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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

१६० हर्षचरितम्

विवरमिति वातिकैः शाक्याश्रम इति शमिभिः, अप्सरःपुरमिति कामिभिः, महोत्सवसमाज इति चारणैः, वसुधारेति च विप्रैरगृह्यत । यत्र च मातङ्गगामिन्यः शीलवत्यश्च, गौर्यो विभवरताश्च, श्यामाः पद्मरागिण्यश्च, धवलद्विजशुचिवदना मदिरामोदिश्वसनाश्च, चन्द्रकान्त- वपुषः शिरीषकोमलाङ्ग्यश्च, अभुजङ्गगम्याः कञ्चुकिन्यश्च, पृथुकलत्रश्रियो

बन्दिभ्योऽभिवाञ्छितसंपत्तेः सुकृतपरिणामता । वातिकैर्विवरव्यसनिभिराचार्यैः । शाक्यो बौद्धः । चारणैः कुशीलवैः । वसुधारा धनप्रवाहः । मातङ्गेत्यादयो विरोधाः । मातङ्गो हस्ती, चण्डालश्च । याः प्रमदाश्चण्डालानपि गच्छन्ति ताः कथं शीलवत्य इति विरोधः सर्वत्र ज्ञेयः । गौर्यो गौराङ्ग्यः । विभव ऐश्वर्ये रक्ताः । यन्न विगता भवतस्तन्न कथं गौरा रतेति । विगतं भवे रतं यस्या वा । श्यामाः श्यामलाङ्ग्यः । पद्मरागिण्यो लोहितमणिभूषणाः । श्यामा रात्रयः कथं पद्मरागिण्यः । रात्रौ पद्मानां संकोचात् । द्विजैर्दन्तैः । शुचिवदना मदिरावन्मदिरयैव वा । आमोदी श्वसनो मुखमारुतो यासां, धवलद्विजवच्छुद्धब्राह्मणवच्छुचि वदनं ताः कथं मदिरामोदिश्वसनाः । चन्द्रवत्कान्तं वपुर्यासाम् । शिरीषपुष्पवत्सुकुमाराङ्ग्य- श्चन्द्रकान्तस्येव वपुर्यासां ताः, कथं शिरीषकोमलाङ्ग्यः । भुजङ्गा विटाः, कञ्चुकं स्त्रीणां वासः, वारबाणाख्यश्च । याश्च कञ्चुकिन्यः सर्पिण्यस्ताः कथं भुजङ्गैर्न गम्याः ।


कामी लोग उसे अप्सराओं का नगर कहते, चारणों के अनुसार वह महोत्सवों का समाज था और उसे धन का प्रवाह ही समझते । वहां१ की स्त्रियां मातङ्गगामिनी (चाण्डाल का गमन करने वाली नहीं बल्कि) अर्थात् हाथी के समान चलने वाली और शीलवती थीं। वे गौरी (पार्वती) अर्थात् गौर वर्ण वाली थीं और (पार्वती होकर भी भव अर्थात् शिव में अनुरक्त न थीं) विभव अर्थात् ऐश्वर्य में अनुराग करती थीं। श्यामा (रात्रियां) अर्थात् सांवली थीं और पद्मरागिणी (कमलों में अनुराग करने वाली, रातें कमलों में अनुराग नहीं करतीं) अर्थात् लाल मणियों के आभूषण पहनती थीं। उजले दाँतों से उनका मुख पवित्र था और मदिरा की गंध वाली सांस लेती थीं। चन्द्रमा के समान सुन्दर देहवाली थीं (या चन्द्रकान्त के समान कठोर थीं फिर भी) शिरीष के फूल के समान उनके अंग कोमल थे। भुजङ्ग अर्थात् गुंडे उन्हें प्राप्त नहीं कर सकते थे और वे कञ्चुक धारण करती थीं (जो कंचुकिनी अर्थात् सर्पिणी हैं वे क्यों नहीं भुजङ्ग अर्थात् सर्पों द्वारा गम्य हैं?), पृथु अर्थात् मोटे जघनों से सुशोभित थीं और उनका मध्य अर्थात् कटिभाग पतला था

१. यहां कोष्ठकों में विरोध के रूप में आभासित होने वाले अर्थ दिए गए हैं।

तृतीय उच्छ्वासः १६१ दरिद्रमध्यकलिताश्च, लावण्यवत्यो मधुरभाषिण्यश्च, अप्रमत्ताः प्रसन्नोज्ज्व- लमुखरागाश्च, अकौतुकाः प्रौढाश्च प्रमदाः । यत्र च प्रमदानां चक्षुरेव सहजं मुण्डमालामण्डनं भारः कुवलयदल- दामानि, अलकप्रतिबिम्बान्येव कपोलतलगतान्यक्लिष्टाः श्रवणावतंसाः पुनरुक्तानि तमालकिसलयानि, प्रियकथा एव सुभगाः कर्णांलंकारा आड- म्बरः कुण्डलादिः, कपोला एव सततमालोककारका विभवो १निशासु मणिप्रदीपाः सुरभिनिःश्वासाकृष्टं मधुकरकुलमेव रमणीयं मुखावरणं कलत्रं जघनम् । दरिद्रं क्षामं मध्यमुदरं यासाम् । कलत्रस्य परिवारस्य पृथ्वीः श्रीस्ताः कथं दरिद्राणां निर्धनानां मध्ये कलिताः संख्याता भवन्ति । लावण्यं सौन्दर्यम् ; मधुरं हृद्यम् । लावण्यरसवतीनां मधुरभाषितं विभाव्यते । अप्रमत्ताः प्रमादशून्याः । प्रसन्नो मनोहरः । उज्ज्वलो मनोहारी । प्रसन्ना च सुरा तयोज्ज्वलो मुखरागो यासां ताः, कथमप्रमत्ता अक्षीबाः । अकौतुका अकरकङ्कणाः । विवाहि- तानां हि करकङ्कणोऽवबध्यते । 'रुद्राक्षदर्पसिद्धार्थशिखिपक्षोरगत्वचः । कङ्कणौषध- यश्चेति कौतुकाख्याः प्रकीर्तिताः ॥' मुण्डमालारूपं मण्डनं मुण्डमालामण्डनम् । सहजमकृत्रिमम् । अनेककुवलय- (जो राजा पृथु के समान हो वे दरिद्रों के मध्य में कैसे गिना जायगा ? ) । वे लावण्य वाली और मधुरभाषिणी थीं (जो लावण्यवती अर्थात् नमकीन हैं वे मधुर कैसे हो सकती हैं ?) । वे प्रमादशून्य थीं और उनका वर्ण प्रसन्न एवं उज्ज्वल था (जो प्रमत्त नहीं वे प्रसन्ना अर्थात् मदिरा के कारण शृङ्गार में डूबे हुये मुखराग वाली कैसे हो सकती हैं ?) । अकौतुका अर्थात् प्रियसमागम के लिए उत्सुक न थीं और पूर्ण यौवन पर आ पहुँची थीं (जो अकौतुका अर्थात् वैवाहिक मंगलसूत्र से रहित हों वे प्रौढ़ा अर्थात् विवाहिता कैसे हो सकती हैं ?) । वहां सुन्दरियों की आँखें ही सिर की सहज फूल-माला बन जातीं, कुवलय के फूलों की माला भार प्रतीत होती । उनके गालों पर छितराए हुए बालों के प्रतिबिम्ब ही क्लेश न देने वाले कर्णावतंस बन जाते, फिर कान में कर्णावतंस के रूप में तमालपत्र का लगाना पुनरुक्तिमात्र हो जाता । अपने प्रिय की कथा ही उनके लिए सुन्दर कान का आभूषण बन जाती, फिर भी उनका कुण्डल लगाना आडम्बरमात्र था । उनके कपोल ही निरन्तर आलोक उत्पन्न करते थे, मणियों के दीपक तो केवल वैभव के चिह्न होने के कारण रखे जाते थे। उनकी सुगन्धित सांसों पर लझते हुए भौंरे ही उनके मुख पर १. निःश्वासमणिप्रदीपाः । ११ ह० च०

