भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 506 में से

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पृष्ठ 243

राजलक्ष्मीम् । यश्च सर्वासु दिक्षु समीकृततटावटविटपाटवीतरुतृणगुल्म- वल्मीकगिरिगहनैर्दण्डयात्रापथैः पृथुभिर्भृत्योपयोगाय व्यभजतेव वसुधां बहुधा । यं चालब्धयुद्धदोहदमात्मीयोऽपि सकलरिपुसमुत्सारकः परकीय इव तताप प्रतापः । यस्य च वह्निमयो हृदयेषु, जलमयो लोचनपुटेषु, मारुतमयो निःश्वसितेषु, क्षमामयोऽङ्गेषु आकाशमयः शून्यतायां पञ्चम- हाभूतमयो मूर्त इवादृश्यत निहतप्रतिसामन्तान्तःपुरेषु प्रतापः । यस्य चासन्नेषु भृत्यरत्नेषु प्रतिबिम्बितेव तुल्यरूपा समलक्ष्यत लक्ष्मीः । तथा च यस्त प्रतापाग्निना भूतिः, शौर्योष्मणा सिद्धिः, असिधाराजलेन वंश- वृद्धिः, शस्त्रव्रणमुखैः पुरुषकारोक्तिः, धनुर्गुणकिणेन करगृहीतिरभवत् । यश्च वैरमुपायनं विग्रहमनुग्रहं समरागमं महोत्सवं शत्रुं निधिदर्शनमरि- तृणादिभिश्च गहनैः । विटपाः शाखाः । अटवी समूहः । गुल्मा जालकानि । वल्मीकः पिपीलककृतो मृत्कूटः । दण्डश्चतुरङ्गबलम् । तस्य यात्रापथैर्गमनमार्गैः । सीमास्था- नीयैर्व्यभजत खण्डशो व्यलभत । भूशय्यादिवशेन पांसुभृतत्वात्काठिन्याच्च क्षमा- मयः शून्यतायां निश्चेष्टत्वे । आसन्नेष्विति । आसन्नानि प्रतिबिम्बं गृह्णन्ति, भूतिः सम्पत् , भस्म च । ऊष्मा चाङ्गदाहिका शक्तिः । सिद्धिः पाकोऽपि । वंशो वेणुरपि । व्रणानां मुखान्यग्राणि । गुणान्येव वा मुखान्याननानि । मुखैः किलोक्तिर्भवति । करगृहीतिर्दण्डग्रहणम् । किणश्च व्यायामहस्त एव भवति । अज्ञातः शत्रुध्वभिगमोऽ- राजलक्ष्मी को धारण किया । उसने सब दिशाओं में नदियों के किनारे, गड्ढे, वन, वृक्ष, तृण, झाड़ी, वल्मीक, पहाड़ आदि को समतल बनाकर भृत्यों के आने-जाने के लिए दूर तक विस्तृत सैन्यमार्ग बनवाकर पृथिवी को मानों कई भागों में विभक्त कर दिया । शत्रु को नष्ट करने वाला उसका अपना प्रताप भी युद्ध की इच्छा के न पूर्ण होने पर उसे ही परकीय के समान होकर जलाता था। हृदयों में अग्नि होकर जलन पैदा करता हुआ, आँखों में आँसू का जल बना हुआ, साँसों में हवा का रूप धारण किए, अङ्गों में धूल भरने के कारण पृथिवी के रूप में परिणत और शून्यता अर्थात् विरह या मूर्च्छा की अवस्था में आकाश बना हुआ, मारे गये शत्रु राजाओं के अन्तःपुरों में उसका प्रताप पाँच महाभूतों के रूप में दिखाई पड़ा। उसकी लक्ष्मी समीप में स्थित भृत्यरूपी रत्नों में समान रूप से प्रतिबिम्बित हुई सी लगती थी। उसके प्रताप की अग्नि से ऐश्वर्य हुआ, शौर्य की गरमी से सिद्धि हुई, तलवार के धाराजल से वंश की वृद्धि हुई, शस्त्रों के घाव से पौरुष समझा गया, धनुष के गुण की रगड़ के गट्टे से कर की वसूली हुई। वह शत्रु द्वारा किए गए विरोध को उपहार के रूप में स्वीकार करता, उसके साथ युद्ध को उसका ही अनुग्रह मानता, संग्राम में उपस्थित होने को महोत्सव समझता, शत्रु को देखकर उसे