हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 270, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ उच्छ्वासः २२५ तजन्मान्तरम् शैशवेऽपि साबष्टम्भं बीजमिव वीर्यद्रुमस्य भण्डिनामानम- नुचरं कुमारयोरर्पितवान् । अवनिफ्तेस्तु तस्योपरि पुत्रयोस्तृतीयस्य नेत्रयोरिवेश्वरस्य तुल्यं दर्शनमासीत् । राजपुत्रावपि सकलजावलोकहृदयानन्ददायिनौ तेन प्रकृ- तिदक्षिणेन मधुमाधवाविव मलयमारुतेनोपेतौ नितरां रेजतुः । क्रमेण चापरेणेव भ्रात्रा प्रजानन्देन सह वर्धमानौ यौवनमवतेरतुः । स्थिरोरु- स्तम्भौ च पृथुप्रकोष्ठौ दीर्घभुजार्गलौ विकटोरःकवाटौ प्रांशुसालाभिरामौ महानगरसंनिवेशाइव सर्वलोकाश्रयक्षमौ बभूवतुः । अथ चन्द्रसूर्याविव स्फुरज्ज्योत्स्नायशःप्रतापाक्रान्तभुवनावभिरामदु- पाशावशेषता । भङ्गुरः कुटिलः । बीजमिवेति । शैशवाद्बीजावस्थोत्प्रेक्ष्यते, न तु द्रुमावस्था । अवनीत्यादौ । अवनिफ्तेस्तु तस्योपरि पुत्रयोस्तुल्यं दर्शनमालोकनमिति संबन्धः । अन्यत्र,-दर्शनं दृष्टिः । तृतीयस्येति च । ईश्वरस्येति साधारणम् । सकले- त्यादि साधारणम् । दक्षिणोऽनुकूलः, दाक्षिणात्यश्च । मधुमाधवौ चैत्रवैशाखौ । उरु- स्तम्भाविव उरवः महान्तश्च स्तम्भाः । 'प्रकोष्ठमन्तरं विद्यादरत्निमणिबन्धयोः' । स्थानविशेषो वा । कवाटो द्वारपट्टः । सालो वृक्षभेदः, प्राकारश्च । सर्वलोकेत्यादि साधारणम् । अथेत्यादौ । तौ सर्वस्यामेव पृथिव्यां प्रकाशतां जग्मतुरिति संबन्धः । स्फुर- ज्ज्योत्स्नाजालं यशस्तथा प्रतापोस्ताभ्याम्; अन्यत्र,-ज्योत्स्नायश इव भुवनाक्रमण- लग गया हो, फिर से उत्पन्न हो गया । इस शैशवकाल में भी वह तेजस्वी के सदृश लग रहा था । पराक्रम के वृक्ष का मानों वह बीज था । भण्डि के ऊपर राजा की दृष्टि दोनों पुत्रों के बीच शिवजी के तीसरे नेत्र के समान थी । समस्त जीवलोक को आनन्दित करने वाले दोनों राजपुत्र भी स्वभाव से दक्षिण (अनुकूल) उस भण्डि से अत्यन्त घुल-मिल गए, जैसे चैत्र और वैशाख दक्षिण की ओर से बहने वाले मलयानिल के साथ हो जाते हैं। क्रमशः दूसरे भाई के समान प्रजाओं के आनन्द के समान बढ़ते हुए यौवन को प्राप्त हुए । उनके स्तम्भ की भाँति स्थिर दो-दो ऊरु दण्ड, द्वार प्रकोष्ठ की भाँति सुगठित प्रकोष्ठ, अर्गलादण्ड की भाँति दीर्घ भुजाएँ, किवाड़ के पल्ले की भाँति चौड़ी छाती और प्राकार की भाँति ऊँचा आकार ऐसा लगता था मानों सारे संसार के आश्रय के योग्य किसी महानगर की रचना हुई हो । राज्यवर्धन और हर्ष दोनों का यश थोड़े ही समय में अन्य द्वीपों में भी फैल गया । चन्द्र की ज्योत्स्ना और सूर्य के प्रताप के समान उनके भी यश और प्रताप सारे संसार १५ ह० च०