१६२ हर्षचरितम् कुलस्त्रीजनाचारो जालिका, वाण्येव मधुरतरा वीणा बाह्यविज्ञानं तन्त्री- ताडनम्, हासा एवातिशयसुरभयः पटवासा निरर्थकाः कर्पूरपांसवः, अधरकान्तिविसर एवोज्ज्वलतरोऽङ्गरागो निर्गुणो लावण्यकलङ्कः कुङ्कुम- पङ्कः, बाहव एव कोमलतमाः, परिहासप्रहारवेत्रलता निष्प्रयोजनानि मृणालानि, यौवनोष्मस्वेदबिन्दव एव विदग्धाः कुचालंकृतयो हारास्तु भाराः, श्रोण्य एव विशालस्फटिकशिलातलचतुरस्रा रागिणां विश्रमका- रणनिमित्तं भवनमणिवेदिकाः । कमलोभनिलीनान्यलिकुलान्येव मुखराणि पदाभरणकानि निष्फलानीन्द्रनीलमणिनूपूराणि । नूपुररवाहूता भवनकलहंसा एव समुचिताः संचरणसहाया ऐश्वर्यप्रपञ्चाः परिजनाः । तत्र च साक्षात्सहस्राक्ष इव सर्ववर्णधरं धनुर्दधानः, मेरुमय इव दलदामाभ्यासोत्कर्षः, न तु कुवलयदल्दामसंभवेऽपि प्रतिनिधि रूपतापादनम् । भार इत्यनेनैष एवार्थः प्रकटितः । एवमक्लिष्टा इत्यादिदौ बोद्धव्यम् । आडम्बरः स्फुटः । जालिका शिरोवस्त्रभेदः । चतुरस्त्रा रम्याः । विश्रमकारणमिति गुरुत्वात् । तत्र चेत्यादौ । तत्र पुष्यभूतिर्नाम राजासीदिति संबन्धः । वर्णा विप्राद्याः, सुन्दर घूँघट-पट का काम करते थे, फिर भी प्रथा के नाते वे अपने मुख पर घूंघट का जाली डाल लेती थीं । उनकी वाणी अत्यन्त मधुर थी, वाह्य कला के रूप में वे तारों को छेड़ कर वीणा बजाती थीं । उनकी मुसकान ही अत्यन्त सुगन्धित पटवास का काम देती, फिर कपूर की धूल निरर्थक प्रतीत होती थी । उनके अधर की फैलती हुई कान्ति ही उनके शरीर पर अंगराग का रूप धारण कर लेती, फिर बिना किसी लाभ के कुंकुम लगाना उनके लावण्य का कलंक बन जाता था । उनकी कोमल भुजाएँ ही परिहास के अवसर में ठोंकने की वेत्रलता थीं, फिर मृणालों का वहां प्रयोजन ही क्या ? जवानी की गरमी से उनके स्तनों पर छूटते हुए पसीने ही सुन्दर हार के समान लगते, फिर उनके शरीर पर हार बोझ मात्र प्रतीत होते थे । उनके नितम्ब ही प्रेमी जनों के विश्राम के लिए स्फटिकमणि के विशाल गढ़े हुए शिलातल की बनी भवन वेदिका के समान थे । उनके चरणों को कमल समझ कर बैठे हुए भौंरे ही उनके चरणाभरण थे, वहां इन्द्रनील मणियों के नूपुर निष्फल थे । नूपुर की आवाज से खिंचे हुए भवन के कलहंस ही उनके घूमने के लिए योग्य साथी बनते, केवल ऐश्वर्य के प्रदर्शन के लिए उनके साथ परिजन रहा करते थे । उस स्थाण्वीश्वर में पुष्पभूति नामक एक राजा हुआ । जैसे इन्द्र विविध प्रकार के वर्णों (रंगों) वाला धनुष धारण करता है उसी प्रकार उसने समस्त ब्राह्मण आदि वर्णों

कल्याणप्रकृतित्वे, मन्दरमय इव लक्ष्मीसमाकर्षणे, जलनिधिमय इव मर्यादायाम्, आकाशमय इव शब्दप्रादुर्भावे, शशिमय इव कलासंग्रहे, वेदमय इवाकृत्रिमालापत्वे, धरणिमय इव लोकधृतिकरणे, पवनमय इव सर्वपार्थिवरजोविकारहरणे, गुर्व्वचसि, पृथुरुरसि, विशालो मनसि, जनकस्तपसि, सुयात्रस्तेजसि, सुमन्त्रो रहसि, बुधः सदसि, अर्जुनो यशसि, भीष्मो धनुषि, निषधो वपुषि, शत्रुघ्नः समरे, शूरः शूरसेना- क्रमणे, दक्षः प्रजाकर्मणि, सर्वादिराजतेजःपुञ्जनिर्मित इव राजा पुष्य- भूतिरिति नाम्ना बभूव ।

शुक्लाद्याश्च । कल्याणं श्रेयः, सुवर्णं च । मन्दरेण श्रीराकृष्टामृतमन्थने, पुष्यभूतिना भैरवाचार्यवेतालसाधने । मर्यादाचारः, सीमा च । शब्दो यशोऽपि । प्रादुर्भावः प्रकाशता । कला गीताद्याः, लेखाश्च । अकृत्रिमः सत्ययुक्तः, अपौरुषेयश्च । धृतिर्धैर्यम्, धारणं च । पार्थिवो राजा, पृथिवीसंबन्धी च । रजोविकारा रागाद्याः, रेणुकार्याणि । गुर्व्वित्यादिना वक्रोक्त्याज्ञानां गुर्वादिमयत्वं सूचयति । गुरुरुपदेष्टा, गुरुर्महान् । गम्भीरशब्दत्वाद्वृहस्पतिश्च । पृथुर्विपुलः, आदिराजश्च कश्चित् । विशाला विस्तीर्णाः, विशालाद्याश्च नृपा अभवन् । अथ विशालो नाम बोधिसत्त्वः स एव शान्तः शान्तमना इत्यपि प्रतीतिरस्ति । जनको जनयिता, जनक इव तपस्वी च । सुयात्र इति । शोभना यात्रा यस्य सोऽपि । कर्तव्यावधारणं मन्त्रः स शोभनो यस्येति च । बुधः पण्डितः, ग्रहश्च । अर्जुनः शुक्लोऽपि । भीष्मो भयानकः, गाङ्गेयश्च । निषधो धर्षणीयः, कठिनो वा, नलस्य च पिता, गिरिभेदो वा । शूरो विक्रान्तः, यदूनां राजा च । दक्षश्चतुरः, प्रजापतिश्च ।

के नियमनार्थ धनुष धारण किया । कल्याण प्रकृति अर्थात् श्रेय का भावना स भरा होने के कारण वह मानों कल्याण ( सुवर्ण ) के सुमेरु से निर्मित था । वह लक्ष्मी के आकर्षण करने में मन्दराचल के समान, मर्यादा में समुद्र के समान, शब्द रूप यश को उत्पन्न करने में आकाश के समान, कलाओं के संग्रह में चन्द्र के समान, स्वाभाविक बातचीत करने में वेद के समान, सारे लोक के धारण करने में पृथिवी के समान और पार्थिव अर्थात् राजाओं ( अथवा पृथिवी सम्बन्धी ) रजोविकार दूर करने में वायु के समान था । और वह वाणी में महान् या बृहस्पति था, वक्ष के सम्बन्ध में पृथु अर्थात् विपुल था या राजा पृथु के समान था, मन में विशाल था, तपस्या करने में जनक था, तेज में सुयात्र नामक राजा के समान था, रहस्य के सम्बन्ध में सुमन्त्र अर्थात् शोभन मंत्र या विचार देने वाला अथवा सुमन्त्र नामक राजा के समान था, सभा में विद्वान्, यश में अर्जुन ( उज्ज्वल ), धनुष में भीष्म ( भयंकर ), शरीर में अधर्षणीय या निषध, समर में

१६४ हर्षचरितम् पृथुना गौरिवेयं कृतेति यः स्पर्धमान इव महीं महिषीं चकार । निसर्गस्वैरिणी स्वरुच्यनुरोधिनी च भवति हि महतां मतिः । यतस्तस्य केनचिदनुपदिष्टा सहजैव शैशवादारभ्यानन्यदेवता भगवति, भक्ति- सुलभे, भुवनभृति, भूतभावने, भवच्छिदि, भवे भूयसी भक्तिरभूत् । अकृतवृषभध्वजपूजाविधिर्न स्वप्नेऽप्याहारमकरोत् । अजम्, अजरम् , अमरगुरुम् , असुरपुररिपुम् , अपरिमितगणपतिम् , अचलदुहितृपतिम्, अखिलभुवनकृतचरणनतिम्, पशुपतिं प्रपन्नोऽन्यदेवताशून्यममन्यत त्रैलो- क्यम् । भर्तृचित्तानुवर्तिन्यश्चानुजीविनां प्रकृतयः । तथा हि-गृहे गृहे भग- वान्पूज्यत खण्डपरशुः। ववुरस्य होमालवालानलविलीयमानबहलगुग्गुलु- गन्धगर्भाः स्नपनक्षीरशीकरक्षोदक्षारिणो बिल्वपल्लवदामदलोद्वाहिनः पुण्य- महिषीं महादेवीमपि । निसर्गः स्वभावः । स्वैरिणी स्ववशा । खण्डपरशुः शिवः । ववुरवहन् । होमालवालमग्निकुण्डम् । सपर्या पूजा । उपायनं ढौकनिका स्वयानीयते । प्राभृतं कौशालिका सखिभिः प्रहीयते । करदीकृता दण्डदाः कृताः । कूटं शृङ्गम् । यत्र वस्त्रेषु पुष्पाणि सूत्रैः क्रियन्ते स पुष्पपट्टः । ज्वलन्मणिशिखरः शत्रुघ्न ( शत्रु को मारने वाला ), शूरसन या शूरों का सेना पर आक्रमण करने में शूर और प्रजा के कार्य में दक्ष अर्थात् चतुर या दक्षप्रजापति के समान था । इस प्रकार वह मानों पूर्वकाल के समस्त राजाओं की तेजराशि से निर्मित हुआ था । आदिराज पृथु ने पृथिवी को धेनु बनाया था । इसी स्पर्धा में उसने पृथिवी को अपनी महिषी (भैंस, अर्थात् पत्नी) बना दिया । बड़े लोगों की बुद्धि स्वभाव से ही स्वतन्त्र और अपनी रुचि के अनुरोध पर चलने वाली होती है । जैसा कि उस राजा की अनन्य भक्ति किसी के उपदेश के बिना ही सहज रूप में बाल्यकाल से ही भगवान् शंकर में थी, जो भक्तिद्वारा सुलभ, संसार का भरण करने वाले और मोक्ष देने वाले हैं। स्वप्न में भी वह बिना शिव की पूजा किए कुछ भी खाना-पीना न था । वह भगवान् पशुपति शंकर की शरण में प्रपन्न था, जो अज, अजर, देवों के देव, त्रिपुरारि, असंख्य प्रमथ गणों के स्वामी, पार्वती के पति, सारे संसार द्वारा वन्दित चरणों वाले हैं। वह मानता था कि शिव के अतिरिक्त इस संसार में कोई अन्य देवता नहीं। स्वामी के चित्त के अनुसार ही स्वभाव से उसके अनुजीवी लोग भी प्रवृत्त होते हैं। फलतः घर-घर में भगवान् शंकर की पूजा होती थी । चारों ओर उस राजा के देश में होम के थले में पड़ते हुए गुग्गुल की गंध से भरी हुई, शिवजी को दूध से नहलाने में उड़े हुए फुहारों से शीतल, एवं बेल के पत्ते की माला को उड़ाती हुई हवा बहने लगी । पुरवासी, राज्य

