भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 506 में से

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१७० हर्षचरितम्

ललाटवलिभङ्गसंकोचितकूर्चभागं बभ्रुभासं भ्रूसंगत्या निरन्तरामाया- मिनीमेकामिव भ्रूरेखां बिभ्राणम्, ईषत्काचरकनीनिकेन रक्तापाङ्ग- निर्गतांशुप्रतानेन मध्यधवलभासेन्द्रायुधेनेवातिदीर्घेण लोचनयुगलेन परितो महामण्डलमिवानेकवर्णरागमालिखन्तम्, सितपीतलोहित- पताकावलिशबलम्, शिवबलिमिव दिक्षु विक्षिपन्तम्, तार्क्ष्यतुण्ड- कोटिकुब्जाग्रघोणम्, दूरविदीर्णसृक्कसंक्षिप्तकपोलम्, किंचिदन्तुरतया सदाहृदयसंनिहितहरमौलिचन्द्रातपेनेव निर्गच्छता दन्तालोकेन धवल- यन्तं दिशां जालम्, जिह्वाप्रस्थितसर्वशैवसंहितातिभारेणेव मनाक्प्र- लम्बितौष्ठम, प्रलम्बश्रवणपालीप्रेङ्खिताभ्यां स्फाटिककुण्डलाभ्यां शुक्रबृ- हस्पतिभ्यामिव सुरासुरविजयविद्यासिद्धिश्रद्धयानुबध्यमानम्, बद्धविवि- धौषधिमन्त्रसूत्रपङ्किना सलोहवलयेनैकप्रकोष्ठेन शङ्खखण्डं पूष्णो दन्तमिव भगवता भवेन भग्नं भक्त्या भूषणीकृतं कलयन्तम्, अखिलरसकूपोद्धृ- ललाटास्थि । शष्कुली कुहरम् । 'कूर्चमस्त्री भ्रुवोर्मध्यम्' । काचरा पीतवर्णा । तुण्डं मुखम् । कोटिः प्रान्तः, चञ्च्वग्रम् । 'प्रान्तावोष्ठस्य सृक्किणी, प्रकोष्ठमन्तरं विद्यादर- त्निमणिबन्धयोः' । पूष्णो रविभेदस्य । पुरा दक्षयज्ञगतस्य हरं निन्दतः 'मय्यनागते किमर्थमागतोऽस्मि' इति मुष्टिप्रहारेण हरेण दन्ता भग्नाः। तत्करस्पर्शन पावनत्वात्तन्न गुग्गुल की गरभी से फूटी कपाल की खोपड़ी सफेद दिखाइ दे रही हो । माथ पर सिकन पड़ने से भौंहों के बीच का हिस्सा सिकुड़ गया था और दोनों भौंहों के मिल जाने से एक भ्रूरेखा बन गई थी । आँखों की पुतली कच्चे काँच की तरह पीले रङ्ग की थी और लाल अपाङ्गों से निकलती हुई किरणें मध्य में सफेद इन्द्रायुध के दृश्य को उत्पन्न कर रही थीं । ऐसा लग रहा था कि साधना करने के लिये वे अनेक रङ्गों वाले महामण्डल की रचना कर रहे थे । सफेद, पीली, लाल झण्डियों से रङ्ग-बिरङ्ग के लग रहे थे । दिशाओं में शिव की बलि छोड़ रहे थे । गरुड़ की टोर के समान उनकी नाक का अग्रभाग झुका हुआ था । ओठ के बगल की दूर तक कटाव से उनके कपोल छोटे लग रहे थे । हमेशा उनके हृदय में सन्निहित रहने वाले भगवान् शिव के मस्तक की चन्द्रकिरणों के समान दाँतों की टेढ़ी रश्मियाँ निकलकर दिशाओं को धवलित कर रही थीं, मानों जीभ के अग्रभाग में स्थित समस्त शैवसंहिताओं के भारी बोझ से उनका ओष्ठ नीचे की ओर लटका हुआ था । कान की लम्बी पालियों में स्फटिक के कुंडल लटक रहे थे, मानों देवताओं और असुरों पर विजय पाने के लिये विद्या सीखने की श्रद्धा से शुक्र और बृहस्पति उनके पीछे लगे हों । एक हाथ में लोहे के कड़े में पिरोया हुआ शंख का टुकड़ा पहने थे, जिसमें

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