भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 273

२२८ हर्षचरितम् क्षरन्तौ, दुष्टराजवंशानूष्मणा दूरस्थितानपि म्लानिमानयन्तौ, अनुदिवसं शस्त्राभ्यासश्यामिकाकलङ्कितमशेषराजप्रतापाग्निनिर्वपणमलिनमिव कर- तलमुद्वहन्तौ, योग्याकालेषु धीरैर्धनुर्ध्वनिभिरभ्यर्णोपभोगाद्दिग्वधूभिरिवा- लपन्तौ राज्यवर्धन इति हर्ष इति सर्वस्यामेव पृथिव्यामाविर्भूतशब्दप्रा- दुर्भावौ, स्वल्पीयसैव कालेन द्वीपान्तरेष्वपि प्रकाशतां जग्मतुः । एकदा च तावाहूय भुक्तवानभ्यन्तरगतः पिता सस्नेहमवादीत्— ‘वत्सौ ! प्रथमं राज्याङ्गं, दुर्लभाः सद्भूत्याः । प्रायेण परमाणव इव समवायेष्वनुगुणीभूय द्रव्यं कुर्वन्ति पार्थिवं क्षुद्राः । क्रीडारसेन नर्तयन्तौ मयूरतां नयन्ति बालिशाः । दर्पणमिवानुपविश्यात्मीयां प्रकृतिं संक्राम- ऊष्मणा च दाहशक्त्या । वंशा वेणवः । निकटस्थो म्लानीक्रियते न तु दूरस्थ इति विरोधः । निर्वपणं शमनम् । योग्या अभ्यासः । अभ्यर्णः प्रत्यासन्नः शब्दः । प्रादुर्भावः ख्यातिः । प्रथमं प्रधानभूतम् । प्रायेणेति । क्षुद्राः प्रायेण समवायेषु मन्त्रेष्वनुगुणीभूय यथा क्षुद्रा अल्पपरिमाणाः परमाणवः पार्थिवं पृथिव्यादिजातीयं घटादिद्रव्यं कुर्वन्ति । कथं समवायेष्वनुगुणीभूयायुतसिद्धानामाधाराधेयभूतानामिह प्रत्ययहेतुः। संयोगः समवायः । यथा तन्तुषु पट इति । कार्यस्य द्रव्यस्यावयविन आरम्भं प्रतियोगीभावोऽनुगुणत्वम् । मयूरो धूर्तजनयोग्यो हासो वा, शिखण्डी च । बालिशा धूर्ताः, कुमाराश्च । बालका हि क्रीडारसेन मयूरं नर्तयन्ते । अनुप्रविश्य से दूर से ही म्लान कर देते थे। प्रतिदिन शस्त्र के अभ्यास करने से दाग पड़े हुए और समस्त राजाओं को प्रतापाग्नि को बुझाने से मलिन अपने दोनों करतलों को धारण करते थे । अभ्यास-काल में धनुष की गम्भीर टंकार से मानों निकट में उपभोग की भावना से दिगङ्गनाओं के साथ बातचीत करते थे । राज्यवर्धन और हर्ष इन दोनों शब्दों का प्रादुर्भाव सारी पृथिवी में हो गया । एक समय भोजन करने के बाद दोनों पुत्रों को पिता ने बुलाकर स्नेह के साथ कहा—'बच्चे, अच्छे सचिव ही राज्य के प्रधान अङ्ग होते हैं । 'जैसे छोटे-छोटे परमाणु समवाय सम्बन्ध से एकत्र होकर पार्थिव द्रव्य को उत्पन्न करते हैं उसी प्रकार क्षुद्र प्रकृति के लोग खुशामद की बात करके राजा को साधारण जन बना देते हैं । धूर्त लोग विविध क्रीड़ाओं के आनन्द में उसे फँसाकर मयूर के समान उसे नचाने लगते हैं । चट्टे-बट्टे लोग दर्पण के समान उसमें प्रवेश करके अपनी प्रकृति को उसमें संक्रान्त कर देते हैं । ठग विद्या में निपुण लोग झूठ-मूठ की बातों को दिखाकर उसकी बुद्धि को खराब कर