तृतीय उच्छ्वासः १६५ विषयेषु वायवः । शिवसपर्यासमुचितैरुपायनैः प्राभृतैश्च पौराः पादोपजी- विनः सचिवाः स्वभुजबलनिर्जिताश्च करदीकृता महासामन्तास्तं सिषे- विरे । तथा हि-कैलासकूटधवलैः कनकपत्रलतालंकृतविषाणकोटिभिर्महा- प्रमाणैः संध्याबलिवृषैः सौवर्णैश्च स्नपनकलशैरर्घभाजनैश्च धूपपात्रैश्च पुष्प- पट्टैश्च मणियष्टिप्रदीपेभ्र्च ब्रह्मसूत्रैश्च महार्हमाणिक्यखण्डखचितैश्च मुखकोषैः परितोषमस्य मनसि चक्रुः । अन्तःपुराण्यपि स्वयमारब्धबालेयतण्डुलक- ण्डनानि देवगृहोपलेपनलोहिततरकरकिसलयानि कुसुमग्रथनव्यग्रसमस्त- परिजनानि तस्याभिलषितमन्ववर्तन्त । तथा च परममाहेश्वरः स भूपालो लोकतः शुश्राव भुवि भगवन्तमपरमिव साक्षाद्दक्षमखमथनं दाक्षिणात्यं बहुविधविद्याप्रभावप्रख्यातैर्गुणैः शिष्यैरनेकसहरुसंख्यैर्व्याप्तमर्त्यलोकं भैरवाचार्यनामानं महाशैवम् । उपनयन्ति हि हृदयमदृष्टमपि जनं शील- स्वर्णयष्टिर्यष्टिप्रदीपः। ब्रह्मसूत्रैर्यज्ञोपवीतैः। मुखयुक्ताः कोषा मुखकोषाः, ये लिङ्गोपरि दीयन्ते । बलये हिता बालेयाः । 'छदिरुपधिवलेर्ढञ्' । ग्रथनशब्दश्चिन्त्यः । ग्रन्थन- मिति भाव्यम् । अभिलषितमन्ववर्तन्तेत्यनेन चित्तानुवृत्तिः शुद्धान्तानां वर्णिता । मुनीनि । भूस्थश्वेऽप्यसुलभवत्त्वद्दर्शनमस्योक्तम् । शीलसंवादाश्चारित्रसादृश्यानि । कपर्दिनी शिवे । के कर्मचारी, मंत्री और भुजबल से पराजित होकर कर देने वाले बड़े-बड़े सामन्त भी भगवान् शिव की पूजा के उपयोग में आने वाले उपहारों से उसकी सेवा करते थे । कैलास के शिखर के समान उज्ज्वल, सोने के पत्तरों से मढ़े सींग के अग्रभाग वाले एवं विशाल आकृति वाले संध्याकालीन पूजा के बैल, स्नान कराने के लिए सोने के कलस, अर्घ्य के पात्र, धूप के पात्र, कढ़े हुए फूलदार कपड़े, मणिनिर्मित यष्टिप्रदीप, यज्ञोपवीत और शिवलिंग पर चढ़ाए जाने वाले मुखकोश को समर्पित करके लोग उसका मन सन्तुष्ट करते थे । अन्तःपुरों में भी उसकी इच्छा के अनुकूल पूजा के लिए स्वयं चावल के फटकने-बनाने का कार्य होता रहता था । देवमन्दिर को स्वयं लीपने से उनके हाथ लाल हो जाते थे । सबके सब परिजन माला गूथने में व्यग्र रहते थे । भगवान् शिव के परम भक्त उस राजा ने लोगों से सुना कि कोई भैरवाचार्य नामक दाक्षिणात्य महाशैव हैं जो साक्षात् भगवान् शंकर के दूसरे अवतार हैं और हजारों की संख्या में गुणों के समान अपने शिष्यों से सारे संसार में प्रसिद्ध हैं । शीलगुण का सम्मिलन पहले कभी न देखे हुए भी व्यक्ति को हृदय के समीप कर देते हैं। क्योंकि वह राजा दूर होने पर भी साक्षात् शिवस्वरूप भैरवाचार्य के विषय में सुनते ही अत्यधिक श्रद्धा करने लगा । आँखों

१६६ हर्षचरितम् संवादाः । यतः स राजा श्रवणसमकालमेव तस्मिन्भैरवाचार्ये भगवति द्वितीय इव कपर्दिनि दूरगतेऽपि गरीयसीं बबन्ध भक्तिम् । आचकाङ्क्ष च मनोरथैरप्यस्य सर्वथा दर्शनम् । अथ कदाचित्पर्यस्तेऽस्ताचलचुम्बिनि वासरेऽन्तःपुरवर्तिनं राजान- मुपसृत्य प्रतीहारी विज्ञापितवती- 'देव ! द्वारि परिव्राडास्ते, कथयति च भैरवाचार्यवचनाद्देवमनुप्राप्तोऽस्मि' इति । राजा तु तच्छ्रुत्वा साद- रम्- 'क्वासौ ? आनयात्रैव, प्रवेशयैनम्' इति चाब्रवीत् । तथा चाकरोत् प्रतीहारी । न चिराच्च प्रविशन्तं प्रांशुम् , आजानुभुजम् , भैक्षक्षाम- मपि स्थूलास्थिभिरवयवैः पीवरमिवोपलक्ष्यमाणम् , पृथूत्तमाङ्गम् . उत्तुङ्गवलिभङ्गस्थपुटललाटम् , निर्मांसगण्डकूपकम् , मधुबिन्दुपिङ्गल- परिमण्डलाक्षम् , ईषदवक्रघोणम् , अतिप्रलम्बैककर्णपाशम् , अला- बुबीजविकटोन्नतदन्तपङ्क्तिम् , तुरगानूकश्मथाधरलेखम् , लम्बचि- न चिराच्चेत्यादौ । मस्करिणमद्राक्षीदिति संबन्धः । प्रांशुं दीर्घम् । जानुरूरुपर्व । उक्तं च- 'जङ्घा तु प्रसृता जानूरुपर्वाष्ठीवद्वस्त्रियाम्' । पीवरं स्थूलम् । स्थपुटं निम्नोन्नतम् । ललाटमलिकं गोधिः । गण्डकूपोऽक्ष्णोरधोदेशः । घोणा नासिका । अलाबुस्तुम्बी । उक्तं च- 'तुम्ब्यलाबू उभे समे' । तुरगानामधस्तादोधोऽनूकः । की तो बात क्या ? वह केवल अपने मन के रथ पर चढ़ कर ही सर्वथा उनके दर्शन की आकांक्षा करने लगा । किसी दिन जब अस्ताचल की ओर दिन ढलने लगा तब प्रतीहारी ने अन्तःपुर में विराजमान महाराज के पास आकर निवेदन किया - 'देव, द्वार पर एक परिव्राजक पधारे हैं और कहते हैं कि भैरवाचार्य की आज्ञा से मै महाराज से भेंट करने आया हूँ।' उसे सुनकर राजा ने बड़े आदर के साथ 'कहाँ हैं ? यहीं लाओ, उन्हें प्रवेश करने दो' यह कहा । प्रतीहारी ने वैसा ही किया । थोड़ी देर में राजा ने प्रवेश करते हुए उस संन्यासी को देखा । उसकी कद लम्बी थी । भुजाएँ घुटनों तक थीं । भिक्षाटन के कारण वह दुबला था फिर भी मोटी हड्डियों वाले अङ्गों से वह भरा-सा प्रतीत होता था । उसका मस्तक चौड़ा था । लम्बी रेखाओं के कारण उसका ललाट नीचा-ऊँचा हो गया था । मांस के न होने से गालों में गड्ढे पड़ गए थे । पुतलियाँ शहद की बूंद की तरह पीलापन लिए थीं । नाक कुछ टेढ़ी थी । कान की एक पाली अधिक लम्बी थी । लौकी के बीज की भाँति दन्त- पंक्ति निकली हुई थी । अधर घोड़े के निचले होठ की तरह लटका हुआ था । लम्बी ठुड्डी के कारण उसका मुँह लम्बोतरा जान पड़ता था । उसके कंधे से लटकता हुआ छाल योग-

तृतीय उच्छ्वासः १६७

बुकायत्ततरलपनम्, अंसावलम्बिना काषायेण योगपट्टकेन विरचितवैक- क्षकम्, हृदयमध्यनिबद्धग्रन्थिना च रागेणेव खण्डशः कृतेन धातुरसा- रुणेन कर्पटेन कृतोत्तरासङ्गम्, पुनरुक्तबालप्रग्रहवेष्टन निश्चलमूलेन बद्ध- मृत्परिशोधनवंशत्वक्तितउना कौपीनसनाथशिखरेण खर्जूरपुटसमुद्गकग- र्भीकृतभिक्षाकपालकेन दारवफलकत्रयत्रिकोणत्रियष्टिनिविष्टकमण्डलुना बहिरुपपादितपादुकावस्थानेन स्थूलदशासूत्रनियन्त्रितपुस्तिकापूलकेन वामकरधृतेन योगभारकेणाध्यासितस्कन्धम्, इतरकरगृहीतवेत्रासनं मस्करिणमद्राक्षीत्। क्षितिपतिरप्युपगतं १मुचितेन चैनमादरेणान्वग्रहीत्। आसीनं च पप्रच्छ - 'क्व भैरवाचार्यः ?' इति। सादरनरपतिवचनमुदि- तमतिस्तु परिव्राट् तमुपनगरं सरस्वतीतटवनावलम्बिनि शून्यायतन स्थितमाचचक्षे। भूयश्चाबभाषे- 'अर्चयति हि महाभागं भगवानाशीर्व-


