हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उच्छ्वासः १७३ सौजन्यस्य, संभवं सद्भावस्य, कालं कलेः, भगवन्तं साक्षादिव विरू- पाक्षं भैरवाचार्य ददर्श । भैरवाचार्यस्तु दूरादेव राजानं दृष्ट्वा शशिनमिव जलनिधिश्चचाल । प्रथमतरोत्थितशिष्यलोकम्रोत्थाय प्रत्युज्जगाम । समर्पितश्रीफलोपायनश्च जह्नुकर्णसमुद्गीर्यमाणगङ्गाप्रवाहह्लादगम्भीरया गिरा स्वस्तिशब्दमकरोत् । नरपतिरपि प्रीतिविस्तार्यमाणधवलिम्ना चक्षुषा प्रत्यर्पयन्निव बहुत- राणि पुण्डरीकवनानि ललाटपट्टपर्यस्तेन चोदंशुना शिखामणिना महेश्व- रप्रसादमिव तृतीयनयनोद्गमेन प्रकाशयन्नावर्जितकर्णपल्लवपलायमानमधु- करः शिवसेवासमुन्मूलिताशेषपापलवमुच्यमान इव दूरादवनतः प्रणाम- मभिनवं चकार । आचार्योऽपि—'आगच्छ अत्रोपविश' इति शार्दूलच- र्मात्मीयमदर्शयत् । उपदर्शितप्रश्रयस्तु राजा मत्तहंसकलगद्गदस्वरसुभगां मधुरसमय महानदीमिव प्रवर्तयन्वाचं व्याजहार—'भगवन् ! नार्हसि शश्यपि राजा तं च दूरादेव दृष्ट्वा जलनिधिश्चलति । गाम्भीर्याच्च जलनिधिरेवे- त्युक्तम् । बिल्वं श्रीफलम् । गङ्गेत्यादिना पवित्रत्वमाह । धवलिम्नेत्यनेन पुण्डरीकाणां धवलत्वमाह । प्राभृतपुण्डरीकाणां राजतत्त्वात् । आवर्जितं स्वरवच्च तेन शुभगात् । शार्दूलो व्याघ्रः । समाज, सद्भाव के उत्पत्तिस्थान एव काल के अन्तक थे । इस प्रकार वे साक्षात् शिव के समान लग रहे थे । भैरवाचार्य दूर से ही राजा को देखकर उस प्रकार चल पड़े जैसे समुद्र चन्द्रमा को देखकर उमड़ उठता है । पहले ही उठे हुए शिष्यों को साथ लेकर राजा के पास पहुंचे और श्रीफल का उपहार भेंट किया। तब जह्नु के कर्णकुहर से निकलते हुए गंगा-प्रवाह की ध्वनि के समान गम्भीर वाणी द्वारा 'स्वस्ति' शब्द का उच्चारण किया । राजा ने प्रीति से आँखों की सफेदी को बढ़ाते हुए देखा मानों बहुत से कमलबनों को उनके स्वागत में अर्पित कर रहा हो । ललाट में लगी हुई शिखामणि के ऊपर की ओर फैलती हुई किरणों से मानों भगवान् शंकर के तीसरे नेत्र से प्राप्त प्रसाद को धारण कर रहा हो। जब वह झुकने लगा तब उसके कर्णपल्लव पर बैठे हुए भौंरे उड़े मानों भगवान् शिव को सेवा करने से उसके पाप उड़े जा रहे हों। इस प्रकार उसने दूर ही से झुककर प्रणाम किया । आचार्य ने भी 'आओ, यहाँ बैठो' यह कह कर अपने व्याघ्रचर्म की ओर निर्देश किया । विनय प्रकट करते हुए राजा ने मत्त कलहंस की आवाज की भाँति सुन्दर, मधु रस की महानदी को मानों प्रवाहित करते हुए कहा—'भगवन्, मुझे आप दूसरे