भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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तृतीय उच्छ्वासः १७७ रासारम्, प्रलयकालमेघखण्डमिव नभस्तलात्पतितम्, दृश्यमानविकट- दन्तमण्डलं हासमिव हिंसायाः, हरिबाहुदण्डमिव कृतदृढमुष्टिग्रहम्, सकलभुवनजीवितापहरणक्षमेण कालकूटेनेव निर्मितम्, कृतान्तकोपान- लतप्तेनेवायसा घटितम्, अतितीक्ष्णतया पवनस्पर्शनापि रुषेव क्वणन्तम्, मणिसभाकुट्टिमपतत्प्रतिबिम्बच्छद्मनात्मानमपि द्विधेव पाटयन्तम्' अरिशिरश्छेदलग्नैः कचैरिव किरणैः करालितधारम्, मुहुर्मुहुस्तडिदु- न्मेषतरलैः प्रभाचक्रच्छुरितैर्जर्जरितातपम्, खण्डशश्छिन्दन्तमिव दिव- सम्, कटाक्षमिव कालरात्रेः, कर्णोत्पलभिव कालस्य, ओंकारमिव क्रौर्यस्य, अलंकारमहंकारस्य, कुलमित्रं कोपस्य, देहं दर्पस्य, सुसहायं साहसस्य, अपत्यं मृत्योः, आगमनमार्गं लक्ष्म्याः, निर्गमनमार्गं कीर्तेः, कृपाणम्। अवनिपतिस्तु तं गृहीत्वा करेणायुधप्रीतया प्रतिमानिभेनालिङ्गन्निव सुचिरं ददर्श। संदिदेश च—'वक्तव्यो भगवान्परद्रव्यग्रहणावज्ञादुर्विदग्ध- मपि हि मे मनो युष्मद्विषये न शक्नोति वचनव्यतिक्रमव्यभिचारमाच- रितुम्' इति। परिव्राट् तु गृहीते तस्मिन्परितुष्टः 'स्वस्ति भवते। असुरभेदश्च । अतितीक्ष्णतयति । तंक्ष्ण्यं तानवाद्भवति, तनु च परस्परस्पर्शेन क्वणति । तथा चातितीक्ष्णोऽतिदण्डप्रकृती रोषेण हुंकरोति । कचैः केशः । करालिता व्याप्ताः । वर्षा करता हुआ प्रलयकालीन मेघ का टुकड़ा हो । दीख पड़ती हुई दाँतियों के मण्डल वाला मानों हिंसा का ही हास हो । भगवान् कृष्ण के बाहुदण्ड के समान उसकी मूंठ दृढ़ थी । सारे संसार के प्राणों को हर लेने के लिए मानों वह विष से बना हो । यमराज की क्रोधाग्नि में तपाए हुए लोहे से मानों बनाया गया हो । उसकी धार इतनी तेज थी कि हवा के भी लगने से उसमें आवाज-सी निकलती । मणि के जड़ावों पर पड़ती हुई अपनी छाया के व्याज से मानों अपने आपके भी दो टुकड़े कर रहा हो । उसकी धार से किरणें निकल रही थीं मानों शत्रु के सिर काटने से उसमें बाल चिपट गए हों । बार-बार बिजली की तरह चमक वाली प्रभा से वह आतप को जर्जर बना रहा था, मानों दिन का खण्ड- खण्ड कर रहा हो । वह मानों कालरात्रि का कटाक्ष, काल का कर्णोत्पल, क्रूरता का ओंकार, अहंकार का अलंकार, कोप का कुलमित्र, दर्प का शरीर, साहस का सहायक, मृत्यु का वंशज, लक्ष्मी के आने का मार्ग और कीर्ति के निकलने का मार्ग था। राजा ने उसे हाथ में लेकर आयुध के प्रति स्वाभाविक प्रेम के कारण मानों प्रतिमा के समान उसका आलिङ्गन करते हुए देखा और संदेश दिया—'भगवान् भैरवाचार्य से कहना कि दूसरे के धन को तिरस्कार की दृष्टि से देखने वाला मेरा मन आपकी बात का १२ ह० च०