'अधोऽधरस्य चिबुकम्' । लपनं मुखम् । उत्तरासङ्गमपरिप्रावरणम् । पुनरुक्तं पौनः- पुन्येन कृतम् । प्रग्रहो रज्जुः । तितउश्चालनी परिपवनशब्दवाच्या । कौपीनं गुह्यदेश उपचारात्, तदाच्छादनं च खर्जूराख्यस्य वृक्षस्य च संबन्धिभिः पुटैः क्लृप्तैः, पत्रैश्च समुद्गकः कपालभङ्गो भिक्षायै क्रियते । दारवे काष्ठसंबन्धिनि फल- कत्रये त्रयः कोणास्तेषु यास्तिस्रो यष्टयस्तासु निविष्टः कमण्डलुर्यत्र तेन । योग- भारकेण मात्राभारिकया। मस्करिणं परिव्राजकम् । राजतानि रौप्याणि ।


पट्ट सामने वैकक्षक की तरह पड़ा हुआ था। गेरू से रँग हुए वस्त्र का चादर के रूप में वह ओढ़े था जिसकी गाँठ छाती के बीच में थी, मानों वह वस्त्र उसके द्वारा खण्ड खण्ड किए गए राग का बाह्य रूप था। एक सिरे से बाएँ हाथ में पकड़े हुए बाँस के दूसरे सिरे से उसके कंधे के पीछे लटकती हुई झोली थी। झोली का ऊपरी सिरा बालों की बटी हुई रस्सी से बँधा था। मिट्टी चालने के लिए बाँस की बनी हुई चलनी उसमें बँधी थी। उसके अग्रभाग में कौपीन लटक रहा था। झोली के भीतर खजूर के पत्ते को मोड़कर बनाया हुआ भिक्षाकपाल रखा था। लकड़ी के तीन पट्टों को जोड़ कर बने हुए त्रिकोण के भीतर कमण्डलु रखा हुआ था और उस त्रिकोण के तीन पट्टों में तीन डंडियाँ लगी थीं जिनसे वह बाँस से लटका हुआ था। झोली के बाहर खड़ाऊँ लटक रही थी। कपड़े की मोटी किनारी से बँधे हुए पोथियों के गुटके झोली में रक्खे थे। उसके दाहिने हाथ में बेंत की चटाई थी। पहुँचे हुए उस संन्यासी से राजा आदरपूर्वक मिले। उसके बैठ जाने पर राजा ने पूछा- 'भैरवाचार्य कहाँ हैं?' आदर के साथ कहे हुए राजा के वचन सुनकर


१. मुचितेन नचैनं ।

१६८ हर्षचरितम् चसा' इत्युक्त्वा चोपनिन्थे । योगभारकादाकृष्य भैरवाचार्यप्रहितानि रत्नवन्ति बहलालोकलिप्तानतःपुराणि पञ्च राजतानि पुण्डरीकाणि । नरपतिस्तु प्रियजनप्रणयभङ्गकातरो दाक्षिण्यमनुरुध्यमानो ग्रहणला- घवं च लङ्घयितुमसमर्थो दोलायमानेन मनसा स्थित्वा चिरं कथंकथमप्य- तिसौजन्यनिघ्नस्तानि जग्राह । जगाद च—'सर्वफलप्रसवहेतुः शिवभ- क्तिरियं नो मनोरथदुर्लभानि फलति फलानि । येनैवमस्मासु प्रीयते तत्रभगवान्भुवनगुरुर्भैरवाचार्यः । श्वो द्रष्टास्मि भगवन्तम्' इत्युक्त्वा च मस्करिणं व्यसर्जयत् । अनया च वार्तया परां मुदमवाप । अपरेद्युश्च प्रातरेवोत्थाय वाजिनमधिरुह्य समुच्छ्रितश्वेतातपत्रः समु- द्धूयमानधवलचामरयुगलः कतिपयैरेव राजपुत्रैः परिवृतो भैरवाचार्यं सवितारमिव शशी द्रष्टुं प्रतस्थे । गत्वा च किंचिदन्तरं तदीयमेवाभिमु- खमापतन्मन्यतमं शिष्यमद्राक्षीत् । अप्राक्षीच्च—'क्व भगवानास्ते ?' लङ्घयितुमुत्सोढुम् । निघ्नः स्ववशः । अन्यतममपरम् । उत्तरेणोत्तरास्यां दिशि । उस संन्यासी ने प्रसन्नतापूर्वक सूचित किया की नगर के समीप हीं सरस्वती नदी के तटवर्ती जंगल के एक शून्यायतन में भैरवाचार्य हैं । और फिर बोला—'महाभाग ! आपको भगवान् भैरवाचार्य अपने आशीर्वादवचन द्वारा सम्मानित करते हैं !' यह कहकर उसने भैरवाचार्य द्वारा उपहार के रूप में भेजे हुए रत्नजटित चाँदी के पाँच कमलों को अर्पित किया जो सारे अन्तःपुर को आलोकित कर रहे थे । राजा ने अपने प्रिय भैरवाचार्य के प्रेम के भङ्ग होने के भय से उदारता का अनुरोध करते हुए, दी हुई वस्तु के ग्रहण करने की छुटपन को सहने में असमर्थ, अपने दोलारूढ़ मन से कुछ देर तक ठहर कर किसी-किसी प्रकार अपने सौजन्य के विवश होते हुए उन रत्नों को ले लिया और बोले—'सब प्रकार के फलों को उत्पन्न करने वाली यह शिवभक्ति हमारे मनोरथ भी जिन्हें नहीं प्राप्त करते ऐसे फलों को उत्पन्न करती है । इसी कारण आदरणीय जगद्गुरु भैरवाचार्य हम पर प्रसन्न हैं । कल भगवान् के दर्शन करूँगा ।' यह कहकर उस संन्यासी को विदा किया । इस समाचार से वे अत्यन्त प्रसन्न हुए । दूसरे दिन राजा ने सबेरे ही उठ घोड़े पर सवार हो श्वेत छत्र लगा उज्ज्वल चँवरों से विराजमान हो कुछ राजपुत्रों के साथ भैरवाचार्य के दर्शन के लिए प्रस्थान किया, मानों चन्द्रमा सूर्य की ओर बढ़ता हो । कुछ ही दूर चले कि उन्हीं के सामने आते हुए एक शिष्य को देखा और पूछा—'भगवान् कहाँ हैं ?' उसने कहा—'यहीं पुराने देवी के

[header] तृतीय उच्छ्वासः १६६ [/header]

इति। सोऽकथयत्—'अस्य जीर्णमातृगृहस्योत्तरेण बिल्ववाटिकामध्यास्ते' इति। गत्वा च तं प्रदेशमवततार तुरगात्। प्रविवेश च बिल्ववाटिकां। अथ महतः कार्पटिकवृन्दस्य मध्ये प्रातरेव स्नातम्, दत्ताष्टपुष्पि- कम्, अनुष्ठिताग्निकार्यम्, कृतभस्मरेखापरिहारपरिकरे हरितगोमयो- पलिप्तक्षितितलवितते व्याघ्रचर्मण्युपविष्टम्, कृष्णकम्बलप्रावरणनिभे- नासुरविवरप्रवेशाशङ्कया पातालान्धकारावासमिवाभ्यस्यन्तम्, उन्मि- षता विद्युत्कपिलेनात्मतेजसा महामांसविक्रयक्रीतेन मनःशिलापङ्केनेव शिष्यलोकं लिम्पन्तम्, जटीकृतैकदेशलम्बमानरुद्राक्षशङ्खगुटिकेनोर्ध्व- बद्धेन शिखापाशेन बघ्नन्तमिव विद्यावलेपदुर्विदग्धानुपरिसंचरतः सिद्धान्, धवलकतिपयशिरोरुहेण वयसा पञ्चपञ्चाशतं वर्षाण्यतिक्रा- मन्तम्, खालित्यक्षीयमाणशङ्खलोमलेखम्, लोमशकर्णशष्कुलीप्रदेशम्, पृथुललाटतटम्, तिरःश्यामभस्मललाटिकया बहुशः शिरोर्धधृतदग्ध- गुग्गुलुसंतापस्फुटितकपालास्थिपाण्डुरराजिशङ्कामिव जनयन्तम्, सहज-

अथेत्यादौ । भैरवाचार्यं ददर्शेति संबन्धः। कार्पटिका व्रतिनः । अष्टपुष्पिका प्रागुक्ता। परिहारोऽत्र मर्यादा । शङ्खे ललाटास्थिन। उक्तं च—'शङ्खो निधौ लला- टास्थिन' । गुटिका खण्डिका। उपरीत्याद्यभिप्रायेणोक्तम्— ऊर्ध्वबद्धे( वृद्धे ? )नेति । प्रशस्ता शिखा शिखापाशः। अवलेपोऽहंकृतिः। खालित्यं खल्वाटता। शङ्खो

मन्दिर के उत्तर विल्ववाटिका में आसन लगाए हैं।' उस स्थान पर जाकर वे घोड़े से उतर गए और विल्ववाटिका में प्रवेश किया। साधुओं की जमात के बीच प्रातःस्नान, अष्टपुष्पिका द्वारा शिवार्चन और अग्निहोत्र से निवृत्त होकर भस्म से पुरे चौक के बीच गोबर से लिपी जमीन पर बिछे व्याघ्र-चर्म पर विराजमान भैरवाचार्य को देखा। काले कंबल को ओढ़कर मानों वे असुर-विवर में प्रवेश करने की इच्छा से पाताल के घने अन्धकार में रहने का अभ्यास कर रहे थे। बिजली के समान पीले चमकते हुए अपने तेज से शिष्यों को मानों श्मशान का महामांस बेच कर खरीदे हुए मैनसिल के चन्दन से चर्चित कर रहे थे। एक ओर चोटी में रुद्राक्ष और शंख की गुरियों को गूंथकर लटकाये हुए और चोटी को खड़ी बाँधे हुये मानों विद्या के मद में फूलकर ऊपर-ऊपर उड़ते हुए सिद्धों को बाँध रहे थे। उनके सिर के कुछ बाल सफेद हो गये थे और अवस्था के वह पचपन साल गुजार चुके थे। उनकी गञ्जी खोपड़ी के बाल झड़ चुके थे। कान के भीतर भी बाल जम गए थे। ललाट प्रशस्त था, उसपर भस्म की टेढ़ी और साँवली रेखा से ऐसा लगता था कि उनके सिर पर आधे जले हुए

