हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 220, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उच्छ्वासः १७५ सन्ति प्राणाः । दुर्ग्रहीतानि कतिचिद्विद्यन्ते विद्याक्षराणि । भगवच्छिव- भट्टारकपादसेवया समुपाजिताः कियत्योऽपि संनिहिताः पुण्यकणिकाः । स्वीक्रियतां यदत्रोपयोगार्हम् । प्रतनुलुणग्राह्याणि कुसुमानीव हि भवन्ति सतां मनांसि । अपि च, विद्वत्संमताः श्रूयमाणा अपि साधवः शब्दा इव सुधीरेऽपि हि मनसि यशांसि कुर्वन्ति । विवरं विशतः कुतूहलस्य फेनध- वलैः स्रोतोभिरिवापह्रियमाणो गुणगणैरानीतोऽस्मि कल्याणिना' इति । राजा तु तं प्रत्यवादीत्—भगवन् ! अनुरक्तेष्वपि शरीरादिषु साधूनां स्वामिन एव प्रणयिनः । युष्मद्दर्शनादुपार्जितमेव चापरिमितं कुशल- जातम् । 'अनेनैवागमनेन स्पृहणीयं पदमारोपितोऽस्मि गुरुणा' इति विविधाभिश्च कथाभिश्चिरं स्थित्वा गृहमगात् । अन्यस्मिन्दिवसे भैरवाचार्योऽपि राजानं द्रष्टुं ययौ । तस्मै च राजा सान्तःपुरं सपरिजने सकोषमात्मानं निवेदितवान् । स च विहस्योवाच- यास्यन्तीति । अनेन प्राणादिदानमेवोचितमित्युक्तम् । सकलसंपत्पात्रस्येयतः कियती वसुसंपत्तिर्भविष्यतीत्याशङ्क्याह—प्रतन्वित्यादि । गुणा उत्कर्षाः, तन्तवश्च । कुसुमानीवेति । कुसुमसादृश्येन मनसः सौकुमार्यमप्युक्तम् । साधवः शिष्टाः, शब्दा इव साधवः । संस्कृता विद्वत्संमताश्च । फेनवत्तैश्च धवलैर्गुणगणैः, स्रोतोभिश्च । स्वामिन एव प्रणयिन इति । अनुक्तान्यपि शरीरादीनि प्रणयिनां स्वायत्तानीत्यर्थः । मैने प्राणों की रक्षा की है। विद्या के कुछ अक्षरों को कठिनाई से सीख पाया हूँ। भगवान् शिवभट्टारक की सेवा करके कुछ पुण्य संगृहीत किए हैं। यहाँ आपके उपयोग की जो वस्तु हो उसे स्वीकार कीजिए । सज्जनों के मन थोड़े से गुणों के कारण फूलों की भाँति ग्रहण करने योग्य हो जाते हैं। शब्दों के समान सुने गए विद्वानों के अभिमत शब्द सुधीर मन को भी प्रभावित कर देते हैं। कल्याणभाजन तुमने हृदय में प्रवेश करते हुए कुतू- हल की फेनधवलधारा के समान अपने गुणों द्वारा तुमने खींच कर मुझे यहाँ आने के लिए विवश किया ।' राजा ने भैरवाचार्य से कहा—'जैसे शरीर बिना कहे ही अपने अधीन होता है उसी प्रकार सज्जन लोग भी प्रेमी जनों के वश में रहते हैं। आपके दर्शन से अनन्त कुशल- लाभ हुआ । आपने इस ओर पधार कर मुझे स्पृहणीय पद पर प्रतिष्ठित कर दिया।' इस प्रकार देर तक ठहर कर बातचीत के बाद घर लौट आए । दूसरे दिन भैरवाचार्य भी राजा को देखने के लिए पधारे। उनके स्वागत में राजा ने १. कृतमनेनैवानुगमनेन ।