भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 271, कुल 506 में से

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२२६ : हर्षचरितम् निरीक्ष्यौ, अग्निमारुताविव समभिव्यक्ततेजोबलावेकीभूतौ, शिलाकठिन- कायबन्धौ हिमवद्विन्ध्याविवाचलौ, महावृषाविव कृतयुगयोग्यौ, अरुणग- रुडाविव हरिवाहनविभक्तशरीरौ, इन्द्रोपेन्द्राविव नागेन्द्रगतौ, कर्णार्जुना- विव कुण्डलकिरीटधरौ, पूर्वापरदिग्भागाविव सर्वतेजस्विनामुदयास्त- मयसंपादनसमर्थौ, अमान्ताविवातिमानेनासन्नवेलार्गलनिरोधसंकटे कुकु- टीरके, तेजःपराङ्मुखीं छायामपि जुगुप्समानौ, स्वात्मप्रतिबिम्बेनापि पादनखलग्नेन लजमानौ, शिरोरुहाणामपि भङ्गेन दुःखमवतिष्ठमानौ, समर्थत्वम् । प्रताप आयतिः, आतपश्च । तेजस्तैक्ष्ण्यम्, प्रकाशश्च । बलं सामर्थ्यम् । उभयत्राप्येकीभूतावन्योन्यानुवर्तिनौ, मिलितौ च । शिलावत्तादृशञ्च कठिनः । अच- लावकम्पौ, गिरी चाचलौ । कृतयुगमाद्ययुगभेदः, मूर्धन्यकाष्ठं च । योग्यावुचितौ, योग्या च शिक्षा । यद्वा, -कृतयुगे तत्र शकटादौ समर्थौ । हरयोऽश्वाः, सूर्यविष्णू च हरी । उक्तं च—'यमानिलेन्द्रचन्द्रार्कविष्णुसिंहांशुवाजिषु । शुकाहिकपिभेकेषु हरिर्ना कपिले त्रिषु ॥' इति । विभक्तं स्कन्धमध्यादिविभागेन स्थितम्, परिकल्पितं च नाग ऐरावणः, शेषश्च । नागेन्द्रवद्गतं ययोः, नागेन्द्रे वा गतावारूढौ । तेज- स्विनो वीराः, आदित्याश्च । उदयो वृद्धिः, आविर्भावश्च । अस्तमयो नाशः, तिरो- धानं च । अमान्ताविव वर्तमानौ । वेला जलनिधेः, जलमर्यादा । कुर्भूमिरेव कुटीरकं पर छा गए और दोनों (चन्द्र के समान) अभिराम एवं (सूर्य के समान) दुर्धर्ष हो गए। अग्नि और वायु के समान दोनों में तेज और बल बराबर अभिव्यक्त हुए और दोनों जैसे एक हो गए। हिमालय और विन्ध्याचल के समान दोनों अडिग हुए और उनके शरीर की गठन शिला जैसी कड़ी थी। दो महावृषभ के समान कृतयुग अर्थात् सतयुग के उचित (जुभाठ धारण करने योग्य) थे। अरुण और गरुड़ के समान दोनों अलग-अलग घोड़े की सवारी करते थे (अरुण पक्ष में-सूर्य के वाहन अर्थात् सारथि के रूप में, और गरुड पक्ष में-विष्णु के वाहन रूप में विभक्त शरीर वाले)। कर्ण और अर्जुन के समान कुण्डल और किरीट धारण करते थे। पूर्व और पश्चिम दिग्भाग के समान समस्त तेज- स्वियों (सूर्य और चन्द्र) का उदय और अस्त करने में समर्थ थे। उन्होंने अपना इतना विस्तार कर लिया कि पृथिवी की कुटिया के संकीर्ण स्थान में अँट नहीं पा रहे थे, जिसमें समुद्रतट की अर्गला लगा दी गई थी। तेज से अलग होकर रहने वाली छाया को भी वे हीन दृष्टि से देखते थे। अपने पैर के नखों में गिरकर लगे हुए अपने शरीर के प्रतिबिम्ब से भी वे लज्जा का अनुभव करते थे। सिर के बालों को काटने से भी उन्हें दुःख का अनु- भव होता । अपनी चूडामणि में प्रतिबिम्बित होते हुए अपने ही छत्र को दूसरा समझकर

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