१७० हर्षचरितम्

ललाटवलिभङ्गसंकोचितकूर्चभागं बभ्रुभासं भ्रूसंगत्या निरन्तरामाया- मिनीमेकामिव भ्रूरेखां बिभ्राणम्, ईषत्काचरकनीनिकेन रक्तापाङ्ग- निर्गतांशुप्रतानेन मध्यधवलभासेन्द्रायुधेनेवातिदीर्घेण लोचनयुगलेन परितो महामण्डलमिवानेकवर्णरागमालिखन्तम्, सितपीतलोहित- पताकावलिशबलम्, शिवबलिमिव दिक्षु विक्षिपन्तम्, तार्क्ष्यतुण्ड- कोटिकुब्जाग्रघोणम्, दूरविदीर्णसृक्कसंक्षिप्तकपोलम्, किंचिदन्तुरतया सदाहृदयसंनिहितहरमौलिचन्द्रातपेनेव निर्गच्छता दन्तालोकेन धवल- यन्तं दिशां जालम्, जिह्वाप्रस्थितसर्वशैवसंहितातिभारेणेव मनाक्प्र- लम्बितौष्ठम, प्रलम्बश्रवणपालीप्रेङ्खिताभ्यां स्फाटिककुण्डलाभ्यां शुक्रबृ- हस्पतिभ्यामिव सुरासुरविजयविद्यासिद्धिश्रद्धयानुबध्यमानम्, बद्धविवि- धौषधिमन्त्रसूत्रपङ्किना सलोहवलयेनैकप्रकोष्ठेन शङ्खखण्डं पूष्णो दन्तमिव भगवता भवेन भग्नं भक्त्या भूषणीकृतं कलयन्तम्, अखिलरसकूपोद्धृ- ललाटास्थि । शष्कुली कुहरम् । 'कूर्चमस्त्री भ्रुवोर्मध्यम्' । काचरा पीतवर्णा । तुण्डं मुखम् । कोटिः प्रान्तः, चञ्च्वग्रम् । 'प्रान्तावोष्ठस्य सृक्किणी, प्रकोष्ठमन्तरं विद्यादर- त्निमणिबन्धयोः' । पूष्णो रविभेदस्य । पुरा दक्षयज्ञगतस्य हरं निन्दतः 'मय्यनागते किमर्थमागतोऽस्मि' इति मुष्टिप्रहारेण हरेण दन्ता भग्नाः। तत्करस्पर्शन पावनत्वात्तन्न गुग्गुल की गरभी से फूटी कपाल की खोपड़ी सफेद दिखाइ दे रही हो । माथ पर सिकन पड़ने से भौंहों के बीच का हिस्सा सिकुड़ गया था और दोनों भौंहों के मिल जाने से एक भ्रूरेखा बन गई थी । आँखों की पुतली कच्चे काँच की तरह पीले रङ्ग की थी और लाल अपाङ्गों से निकलती हुई किरणें मध्य में सफेद इन्द्रायुध के दृश्य को उत्पन्न कर रही थीं । ऐसा लग रहा था कि साधना करने के लिये वे अनेक रङ्गों वाले महामण्डल की रचना कर रहे थे । सफेद, पीली, लाल झण्डियों से रङ्ग-बिरङ्ग के लग रहे थे । दिशाओं में शिव की बलि छोड़ रहे थे । गरुड़ की टोर के समान उनकी नाक का अग्रभाग झुका हुआ था । ओठ के बगल की दूर तक कटाव से उनके कपोल छोटे लग रहे थे । हमेशा उनके हृदय में सन्निहित रहने वाले भगवान् शिव के मस्तक की चन्द्रकिरणों के समान दाँतों की टेढ़ी रश्मियाँ निकलकर दिशाओं को धवलित कर रही थीं, मानों जीभ के अग्रभाग में स्थित समस्त शैवसंहिताओं के भारी बोझ से उनका ओष्ठ नीचे की ओर लटका हुआ था । कान की लम्बी पालियों में स्फटिक के कुंडल लटक रहे थे, मानों देवताओं और असुरों पर विजय पाने के लिये विद्या सीखने की श्रद्धा से शुक्र और बृहस्पति उनके पीछे लगे हों । एक हाथ में लोहे के कड़े में पिरोया हुआ शंख का टुकड़ा पहने थे, जिसमें

तृतीय उच्छ्वासः १७१ नघटीयन्त्रमालामिव रुद्राक्षमालां दक्षिणेन पाणिना भ्रमयन्तम्, उरसि दो- लायमानेनापिङ्गलाग्रेण कूर्चककलापेन संमार्जयन्तमिवान्तर्गतं निजरजो- निकरम्, अतिनिबिडनीललोममण्डलविचितं च ध्यानलब्धेन ज्योतिषा दग्धमिव हृदयदेशं दधानम्, ईषत्प्रशिथिलवलिवलयबध्यमानतुन्दम्, उप- चीयमानस्फिङ्मांसपिण्डकम्, पाण्डुरपवित्रक्षौमावृतकौपीनम्, सावष्टम्भ- पर्यङ्कबन्धमण्डलितेनामृतफेनश्वेतरुचा योगपट्टकेन वासुकिनेवाप्रतिहता- नेकमन्त्रप्रभावाविर्भूतेन प्रदक्षिणीक्रियमाणम्, अरुणतामरससुकुमारतर- तलस्य पादयुगलस्य निर्मलैर्नखमयूखजालैर्जर्जयन्तमिव महानिधानो- द्धरणरसेन रसातलम्, तोयक्षालितशुचिना धौतपादुकायुगलेन हंसमिथु- नेनेव भागीरथीतीर्थयात्रापरिचयागतेनामुच्यमानचरणान्तिकम्, शिख- रनिखातकुब्जकालायसकण्टकेन वैणवेन विशाखिकादण्डेन सर्वत्रिगासि- भक्तिः। अखिलस्य रसस्य कूपादुद्धनाय घटीयन्त्रमालापि भ्राम्यते। दोलाय- मानत्वेन संमार्जनसंभावना। कलापग्रहणं मार्जनीसादृश्यार्थम्। रजो रागः, रेणुश्च। विचितं व्याप्तम्। तुन्दमुदरम्। स्फिजावुभयत्र प्रसिद्धे। 'स्त्रियां स्फिजौ कटिप्रीथौ' इत्यमरः। फेनवत्तैश्च श्वेता। वासुकिनेवेति। न सामान्येनेति प्रभावपरिशोधकम्। जर्जयन्तं खण्डशः कुर्वाणम्। तोयेत्यादि। हंसमिथुनस्यापि विशेषणम्। शिखरे- त्यादिनाङ्कुशसादृश्यं विशाखिकादण्डस्योक्तम्। निखात उत्कीर्णः। कालायसं शस्त्र- अनेक औषधियां मन्त्र और सूत्र के अक्षर लिखकर बँधे थे, मानों उस शंख के टुकड़े के रूप में भगवान् शिव द्वारा तोड़े गए पूषा के दाँत को उन्होंने भक्ति से आभूषण बना लिया था। दाहिने हाथ में रुद्राक्ष की माला को घुमा रहे थे, मानों सारे रस को निकाल लेने के लिए रहट चला रहे थे। छाती पर पीले अग्रभाग वाली दाढ़ी लहरा रही थी, मानों हृदय के रजोविकार को झाड़ रहे थे। घने और नीले भरे रोंगटे को देखकर लगता मानों ध्यान से प्राप्त ज्योति के कारण जले हुए हृदय को धारण कर रहे हों। उदर में वलियाँ पड़ गई थीं। नितम्ब का मांस बढ़ गया था। उनका कौपीन उज्ज्वल और पवित्र क्षौम वस्त्र से ढका हुआ था। वीरासन लगाकर विराजमान उनके चारों ओर अमृतफेन के समान योगपट्ट घिरा हुआ था मानों उनके विफल न होने वाले मन्त्रों के प्रभाव से प्रकट होकर वासुकि नामक नागराज उनकी प्रदक्षिणा कर रहा हो। लाल कमल के समान सुकुमार तलवे वाले दोनों चरणों के नखों की निर्मल किरणें फैल रही थीं, मानों बहुमूल्य निधि को निकालने के लिए पाताल को विदीर्ण कर रहे थे। पैरों के पास पानी से धुला हुआ पवित्र खड़ाउओं का जोड़ा रखा हुआ था, मानों गङ्गा के तीर्थों में विचरने के समय परिचय हो जाने से हंसों का जोड़ा साथ लग गया हो। पास में बाँस का बैसाखी दण्ड।

