भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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[header] तृतीय उच्छ्वासः १६६ [/header]

इति। सोऽकथयत्—'अस्य जीर्णमातृगृहस्योत्तरेण बिल्ववाटिकामध्यास्ते' इति। गत्वा च तं प्रदेशमवततार तुरगात्। प्रविवेश च बिल्ववाटिकां। अथ महतः कार्पटिकवृन्दस्य मध्ये प्रातरेव स्नातम्, दत्ताष्टपुष्पि- कम्, अनुष्ठिताग्निकार्यम्, कृतभस्मरेखापरिहारपरिकरे हरितगोमयो- पलिप्तक्षितितलवितते व्याघ्रचर्मण्युपविष्टम्, कृष्णकम्बलप्रावरणनिभे- नासुरविवरप्रवेशाशङ्कया पातालान्धकारावासमिवाभ्यस्यन्तम्, उन्मि- षता विद्युत्कपिलेनात्मतेजसा महामांसविक्रयक्रीतेन मनःशिलापङ्केनेव शिष्यलोकं लिम्पन्तम्, जटीकृतैकदेशलम्बमानरुद्राक्षशङ्खगुटिकेनोर्ध्व- बद्धेन शिखापाशेन बघ्नन्तमिव विद्यावलेपदुर्विदग्धानुपरिसंचरतः सिद्धान्, धवलकतिपयशिरोरुहेण वयसा पञ्चपञ्चाशतं वर्षाण्यतिक्रा- मन्तम्, खालित्यक्षीयमाणशङ्खलोमलेखम्, लोमशकर्णशष्कुलीप्रदेशम्, पृथुललाटतटम्, तिरःश्यामभस्मललाटिकया बहुशः शिरोर्धधृतदग्ध- गुग्गुलुसंतापस्फुटितकपालास्थिपाण्डुरराजिशङ्कामिव जनयन्तम्, सहज-

अथेत्यादौ । भैरवाचार्यं ददर्शेति संबन्धः। कार्पटिका व्रतिनः । अष्टपुष्पिका प्रागुक्ता। परिहारोऽत्र मर्यादा । शङ्खे ललाटास्थिन। उक्तं च—'शङ्खो निधौ लला- टास्थिन' । गुटिका खण्डिका। उपरीत्याद्यभिप्रायेणोक्तम्— ऊर्ध्वबद्धे( वृद्धे ? )नेति । प्रशस्ता शिखा शिखापाशः। अवलेपोऽहंकृतिः। खालित्यं खल्वाटता। शङ्खो

मन्दिर के उत्तर विल्ववाटिका में आसन लगाए हैं।' उस स्थान पर जाकर वे घोड़े से उतर गए और विल्ववाटिका में प्रवेश किया। साधुओं की जमात के बीच प्रातःस्नान, अष्टपुष्पिका द्वारा शिवार्चन और अग्निहोत्र से निवृत्त होकर भस्म से पुरे चौक के बीच गोबर से लिपी जमीन पर बिछे व्याघ्र-चर्म पर विराजमान भैरवाचार्य को देखा। काले कंबल को ओढ़कर मानों वे असुर-विवर में प्रवेश करने की इच्छा से पाताल के घने अन्धकार में रहने का अभ्यास कर रहे थे। बिजली के समान पीले चमकते हुए अपने तेज से शिष्यों को मानों श्मशान का महामांस बेच कर खरीदे हुए मैनसिल के चन्दन से चर्चित कर रहे थे। एक ओर चोटी में रुद्राक्ष और शंख की गुरियों को गूंथकर लटकाये हुए और चोटी को खड़ी बाँधे हुये मानों विद्या के मद में फूलकर ऊपर-ऊपर उड़ते हुए सिद्धों को बाँध रहे थे। उनके सिर के कुछ बाल सफेद हो गये थे और अवस्था के वह पचपन साल गुजार चुके थे। उनकी गञ्जी खोपड़ी के बाल झड़ चुके थे। कान के भीतर भी बाल जम गए थे। ललाट प्रशस्त था, उसपर भस्म की टेढ़ी और साँवली रेखा से ऐसा लगता था कि उनके सिर पर आधे जले हुए