर राजा ने उन दोनों को बुला लाने के लिये आदेश दिया । कुछ ही देर में द्वार की ओर आँख लगाये राज्यवर्धन और हर्ष ने आगे आगे अठारह वर्ष की अवस्था के जेठे, न अधिक नाटे न अधिक लम्बे, प्रतिहार के साथ प्रवेश करते हुये कुमारगुप्त को देखा । वह मानों अनेक राजाओं के चलने से हिलती हुई पृथिवी को गम्भीर पदविन्यास से निश्चल बना रहा था । हमेशा लांघने के अभ्यास से उसके दोनों ऊरुकाण्ड भर जाने से कड़े और गंसे हुये थे । उसके सुघड़ ठेहुने से निकली हुयी पतली सी छरहरी जाँघें शोभित हो रही थीं । उसका मध्य भाग देवता और दानवों द्वारा घुमाये गये वासुकि सर्प की रगड़ खाकर मन्दराचल के समान कृश लग रहा था मानों खराद पर चढ़ाया गया हो । अपनी चौड़ी छाती से वह मानों स्वामी के अपरिचित स्नेह सद्भाव के रहने के लिये अवकाश दे रहा था । लम्बी-लम्बी सुघड़ अपनी दोनों