१७२ हर्षचरितम् द्धिविघ्नविनायकापनयनाङ्कुशेनेव सततपार्श्ववर्तिना विराज मानम् , अबहु- भाषिणं मन्दहासिर्न सर्वोपकारिणं कुमारब्रह्मचारिणम् , अतितपस्विनम् , महामनस्विनं कृशक्रोधम् , अकृशानुरोधम् , महानगरमिवादीनप्रकृतिशो- भितम् , मेरुमिव कल्पतरुपल्लवराशिसुकुमारच्छायम् , कैलासमिव पशुपति- चरणरजःपवित्रितशिरसम् , शिवलोकमिव माहेश्वरगणानुयातम् , जलनिधिमिवानेकनदनदीसहस्रप्रक्षालितशरीरम् , जाह्नवीप्रवाहमिव बहु- पुण्यतीर्थस्थानशुचिम् , धाम धर्मस्य, तीर्थं तथ्यस्य, कोशं कुशलस्य, पत्तनं १ पूततायाः, शाला शोलस्य, क्षेत्रं क्षमायाः, शालेयं शालीनतायाः, स्थानं स्थितेः, आधारं धृतेः, आकरं करुणायाः, निकेतनं कौतुकस्य, आरामं रमणीयकस्य, प्रासादं प्रसादस्य, आगारं गौरवस्य, समाजं भेदः । विशाखिका खनित्रिका । विघ्नोऽन्तरायः । विनायको गजाननः । प्रकृतिः स्वभावः, मायादिका च । राशिवत्तेन च सुकुमाराः । गणाः समूहाः, प्रमथाश्च । नदनदीत्येकशेषो युक्तः । सहस्रेषु तैः प्रक्षालितशि(शरी ? ) राः । तीर्थेषु यत्स्थानं वसनं तेन शुचिम् । तीर्थस्नानः कनखलाद्यवस्थितिभिश्च शुचिः । शालीनता विनी- तत्वम् । निकेतनं गृहम् । तत्र हि सर्वस्य कौतुकं जायते । था जिसके सिरे पर टेढ़ा लोहे का कोल जड़ा हुआ था मानो समस्त विद्याओ का सिद्धि में विघ्न पहुँचाने वाले विघ्नराज गजानन को हटाने के लिये अंकुश हो । वे बहुत कम बोलने वाले, मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए, सब प्रकार के उपकारी, आजन्म ब्रह्मचारी, महा- तपस्वी, महामनस्वी, क्रोधरहित और समाहृत थे । महानगर की भाँति उनकी प्रकृति (स्वभाव या नागरिक जन) अदीन अर्थात् दीनतारहित थी । सुमेरु के समान कल्पवृक्ष के पल्लव की भाँति उनकी कान्ति थी (सुमेरु पर कल्पवृक्ष के पत्तों की छाया रहती है) । भगवान् शिव के चरणों की धूल से उनका सिर पवित्र था जैसे कैलास पर्वत शिव की चरणधूलि से पवित्र होता है। शैव लोग उनके साथ थे जैसे शिवलोक में प्रमथगण रहते हैं। अनेक नद और नदियों में उन्होंने अपने शरीर को समुद्र की भाँति प्रक्षालित किया था । वे अनेक पुण्यतीर्थों में भ्रमण करके गङ्गा के प्रवाह की भाँति पवित्र हो चुके थे । वे धर्म के धाम, सत्य के तीर्थ, कुशल के कोश, पवित्रता के नगर, शीलगुण के गृह, क्षमा के क्षेत्र, नम्रता के निवासस्थान, मर्यादा के स्थान, धैर्य के आधार, करुणा के खान, कौतूहल के निकेतन, सौन्दर्य के उपवन, प्रसन्नता के प्रासाद, गौरव के गृह, सौजन्य के १. पत्तनं पूततायाः ।

तृतीय उच्छ्वासः १७३ सौजन्यस्य, संभवं सद्भावस्य, कालं कलेः, भगवन्तं साक्षादिव विरू- पाक्षं भैरवाचार्य ददर्श । भैरवाचार्यस्तु दूरादेव राजानं दृष्ट्वा शशिनमिव जलनिधिश्चचाल । प्रथमतरोत्थितशिष्यलोकम्रोत्थाय प्रत्युज्जगाम । समर्पितश्रीफलोपायनश्च जह्नुकर्णसमुद्गीर्यमाणगङ्गाप्रवाहह्लादगम्भीरया गिरा स्वस्तिशब्दमकरोत् । नरपतिरपि प्रीतिविस्तार्यमाणधवलिम्ना चक्षुषा प्रत्यर्पयन्निव बहुत- राणि पुण्डरीकवनानि ललाटपट्टपर्यस्तेन चोदंशुना शिखामणिना महेश्व- रप्रसादमिव तृतीयनयनोद्गमेन प्रकाशयन्नावर्जितकर्णपल्लवपलायमानमधु- करः शिवसेवासमुन्मूलिताशेषपापलवमुच्यमान इव दूरादवनतः प्रणाम- मभिनवं चकार । आचार्योऽपि—'आगच्छ अत्रोपविश' इति शार्दूलच- र्मात्मीयमदर्शयत् । उपदर्शितप्रश्रयस्तु राजा मत्तहंसकलगद्गदस्वरसुभगां मधुरसमय महानदीमिव प्रवर्तयन्वाचं व्याजहार—'भगवन् ! नार्हसि शश्यपि राजा तं च दूरादेव दृष्ट्वा जलनिधिश्चलति । गाम्भीर्याच्च जलनिधिरेवे- त्युक्तम् । बिल्वं श्रीफलम् । गङ्गेत्यादिना पवित्रत्वमाह । धवलिम्नेत्यनेन पुण्डरीकाणां धवलत्वमाह । प्राभृतपुण्डरीकाणां राजतत्त्वात् । आवर्जितं स्वरवच्च तेन शुभगात् । शार्दूलो व्याघ्रः । समाज, सद्भाव के उत्पत्तिस्थान एव काल के अन्तक थे । इस प्रकार वे साक्षात् शिव के समान लग रहे थे । भैरवाचार्य दूर से ही राजा को देखकर उस प्रकार चल पड़े जैसे समुद्र चन्द्रमा को देखकर उमड़ उठता है । पहले ही उठे हुए शिष्यों को साथ लेकर राजा के पास पहुंचे और श्रीफल का उपहार भेंट किया। तब जह्नु के कर्णकुहर से निकलते हुए गंगा-प्रवाह की ध्वनि के समान गम्भीर वाणी द्वारा 'स्वस्ति' शब्द का उच्चारण किया । राजा ने प्रीति से आँखों की सफेदी को बढ़ाते हुए देखा मानों बहुत से कमलबनों को उनके स्वागत में अर्पित कर रहा हो । ललाट में लगी हुई शिखामणि के ऊपर की ओर फैलती हुई किरणों से मानों भगवान् शंकर के तीसरे नेत्र से प्राप्त प्रसाद को धारण कर रहा हो। जब वह झुकने लगा तब उसके कर्णपल्लव पर बैठे हुए भौंरे उड़े मानों भगवान् शिव को सेवा करने से उसके पाप उड़े जा रहे हों। इस प्रकार उसने दूर ही से झुककर प्रणाम किया । आचार्य ने भी 'आओ, यहाँ बैठो' यह कह कर अपने व्याघ्रचर्म की ओर निर्देश किया । विनय प्रकट करते हुए राजा ने मत्त कलहंस की आवाज की भाँति सुन्दर, मधु रस की महानदी को मानों प्रवाहित करते हुए कहा—'भगवन्, मुझे आप दूसरे

१७४ हर्षचरितम् मामन्यनृपस्खलितैः खलीकर्तुम्। अशेषराजकोपेक्षिताया हतलक्ष्म्याः खल्वयं शीलापराधो द्रविणदौरात्म्यं वा यदेवमाचरति मयि गुरुः। अभूमिरयमुपचाराणाम्। अलमतियन्त्रणया। दूरस्थितोऽपि मनोरथ- शिष्योऽयं जनो भवताम्। माननीयं च गुरुवन्नोल्लङ्घनमर्हति गुरो- रासनम्। आसतां च भवन्त एवात्र' इति व्याहृत्य परिजनोपनीते वास- सि निषसाद। भैरवाचार्योऽपि प्रीत्यानतिक्रमणीयं नृपवचनमनुवर्तमानः पूर्ववत्तदेव व्याघ्राजिनमभजत। आसीने च सराजके परिजने शिष्यजने च समुचितमर्घ्यादिकं चक्रे। क्रमेण च नृपमाधुर्यहृतान्तःकरणः शशिकरनिकरविमला दशन- दीधितीः स्फुरन्तीः शिवभक्तिरिव साक्षाद्दर्शयन्नुवाच—'तात ! अतिनम्र- तैव ते कथयति गुणानां गौरवम्। सकलसंपत्पात्रमसि। विभवानु- रूपास्तु प्रतिपत्तयः। जन्मनः प्रभृत्यदत्तदृष्टिरेवास्मि स्वापतेयेषु। यतः सकलदोषकलापानलेन्धनैर्धनैरविक्रीतं कचिच्छरीरकमस्ति। भैक्षरक्षिताः अन्तःकरणं मनः। गौरवमुत्कर्षः, भारवत्त्वं च। अदत्तदृष्टिरिति। न तु मया धनान्यलभ्यानि। स्वापतेयेषु धनेषु। संरक्षिता इति। यदि कदाचित्क्वचिदुपयोगं राजाओं की भाँति दोषों से भरा न समझें। समस्त राजाओं से उपेक्षित राजलक्ष्मी का यह चरित्र-दोष और धन का मद है जो मेरे लिए गुरु आप इस प्रकार व्यवहार कर रहे हैं। मैं ऐसे उपचारों का पात्र नहीं हू। मेरे लिए यह क्लेश ठीक नहीं। दूर रहकर भी मनोरथ से आपका शिष्य बना हुआ यह जन आपका है। गुरु के समान ही माननीय इस आसन पर मैं अपना पैर नहीं रख सकता। आप ही इसपर विराजें।' यह कहकर परिजन द्वारा लाए हुए वस्त्र पर बैठे। भैरवाचार्य ने भी प्रेम से राजा की बात मान ली और पहले के समान उसी व्याघ्रचर्म पर आसीन हो गए। राजा लोग, परिजन और शिष्य जब बैठे तो भैरवाचार्य ने अर्घ्य आदि द्वारा उचित सत्कार किया। राजा के रसीलेपन को देख हृदय से आकृष्ट हो भैरवाचार्य चन्द्रमा की चाँदनी की भाँति अपने दाँतों की किरणों के रूप में भगवान् शिव की भक्ति प्रदर्शित करते हुए बोले—'राजन्, आपको यह अत्यन्त नम्रता ही गुणों का उत्कर्ष बता रही है। सब प्रकार की सम्पत्ति के तुम पात्र हो। ऐश्वर्य के अनुरूप ही मनुष्य की चित्तवृत्तियाँ होती हैं। मैंने जन्म से लेकर धन की ओर दृष्टिपात नहीं किया। दोष की अग्नियों को ईंधन की भाँति भड़काने वाले धन पर यह मेरी तुच्छ देह बिकी नहीं है। भीख मांग कर

