भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

१७२ हर्षचरितम् द्धिविघ्नविनायकापनयनाङ्कुशेनेव सततपार्श्ववर्तिना विराज मानम् , अबहु- भाषिणं मन्दहासिर्न सर्वोपकारिणं कुमारब्रह्मचारिणम् , अतितपस्विनम् , महामनस्विनं कृशक्रोधम् , अकृशानुरोधम् , महानगरमिवादीनप्रकृतिशो- भितम् , मेरुमिव कल्पतरुपल्लवराशिसुकुमारच्छायम् , कैलासमिव पशुपति- चरणरजःपवित्रितशिरसम् , शिवलोकमिव माहेश्वरगणानुयातम् , जलनिधिमिवानेकनदनदीसहस्रप्रक्षालितशरीरम् , जाह्नवीप्रवाहमिव बहु- पुण्यतीर्थस्थानशुचिम् , धाम धर्मस्य, तीर्थं तथ्यस्य, कोशं कुशलस्य, पत्तनं १ पूततायाः, शाला शोलस्य, क्षेत्रं क्षमायाः, शालेयं शालीनतायाः, स्थानं स्थितेः, आधारं धृतेः, आकरं करुणायाः, निकेतनं कौतुकस्य, आरामं रमणीयकस्य, प्रासादं प्रसादस्य, आगारं गौरवस्य, समाजं भेदः । विशाखिका खनित्रिका । विघ्नोऽन्तरायः । विनायको गजाननः । प्रकृतिः स्वभावः, मायादिका च । राशिवत्तेन च सुकुमाराः । गणाः समूहाः, प्रमथाश्च । नदनदीत्येकशेषो युक्तः । सहस्रेषु तैः प्रक्षालितशि(शरी ? ) राः । तीर्थेषु यत्स्थानं वसनं तेन शुचिम् । तीर्थस्नानः कनखलाद्यवस्थितिभिश्च शुचिः । शालीनता विनी- तत्वम् । निकेतनं गृहम् । तत्र हि सर्वस्य कौतुकं जायते । था जिसके सिरे पर टेढ़ा लोहे का कोल जड़ा हुआ था मानो समस्त विद्याओ का सिद्धि में विघ्न पहुँचाने वाले विघ्नराज गजानन को हटाने के लिये अंकुश हो । वे बहुत कम बोलने वाले, मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए, सब प्रकार के उपकारी, आजन्म ब्रह्मचारी, महा- तपस्वी, महामनस्वी, क्रोधरहित और समाहृत थे । महानगर की भाँति उनकी प्रकृति (स्वभाव या नागरिक जन) अदीन अर्थात् दीनतारहित थी । सुमेरु के समान कल्पवृक्ष के पल्लव की भाँति उनकी कान्ति थी (सुमेरु पर कल्पवृक्ष के पत्तों की छाया रहती है) । भगवान् शिव के चरणों की धूल से उनका सिर पवित्र था जैसे कैलास पर्वत शिव की चरणधूलि से पवित्र होता है। शैव लोग उनके साथ थे जैसे शिवलोक में प्रमथगण रहते हैं। अनेक नद और नदियों में उन्होंने अपने शरीर को समुद्र की भाँति प्रक्षालित किया था । वे अनेक पुण्यतीर्थों में भ्रमण करके गङ्गा के प्रवाह की भाँति पवित्र हो चुके थे । वे धर्म के धाम, सत्य के तीर्थ, कुशल के कोश, पवित्रता के नगर, शीलगुण के गृह, क्षमा के क्षेत्र, नम्रता के निवासस्थान, मर्यादा के स्थान, धैर्य के आधार, करुणा के खान, कौतूहल के निकेतन, सौन्दर्य के उपवन, प्रसन्नता के प्रासाद, गौरव के गृह, सौजन्य के १. पत्तनं पूततायाः ।