हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ उच्छ्वासः १६७ तेषु चैवमुत्पद्यमानेषु क्रमेणोदपादि हूणहरिणकेसरी सिन्धुराज- ज्वरो गूर्जरप्रजागरो गान्धाराधिपगन्धद्विपकूटपाकलो लाटपाटवपाटच्चरो मालवलक्ष्मीलतापरशुः प्रतापशील इति प्रथितापरनामा प्रभाकरवर्धनो नाम राजाधिराजः । यो राज्याङ्गसङ्गीन्यभिषिच्यमान एव मलानीव मुमोच धनानि । यः परकीयेनापि कातरवल्लभेन रणमुखे तृणेनेव धृते- नालज्जत जीवितेन । यः करधृतधौतासिप्रतिबिम्बितेनात्मनाप्यदूयत समितिषु सहायेन रिपूणां पुरः प्रधनेषु धनुषापि नमता यो मानी मानसेना- खिद्यत । यश्चान्तर्गतापरिमितरिपुशस्त्रशल्यशङ्कुकीलितामिव निश्चलामुवाह हूणादयो जनपदभेदाः । प्रजागरो निद्राक्षयः । 'स्वेदं मूत्रं पुरीषं च मज्जा चैवं मतङ्गजाः। यस्याघ्राय विभाघ्नन्ति तं विद्याद्गन्धहस्तिनम् ॥' कूटपाकलो हस्तिज्वरः । यतो हूणाद्युन्मूलकोऽत एव प्रथितापरनामा राजा । राज्याङ्गान्यमात्याद्याः । अभि- षिच्यमानो राज्ये प्रतिष्ठाप्यमानो यस्याभितः सिच्यते सोऽङ्गसङ्गीनि मलानि मुञ्चति । कातरैति । तृणं कातरैर्मुखे ध्रियते । तृणेनेति सहोपमा मुखे तृणधारणम- नौचित्यमेव पोषयति । धौतपदेन बिम्बस्वीकारसामर्थ्यमुक्तम् । समिदिन्धनं संग्रा- मञ्च । निश्चलाम्रनपायिनीम् । समीकृतास्तटावटा यैर्विटपाटवीयुक्तैस्तरुभिस्तथा करने मे समर्थ दिग्गज जैसे ब्रह्माजी के हाथ से उत्पन्न हुए, समुद्रपान करने के लिये तत्पर मेघ जैसे वर्षाकाल से उत्पन्न हुए, इच्छानुसार फल देने वाले कल्पवृक्ष जैसे नंदनवन से उत्पन्न हुए, समस्त भूतों पर आश्रित रहने वाले संसार के दृश्यमान रूप जैसे विष्णु से उत्पन्न हुए उसी प्रकार उस राजवंश से अनेक राजा उत्पन्न हुए। इन राजाओं के उत्पन्न होने के क्रम में प्रभाकरवर्धन नाम का राजाधिराज हुआ। उसका दूसरा नाम प्रतापशील था। वह हूणरूपी हिरन के लिए सिंह, सिन्धुदेश के राजा के लिए ज्वर, गुर्जर को चैन से न सोने देने वाला अनिद्र रोग, गान्धारराज रूपी मस्त हाथी के लिए जलता हुआ बुखार, लाट देश की चालाकी का अन्त करने वाला, मालव देश की लक्ष्मीरूपी लता को काट डालने वाला कुठार था। उसने अभिषेक के अवसर में ही राज्य के अङ्गों में लगे हुए मल के समान धन-सम्पत्तियों को धो डाला। दुर्बलों के प्रिय अपने जीवन को निरन्तर परोपकार में लगे रहने पर भी रण-मुख में तृण की भाँति धारण किए समझ कर वह अपने आप में लज्जित होता था। युद्धों में वह अपने हाथ की तलवार में प्रतिबिम्बित अपने आपको भी अपना सहायक समझ कर मानसिक सन्ताप का अनुभव करता था। मानी वह युद्धों में नत होते हुए अपने धनुष को देखकर मन से खिन्न होता था। उसने शत्रुओं द्वारा बाणों की कील ठोंककर निश्चल बनाई गई