तृतीय उच्छ्वासः १७५ सन्ति प्राणाः । दुर्ग्रहीतानि कतिचिद्विद्यन्ते विद्याक्षराणि । भगवच्छिव- भट्टारकपादसेवया समुपाजिताः कियत्योऽपि संनिहिताः पुण्यकणिकाः । स्वीक्रियतां यदत्रोपयोगार्हम् । प्रतनुलुणग्राह्याणि कुसुमानीव हि भवन्ति सतां मनांसि । अपि च, विद्वत्संमताः श्रूयमाणा अपि साधवः शब्दा इव सुधीरेऽपि हि मनसि यशांसि कुर्वन्ति । विवरं विशतः कुतूहलस्य फेनध- वलैः स्रोतोभिरिवापह्रियमाणो गुणगणैरानीतोऽस्मि कल्याणिना' इति । राजा तु तं प्रत्यवादीत्—भगवन् ! अनुरक्तेष्वपि शरीरादिषु साधूनां स्वामिन एव प्रणयिनः । युष्मद्दर्शनादुपार्जितमेव चापरिमितं कुशल- जातम् । 'अनेनैवागमनेन स्पृहणीयं पदमारोपितोऽस्मि गुरुणा' इति विविधाभिश्च कथाभिश्चिरं स्थित्वा गृहमगात् । अन्यस्मिन्दिवसे भैरवाचार्योऽपि राजानं द्रष्टुं ययौ । तस्मै च राजा सान्तःपुरं सपरिजने सकोषमात्मानं निवेदितवान् । स च विहस्योवाच- यास्यन्तीति । अनेन प्राणादिदानमेवोचितमित्युक्तम् । सकलसंपत्पात्रस्येयतः कियती वसुसंपत्तिर्भविष्यतीत्याशङ्क्याह—प्रतन्वित्यादि । गुणा उत्कर्षाः, तन्तवश्च । कुसुमानीवेति । कुसुमसादृश्येन मनसः सौकुमार्यमप्युक्तम् । साधवः शिष्टाः, शब्दा इव साधवः । संस्कृता विद्वत्संमताश्च । फेनवत्तैश्च धवलैर्गुणगणैः, स्रोतोभिश्च । स्वामिन एव प्रणयिन इति । अनुक्तान्यपि शरीरादीनि प्रणयिनां स्वायत्तानीत्यर्थः । मैने प्राणों की रक्षा की है। विद्या के कुछ अक्षरों को कठिनाई से सीख पाया हूँ। भगवान् शिवभट्टारक की सेवा करके कुछ पुण्य संगृहीत किए हैं। यहाँ आपके उपयोग की जो वस्तु हो उसे स्वीकार कीजिए । सज्जनों के मन थोड़े से गुणों के कारण फूलों की भाँति ग्रहण करने योग्य हो जाते हैं। शब्दों के समान सुने गए विद्वानों के अभिमत शब्द सुधीर मन को भी प्रभावित कर देते हैं। कल्याणभाजन तुमने हृदय में प्रवेश करते हुए कुतू- हल की फेनधवलधारा के समान अपने गुणों द्वारा तुमने खींच कर मुझे यहाँ आने के लिए विवश किया ।' राजा ने भैरवाचार्य से कहा—'जैसे शरीर बिना कहे ही अपने अधीन होता है उसी प्रकार सज्जन लोग भी प्रेमी जनों के वश में रहते हैं। आपके दर्शन से अनन्त कुशल- लाभ हुआ । आपने इस ओर पधार कर मुझे स्पृहणीय पद पर प्रतिष्ठित कर दिया।' इस प्रकार देर तक ठहर कर बातचीत के बाद घर लौट आए । दूसरे दिन भैरवाचार्य भी राजा को देखने के लिए पधारे। उनके स्वागत में राजा ने १. कृतमनेनैवानुगमनेन ।

१७६ हर्षचरितम् 'तात ! क्व विभवाः, क्व च वयं वनवर्धिताः ? धनोष्मणा म्लायत्यलं लतेव मनस्विता। खद्योतानामिवास्माकमियमपरोपतापिनो राजते तेजस्विता। भवादृशा एव भाजनं भूतेः' इति स्थित्वा च कंचि- त्कालं जगाम। परिव्राट् तेनैव क्रमेण पञ्च पञ्च राजतानि पुण्डरीकाण्युपायनी- चकार। एकदा तु श्वेतकर्पटावृतं किमप्यादाय प्राविशत्। उपविश्य च पूर्ववत्स्थित्वा मुहूर्त्तमब्रवीत्—'महाभाग ! भवन्तमाह भगवान्यथा- स्मच्छिष्यः पातालस्वामिनामा ब्राह्मणः । तेन ब्रह्मराक्षसहस्ता- दपहृतो महासिरट्टहासनामा। सोऽयं भवद्भुजयोग्यो गृह्यताम्' इत्यभिधायापहृतकर्पतावच्छादनात्परिवारादाचकर्ष शरद्गगनतलमिव पिण्डतां नीतम्, कालिन्दीप्रवाहमिव स्तम्भितजलम् , नन्दकजिगीषया कृष्णकोपितं कालियमिव कृपाणतां गतम्, लोकविनाशाय प्रकाशितधा- खद्योताः कीटमयाः। महाभागेति प्रस्तुतानुगुणमामन्त्रणम् । परिवारादाचकर्ष कृपाणमिति संबन्धः । पिण्डं शस्त्रम्। उक्तं च—'लोहोऽस्त्री शस्त्रकं तीक्ष्णं पिण्डं कालायसायसी' इति । स्तम्भितं धृतं रक्षितमन्तर्जलं यस्य तम्। किल कृपाणस्य वा पानीयं यन्त्रेण क्रियते। नन्दको विष्णुखड्गः। कालियो नागभेदः। धाराणामासारः, धारारूप- श्चासारो धारासारः। दन्तमण्डलं दन्तचक्रवालम, दशनसमूहश्च। मुष्टिः त्सरुः. अन्तःपुर, परिजन और सम्पत्ति के साथ अपने आपको भेंट किया। उन्होंने हँस कर कहा—'राजन्, कहाँ ये सम्पत्तियाँ और कहाँ जंगल के वासी हम ! मनस्विता धन की गरमी से झुलस जाती है। खद्योतों के समान दूसरों को सन्तप्त न करने वाली यह हमारी तेजस्विता ही बहुत है। आप जैसे लोग ही ऐश्वर्य के भाजन हैं।' इस प्रकार कुछ ठहर कर चले गए। भैरवाचार्य के शिष्य ने उसी क्रम से चाँदी के पाँच कमलों को भेंट में अर्पित किया। एक समय वह उजले वस्त्र से ढँककर कुछ लिए हुए पहुँचा । पहले की तरह बैठकर क्षण भर के बाद बोला—'महाभाग, भगवान् ने आप से कहा है कि पातालस्वामी नाम का एक ब्राह्मण मेरा शिष्य है । उसने ब्रह्मराक्षस के हाथ से अट्टहास नामक कृपाण छीना है। वह आपके हाथ में रहने योग्य है।' यह कहकर उसने ऊपर का वस्त्र हटाकर म्यान से उस कृपाण को खींच लिया, मानों आकाश ही शस्त्र बना हो, यमुना का प्रवाह ही रुक गया हो, कृष्ण के प्रति कुपित कालियनाग ने उनके नन्दक नामक खड्ग को जीतने की इच्छा से मानों कृपाण का रूप धर लिया हो। संसार के विनाश के लिए धाराजल की

