भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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१७६ हर्षचरितम् 'तात ! क्व विभवाः, क्व च वयं वनवर्धिताः ? धनोष्मणा म्लायत्यलं लतेव मनस्विता। खद्योतानामिवास्माकमियमपरोपतापिनो राजते तेजस्विता। भवादृशा एव भाजनं भूतेः' इति स्थित्वा च कंचि- त्कालं जगाम। परिव्राट् तेनैव क्रमेण पञ्च पञ्च राजतानि पुण्डरीकाण्युपायनी- चकार। एकदा तु श्वेतकर्पटावृतं किमप्यादाय प्राविशत्। उपविश्य च पूर्ववत्स्थित्वा मुहूर्त्तमब्रवीत्—'महाभाग ! भवन्तमाह भगवान्यथा- स्मच्छिष्यः पातालस्वामिनामा ब्राह्मणः । तेन ब्रह्मराक्षसहस्ता- दपहृतो महासिरट्टहासनामा। सोऽयं भवद्भुजयोग्यो गृह्यताम्' इत्यभिधायापहृतकर्पतावच्छादनात्परिवारादाचकर्ष शरद्गगनतलमिव पिण्डतां नीतम्, कालिन्दीप्रवाहमिव स्तम्भितजलम् , नन्दकजिगीषया कृष्णकोपितं कालियमिव कृपाणतां गतम्, लोकविनाशाय प्रकाशितधा- खद्योताः कीटमयाः। महाभागेति प्रस्तुतानुगुणमामन्त्रणम् । परिवारादाचकर्ष कृपाणमिति संबन्धः । पिण्डं शस्त्रम्। उक्तं च—'लोहोऽस्त्री शस्त्रकं तीक्ष्णं पिण्डं कालायसायसी' इति । स्तम्भितं धृतं रक्षितमन्तर्जलं यस्य तम्। किल कृपाणस्य वा पानीयं यन्त्रेण क्रियते। नन्दको विष्णुखड्गः। कालियो नागभेदः। धाराणामासारः, धारारूप- श्चासारो धारासारः। दन्तमण्डलं दन्तचक्रवालम, दशनसमूहश्च। मुष्टिः त्सरुः. अन्तःपुर, परिजन और सम्पत्ति के साथ अपने आपको भेंट किया। उन्होंने हँस कर कहा—'राजन्, कहाँ ये सम्पत्तियाँ और कहाँ जंगल के वासी हम ! मनस्विता धन की गरमी से झुलस जाती है। खद्योतों के समान दूसरों को सन्तप्त न करने वाली यह हमारी तेजस्विता ही बहुत है। आप जैसे लोग ही ऐश्वर्य के भाजन हैं।' इस प्रकार कुछ ठहर कर चले गए। भैरवाचार्य के शिष्य ने उसी क्रम से चाँदी के पाँच कमलों को भेंट में अर्पित किया। एक समय वह उजले वस्त्र से ढँककर कुछ लिए हुए पहुँचा । पहले की तरह बैठकर क्षण भर के बाद बोला—'महाभाग, भगवान् ने आप से कहा है कि पातालस्वामी नाम का एक ब्राह्मण मेरा शिष्य है । उसने ब्रह्मराक्षस के हाथ से अट्टहास नामक कृपाण छीना है। वह आपके हाथ में रहने योग्य है।' यह कहकर उसने ऊपर का वस्त्र हटाकर म्यान से उस कृपाण को खींच लिया, मानों आकाश ही शस्त्र बना हो, यमुना का प्रवाह ही रुक गया हो, कृष्ण के प्रति कुपित कालियनाग ने उनके नन्दक नामक खड्ग को जीतने की इच्छा से मानों कृपाण का रूप धर लिया हो। संसार के विनाश के लिए धाराजल की