भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 219

१७४ हर्षचरितम् मामन्यनृपस्खलितैः खलीकर्तुम्। अशेषराजकोपेक्षिताया हतलक्ष्म्याः खल्वयं शीलापराधो द्रविणदौरात्म्यं वा यदेवमाचरति मयि गुरुः। अभूमिरयमुपचाराणाम्। अलमतियन्त्रणया। दूरस्थितोऽपि मनोरथ- शिष्योऽयं जनो भवताम्। माननीयं च गुरुवन्नोल्लङ्घनमर्हति गुरो- रासनम्। आसतां च भवन्त एवात्र' इति व्याहृत्य परिजनोपनीते वास- सि निषसाद। भैरवाचार्योऽपि प्रीत्यानतिक्रमणीयं नृपवचनमनुवर्तमानः पूर्ववत्तदेव व्याघ्राजिनमभजत। आसीने च सराजके परिजने शिष्यजने च समुचितमर्घ्यादिकं चक्रे। क्रमेण च नृपमाधुर्यहृतान्तःकरणः शशिकरनिकरविमला दशन- दीधितीः स्फुरन्तीः शिवभक्तिरिव साक्षाद्दर्शयन्नुवाच—'तात ! अतिनम्र- तैव ते कथयति गुणानां गौरवम्। सकलसंपत्पात्रमसि। विभवानु- रूपास्तु प्रतिपत्तयः। जन्मनः प्रभृत्यदत्तदृष्टिरेवास्मि स्वापतेयेषु। यतः सकलदोषकलापानलेन्धनैर्धनैरविक्रीतं कचिच्छरीरकमस्ति। भैक्षरक्षिताः अन्तःकरणं मनः। गौरवमुत्कर्षः, भारवत्त्वं च। अदत्तदृष्टिरिति। न तु मया धनान्यलभ्यानि। स्वापतेयेषु धनेषु। संरक्षिता इति। यदि कदाचित्क्वचिदुपयोगं राजाओं की भाँति दोषों से भरा न समझें। समस्त राजाओं से उपेक्षित राजलक्ष्मी का यह चरित्र-दोष और धन का मद है जो मेरे लिए गुरु आप इस प्रकार व्यवहार कर रहे हैं। मैं ऐसे उपचारों का पात्र नहीं हू। मेरे लिए यह क्लेश ठीक नहीं। दूर रहकर भी मनोरथ से आपका शिष्य बना हुआ यह जन आपका है। गुरु के समान ही माननीय इस आसन पर मैं अपना पैर नहीं रख सकता। आप ही इसपर विराजें।' यह कहकर परिजन द्वारा लाए हुए वस्त्र पर बैठे। भैरवाचार्य ने भी प्रेम से राजा की बात मान ली और पहले के समान उसी व्याघ्रचर्म पर आसीन हो गए। राजा लोग, परिजन और शिष्य जब बैठे तो भैरवाचार्य ने अर्घ्य आदि द्वारा उचित सत्कार किया। राजा के रसीलेपन को देख हृदय से आकृष्ट हो भैरवाचार्य चन्द्रमा की चाँदनी की भाँति अपने दाँतों की किरणों के रूप में भगवान् शिव की भक्ति प्रदर्शित करते हुए बोले—'राजन्, आपको यह अत्यन्त नम्रता ही गुणों का उत्कर्ष बता रही है। सब प्रकार की सम्पत्ति के तुम पात्र हो। ऐश्वर्य के अनुरूप ही मनुष्य की चित्तवृत्तियाँ होती हैं। मैंने जन्म से लेकर धन की ओर दृष्टिपात नहीं किया। दोष की अग्नियों को ईंधन की भाँति भड़काने वाले धन पर यह मेरी तुच्छ देह बिकी नहीं है। भीख मांग कर