तृतीय उच्छ्वासः १७७ रासारम्, प्रलयकालमेघखण्डमिव नभस्तलात्पतितम्, दृश्यमानविकट- दन्तमण्डलं हासमिव हिंसायाः, हरिबाहुदण्डमिव कृतदृढमुष्टिग्रहम्, सकलभुवनजीवितापहरणक्षमेण कालकूटेनेव निर्मितम्, कृतान्तकोपान- लतप्तेनेवायसा घटितम्, अतितीक्ष्णतया पवनस्पर्शनापि रुषेव क्वणन्तम्, मणिसभाकुट्टिमपतत्प्रतिबिम्बच्छद्मनात्मानमपि द्विधेव पाटयन्तम्' अरिशिरश्छेदलग्नैः कचैरिव किरणैः करालितधारम्, मुहुर्मुहुस्तडिदु- न्मेषतरलैः प्रभाचक्रच्छुरितैर्जर्जरितातपम्, खण्डशश्छिन्दन्तमिव दिव- सम्, कटाक्षमिव कालरात्रेः, कर्णोत्पलभिव कालस्य, ओंकारमिव क्रौर्यस्य, अलंकारमहंकारस्य, कुलमित्रं कोपस्य, देहं दर्पस्य, सुसहायं साहसस्य, अपत्यं मृत्योः, आगमनमार्गं लक्ष्म्याः, निर्गमनमार्गं कीर्तेः, कृपाणम्। अवनिपतिस्तु तं गृहीत्वा करेणायुधप्रीतया प्रतिमानिभेनालिङ्गन्निव सुचिरं ददर्श। संदिदेश च—'वक्तव्यो भगवान्परद्रव्यग्रहणावज्ञादुर्विदग्ध- मपि हि मे मनो युष्मद्विषये न शक्नोति वचनव्यतिक्रमव्यभिचारमाच- रितुम्' इति। परिव्राट् तु गृहीते तस्मिन्परितुष्टः 'स्वस्ति भवते। असुरभेदश्च । अतितीक्ष्णतयति । तंक्ष्ण्यं तानवाद्भवति, तनु च परस्परस्पर्शेन क्वणति । तथा चातितीक्ष्णोऽतिदण्डप्रकृती रोषेण हुंकरोति । कचैः केशः । करालिता व्याप्ताः । वर्षा करता हुआ प्रलयकालीन मेघ का टुकड़ा हो । दीख पड़ती हुई दाँतियों के मण्डल वाला मानों हिंसा का ही हास हो । भगवान् कृष्ण के बाहुदण्ड के समान उसकी मूंठ दृढ़ थी । सारे संसार के प्राणों को हर लेने के लिए मानों वह विष से बना हो । यमराज की क्रोधाग्नि में तपाए हुए लोहे से मानों बनाया गया हो । उसकी धार इतनी तेज थी कि हवा के भी लगने से उसमें आवाज-सी निकलती । मणि के जड़ावों पर पड़ती हुई अपनी छाया के व्याज से मानों अपने आपके भी दो टुकड़े कर रहा हो । उसकी धार से किरणें निकल रही थीं मानों शत्रु के सिर काटने से उसमें बाल चिपट गए हों । बार-बार बिजली की तरह चमक वाली प्रभा से वह आतप को जर्जर बना रहा था, मानों दिन का खण्ड- खण्ड कर रहा हो । वह मानों कालरात्रि का कटाक्ष, काल का कर्णोत्पल, क्रूरता का ओंकार, अहंकार का अलंकार, कोप का कुलमित्र, दर्प का शरीर, साहस का सहायक, मृत्यु का वंशज, लक्ष्मी के आने का मार्ग और कीर्ति के निकलने का मार्ग था। राजा ने उसे हाथ में लेकर आयुध के प्रति स्वाभाविक प्रेम के कारण मानों प्रतिमा के समान उसका आलिङ्गन करते हुए देखा और संदेश दिया—'भगवान् भैरवाचार्य से कहना कि दूसरे के धन को तिरस्कार की दृष्टि से देखने वाला मेरा मन आपकी बात का १२ ह० च०

१७८ हर्षचरितम् साधयामः' इत्युक्त्वा निरयासीत् । नृपश्च प्रकृत्या वीररसानुरागी तेन कृपाणेनामन्यत करतलवर्तिनीं मेदिनीम् । अथ व्रजत्सु दिवसेष्वेकदा भैरवाचार्यो राजानमुपह्वरे सोपग्रहम- वादीत्—'तात ! स्वार्थांलसाः परोपकारदक्षाश्च प्रकृतयो भवन्ति भव्या- नाम् । भवादृशां चार्थिदर्शनं महोत्सवः प्रणयनमाराधनमर्थग्रहणमु- पकारः । भूमिरसि सर्वलोकमनोरथानाम् । येनाभिधीयसे । श्रूयताम् । भगवतो महाकालहृदयनाम्नो महामन्त्रस्य कृष्णस्रग्गम्बराऽनुलेपनेनाकल्पेन कल्पकथितेन महाश्मशाने जपकोट्या कृतपूर्वसेवोऽस्मि । तस्य च वेतालसाधनावसाना सिद्धिः । असहायैश्च सा दुरवापा । त्वं चालमस्मै कर्मणे । त्वयि च गृहीतभरे भविष्यन्त्यपरे सहायास्त्रयः । एकः स एवा- स्माकं टीटिभनामा बालमित्रं मस्करी यो भवन्तमुपतिष्ठते । द्वितीयः स साधयामः स्वकर्मसिद्धिं विदध्मः । मङ्गलवाङ्मुच्छाम इति नोक्तम् । उपह्वरे प्रच्छन्ने । सोपग्रहं साभ्यर्थनम् । प्रणयनं याचनम् । मनोरथानामिति । रथाश्च भूमौ वहन्ति । आकल्पेन वेशेन । इतिकर्तव्यताकलापोपदेशको ग्रन्थः कल्पः । अलं पर्याप्तः । उपतिष्ठत इति संगतिकरणे तङ् । परिग्रहणं स्वीकारः । उल्लङ्घन नहीं कर सकता।' राजा के कृपाण ले लेने पर उस परिव्राजक ने सन्तुष्ट होकर कहा—'आपका कल्याण हो, मैं चला ।' यह कहकर वापिस लौट गया । स्वभाव से ही वीर रस में अनुराग करने वाले राजा ने उस कृपाण के द्वारा सारी पृथिवी को अपने हाथ में आई हुई समझा । बहुत दिनों के बाद एक समय भैरवाचार्य ने राजा से निवेदन किया—'राजन्, सज्जन लोग स्वभाव से ही अपने कार्य में उदासीन और परोपकार करने में चतुर होते हैं । आप जैसे लोग याचकों को देखकर बड़ा उत्सव मानते हैं, उनके माँगने से अपने को सम्मानित समझते हैं और दी हुई वस्तु को उनके द्वारा ले लेने पर अपने आपको अत्यन्त उपकृत मानते हैं । जनता की समस्त इच्छाओं के आप केन्द्र हैं । इसलिए कह रहा हूँ, सुनें—शास्त्रोक्त विधि के अनुसार महाश्मशान में काली माला और काला वस्त्र पहन एवं चन्दन लगा मैंने एक कोटि जप किया है । बेताल की साधना में उस मन्त्र की सिद्धि का अन्त होता है । असहाय लोग उस सधना को नहीं कर पाते । आप इस कार्य में समर्थ हैं । अगर इस भार को स्वीकार करते हैं तो आपके तीन साथी और मिलेंगे । एक तो वही टीटिभ नाम का मेरा बचपन का सुहृद् संन्यासी जो आपके पास आता रहता है, दूसरा वह पातालस्वामी और तीसरा कर्णताल नाम का द्रविड़ देश का रहने वाला मेरा ही

पातालस्वामी। अपरो मच्छिष्य एव कर्णतालनामा द्राविडः। यदि साधु मन्यसे ततो नीयतामयं दिङ्नागहस्तदीर्घो गृहीताट्टहासो निशा- मेकामेकदिक्खावर्गलतां बाहुः।' इति कृतवचसि च तस्मिन्नन्धकारप्रविष्ट इव दृष्टप्रकाशः प्राप्तोपकारावकाशः प्रमुदितेनान्तरात्मना नरेन्द्रः सम- भाषत—'भगवन् ! परमनुगृहीतोऽस्म्यनेन शिष्यजनसामान्येन निदेशेन कृतपरिग्रहमिवात्मानमवैमि' इति । ननन्द च तेन नरेन्द्रव्याहृतेन भैरवाचार्यः। चकार च संकेतम्—'अस्यामेवागामिन्यामसितपक्षचतुर्द- शोन्नपायामित्यां वेलायाममुष्मिन्महाश्मशानसमीपभाजि शून्यायने शस्त्रद्वितीयेनायुष्मता द्रष्टव्या वयम्' इति । अथातिक्रान्तेष्वहःसु प्राप्तायां च तस्यामेव कृष्णचतुर्दश्यां शैवेन विधिना दीक्षितः क्षितिपो नियमवानभूत्। कृताधिवासं च संपादितगन्ध- धूपमाल्यादिपूजं खड्गमट्टहासमकरोत् । ततः परिणते दिवसे केनापि कर्मसाधनाय कृतरुधिरबलिविधानास्विव लोहितायमानासु दिक्षु, रुधि- रवलिलम्पटासु च वेतालजिह्वास्रिव लम्बमानासु च रविदीधितिषु, नरेन्द्रानुरागेण गृहीतापरदिशि स्वयमिव दिक्पालतां चिकीर्षति सवि-


दीक्षितः कृतनियमः। अधिवासो नियमदिवसादाद्येऽहनि यथाशास्त्रं विधिना मन्त्रन्यासादिः। पर्वपूजेति यावत् । तत इत्यादौ । ततोऽस्मिन्सति राजा नग- शिष्य। यदि आप ठीक समझते हैं तो दिङ्नाग की सूँड़ के समान लम्बे अपने भुज में अट्टहास लेकर एक दिशा की रक्षा करते हुए एक रात ठहरिए।' भैरवाचार्य के इस प्रकार कहने पर अन्धकार में पड़े हुए राजा ने मानों प्रकाश को देख लिया। उपकार करने का अवसर देखकर प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने कहा—'भगवन्, आपने सामान्य शिष्यजन की भाँति मुझे स्वीकार करके जो आज्ञा दी इससे मैं आपका अत्यन्त अनुगृहीत हूं।' राजा की इस बात से भैरवाचार्य अत्यन्त प्रसन्न हुए और इशारा किया—'इसी आने वाली कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की रात को महाश्मशान के समीप वाले शून्यायतन में केवल हाथ में तलवार लेकर आप हमसे मिलें।' कई दिनों के बाद उस कृष्ण चतुर्दशी के दिन राजा शैवविधि से दीक्षित होकर व्रत में लग गया और पहले दिन ही अभिमंत्रित करके गन्ध, धूप, माला आदि से अट्टहास नामक खङ्ग की पूजा की। तब सन्ध्या हो गई। दिशायें इस प्रकार लाल हो गईं जैसे किसी ने वेतालसाधना के लिए रुधिर की बलि चढ़ाई हो। सूर्य की किरणें इस प्रकार लटक गईं मानों रुधिर-बलि के लिये लपलपाती हुई वेताल की जीभ हो। राजा के प्रति