भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 223

१७८ हर्षचरितम् साधयामः' इत्युक्त्वा निरयासीत् । नृपश्च प्रकृत्या वीररसानुरागी तेन कृपाणेनामन्यत करतलवर्तिनीं मेदिनीम् । अथ व्रजत्सु दिवसेष्वेकदा भैरवाचार्यो राजानमुपह्वरे सोपग्रहम- वादीत्—'तात ! स्वार्थांलसाः परोपकारदक्षाश्च प्रकृतयो भवन्ति भव्या- नाम् । भवादृशां चार्थिदर्शनं महोत्सवः प्रणयनमाराधनमर्थग्रहणमु- पकारः । भूमिरसि सर्वलोकमनोरथानाम् । येनाभिधीयसे । श्रूयताम् । भगवतो महाकालहृदयनाम्नो महामन्त्रस्य कृष्णस्रग्गम्बराऽनुलेपनेनाकल्पेन कल्पकथितेन महाश्मशाने जपकोट्या कृतपूर्वसेवोऽस्मि । तस्य च वेतालसाधनावसाना सिद्धिः । असहायैश्च सा दुरवापा । त्वं चालमस्मै कर्मणे । त्वयि च गृहीतभरे भविष्यन्त्यपरे सहायास्त्रयः । एकः स एवा- स्माकं टीटिभनामा बालमित्रं मस्करी यो भवन्तमुपतिष्ठते । द्वितीयः स साधयामः स्वकर्मसिद्धिं विदध्मः । मङ्गलवाङ्मुच्छाम इति नोक्तम् । उपह्वरे प्रच्छन्ने । सोपग्रहं साभ्यर्थनम् । प्रणयनं याचनम् । मनोरथानामिति । रथाश्च भूमौ वहन्ति । आकल्पेन वेशेन । इतिकर्तव्यताकलापोपदेशको ग्रन्थः कल्पः । अलं पर्याप्तः । उपतिष्ठत इति संगतिकरणे तङ् । परिग्रहणं स्वीकारः । उल्लङ्घन नहीं कर सकता।' राजा के कृपाण ले लेने पर उस परिव्राजक ने सन्तुष्ट होकर कहा—'आपका कल्याण हो, मैं चला ।' यह कहकर वापिस लौट गया । स्वभाव से ही वीर रस में अनुराग करने वाले राजा ने उस कृपाण के द्वारा सारी पृथिवी को अपने हाथ में आई हुई समझा । बहुत दिनों के बाद एक समय भैरवाचार्य ने राजा से निवेदन किया—'राजन्, सज्जन लोग स्वभाव से ही अपने कार्य में उदासीन और परोपकार करने में चतुर होते हैं । आप जैसे लोग याचकों को देखकर बड़ा उत्सव मानते हैं, उनके माँगने से अपने को सम्मानित समझते हैं और दी हुई वस्तु को उनके द्वारा ले लेने पर अपने आपको अत्यन्त उपकृत मानते हैं । जनता की समस्त इच्छाओं के आप केन्द्र हैं । इसलिए कह रहा हूँ, सुनें—शास्त्रोक्त विधि के अनुसार महाश्मशान में काली माला और काला वस्त्र पहन एवं चन्दन लगा मैंने एक कोटि जप किया है । बेताल की साधना में उस मन्त्र की सिद्धि का अन्त होता है । असहाय लोग उस सधना को नहीं कर पाते । आप इस कार्य में समर्थ हैं । अगर इस भार को स्वीकार करते हैं तो आपके तीन साथी और मिलेंगे । एक तो वही टीटिभ नाम का मेरा बचपन का सुहृद् संन्यासी जो आपके पास आता रहता है, दूसरा वह पातालस्वामी और तीसरा कर्णताल नाम का द्रविड़ देश का रहने वाला मेरा ही