हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ हर्षचरितम् चसा' इत्युक्त्वा चोपनिन्थे । योगभारकादाकृष्य भैरवाचार्यप्रहितानि रत्नवन्ति बहलालोकलिप्तानतःपुराणि पञ्च राजतानि पुण्डरीकाणि । नरपतिस्तु प्रियजनप्रणयभङ्गकातरो दाक्षिण्यमनुरुध्यमानो ग्रहणला- घवं च लङ्घयितुमसमर्थो दोलायमानेन मनसा स्थित्वा चिरं कथंकथमप्य- तिसौजन्यनिघ्नस्तानि जग्राह । जगाद च—'सर्वफलप्रसवहेतुः शिवभ- क्तिरियं नो मनोरथदुर्लभानि फलति फलानि । येनैवमस्मासु प्रीयते तत्रभगवान्भुवनगुरुर्भैरवाचार्यः । श्वो द्रष्टास्मि भगवन्तम्' इत्युक्त्वा च मस्करिणं व्यसर्जयत् । अनया च वार्तया परां मुदमवाप । अपरेद्युश्च प्रातरेवोत्थाय वाजिनमधिरुह्य समुच्छ्रितश्वेतातपत्रः समु- द्धूयमानधवलचामरयुगलः कतिपयैरेव राजपुत्रैः परिवृतो भैरवाचार्यं सवितारमिव शशी द्रष्टुं प्रतस्थे । गत्वा च किंचिदन्तरं तदीयमेवाभिमु- खमापतन्मन्यतमं शिष्यमद्राक्षीत् । अप्राक्षीच्च—'क्व भगवानास्ते ?' लङ्घयितुमुत्सोढुम् । निघ्नः स्ववशः । अन्यतममपरम् । उत्तरेणोत्तरास्यां दिशि । उस संन्यासी ने प्रसन्नतापूर्वक सूचित किया की नगर के समीप हीं सरस्वती नदी के तटवर्ती जंगल के एक शून्यायतन में भैरवाचार्य हैं । और फिर बोला—'महाभाग ! आपको भगवान् भैरवाचार्य अपने आशीर्वादवचन द्वारा सम्मानित करते हैं !' यह कहकर उसने भैरवाचार्य द्वारा उपहार के रूप में भेजे हुए रत्नजटित चाँदी के पाँच कमलों को अर्पित किया जो सारे अन्तःपुर को आलोकित कर रहे थे । राजा ने अपने प्रिय भैरवाचार्य के प्रेम के भङ्ग होने के भय से उदारता का अनुरोध करते हुए, दी हुई वस्तु के ग्रहण करने की छुटपन को सहने में असमर्थ, अपने दोलारूढ़ मन से कुछ देर तक ठहर कर किसी-किसी प्रकार अपने सौजन्य के विवश होते हुए उन रत्नों को ले लिया और बोले—'सब प्रकार के फलों को उत्पन्न करने वाली यह शिवभक्ति हमारे मनोरथ भी जिन्हें नहीं प्राप्त करते ऐसे फलों को उत्पन्न करती है । इसी कारण आदरणीय जगद्गुरु भैरवाचार्य हम पर प्रसन्न हैं । कल भगवान् के दर्शन करूँगा ।' यह कहकर उस संन्यासी को विदा किया । इस समाचार से वे अत्यन्त प्रसन्न हुए । दूसरे दिन राजा ने सबेरे ही उठ घोड़े पर सवार हो श्वेत छत्र लगा उज्ज्वल चँवरों से विराजमान हो कुछ राजपुत्रों के साथ भैरवाचार्य के दर्शन के लिए प्रस्थान किया, मानों चन्द्रमा सूर्य की ओर बढ़ता हो । कुछ ही दूर चले कि उन्हीं के सामने आते हुए एक शिष्य को देखा और पूछा—'भगवान् कहाँ हैं ?' उसने कहा—'यहीं पुराने देवी के