हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उच्छ्वासः १७१ नघटीयन्त्रमालामिव रुद्राक्षमालां दक्षिणेन पाणिना भ्रमयन्तम्, उरसि दो- लायमानेनापिङ्गलाग्रेण कूर्चककलापेन संमार्जयन्तमिवान्तर्गतं निजरजो- निकरम्, अतिनिबिडनीललोममण्डलविचितं च ध्यानलब्धेन ज्योतिषा दग्धमिव हृदयदेशं दधानम्, ईषत्प्रशिथिलवलिवलयबध्यमानतुन्दम्, उप- चीयमानस्फिङ्मांसपिण्डकम्, पाण्डुरपवित्रक्षौमावृतकौपीनम्, सावष्टम्भ- पर्यङ्कबन्धमण्डलितेनामृतफेनश्वेतरुचा योगपट्टकेन वासुकिनेवाप्रतिहता- नेकमन्त्रप्रभावाविर्भूतेन प्रदक्षिणीक्रियमाणम्, अरुणतामरससुकुमारतर- तलस्य पादयुगलस्य निर्मलैर्नखमयूखजालैर्जर्जयन्तमिव महानिधानो- द्धरणरसेन रसातलम्, तोयक्षालितशुचिना धौतपादुकायुगलेन हंसमिथु- नेनेव भागीरथीतीर्थयात्रापरिचयागतेनामुच्यमानचरणान्तिकम्, शिख- रनिखातकुब्जकालायसकण्टकेन वैणवेन विशाखिकादण्डेन सर्वत्रिगासि- भक्तिः। अखिलस्य रसस्य कूपादुद्धनाय घटीयन्त्रमालापि भ्राम्यते। दोलाय- मानत्वेन संमार्जनसंभावना। कलापग्रहणं मार्जनीसादृश्यार्थम्। रजो रागः, रेणुश्च। विचितं व्याप्तम्। तुन्दमुदरम्। स्फिजावुभयत्र प्रसिद्धे। 'स्त्रियां स्फिजौ कटिप्रीथौ' इत्यमरः। फेनवत्तैश्च श्वेता। वासुकिनेवेति। न सामान्येनेति प्रभावपरिशोधकम्। जर्जयन्तं खण्डशः कुर्वाणम्। तोयेत्यादि। हंसमिथुनस्यापि विशेषणम्। शिखरे- त्यादिनाङ्कुशसादृश्यं विशाखिकादण्डस्योक्तम्। निखात उत्कीर्णः। कालायसं शस्त्र- अनेक औषधियां मन्त्र और सूत्र के अक्षर लिखकर बँधे थे, मानों उस शंख के टुकड़े के रूप में भगवान् शिव द्वारा तोड़े गए पूषा के दाँत को उन्होंने भक्ति से आभूषण बना लिया था। दाहिने हाथ में रुद्राक्ष की माला को घुमा रहे थे, मानों सारे रस को निकाल लेने के लिए रहट चला रहे थे। छाती पर पीले अग्रभाग वाली दाढ़ी लहरा रही थी, मानों हृदय के रजोविकार को झाड़ रहे थे। घने और नीले भरे रोंगटे को देखकर लगता मानों ध्यान से प्राप्त ज्योति के कारण जले हुए हृदय को धारण कर रहे हों। उदर में वलियाँ पड़ गई थीं। नितम्ब का मांस बढ़ गया था। उनका कौपीन उज्ज्वल और पवित्र क्षौम वस्त्र से ढका हुआ था। वीरासन लगाकर विराजमान उनके चारों ओर अमृतफेन के समान योगपट्ट घिरा हुआ था मानों उनके विफल न होने वाले मन्त्रों के प्रभाव से प्रकट होकर वासुकि नामक नागराज उनकी प्रदक्षिणा कर रहा हो। लाल कमल के समान सुकुमार तलवे वाले दोनों चरणों के नखों की निर्मल किरणें फैल रही थीं, मानों बहुमूल्य निधि को निकालने के लिए पाताल को विदीर्ण कर रहे थे। पैरों के पास पानी से धुला हुआ पवित्र खड़ाउओं का जोड़ा रखा हुआ था, मानों गङ्गा के तीर्थों में विचरने के समय परिचय हो जाने से हंसों का जोड़ा साथ लग गया हो। पास में बाँस का बैसाखी दण्ड।