हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 224, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपातालस्वामी। अपरो मच्छिष्य एव कर्णतालनामा द्राविडः। यदि साधु मन्यसे ततो नीयतामयं दिङ्नागहस्तदीर्घो गृहीताट्टहासो निशा- मेकामेकदिक्खावर्गलतां बाहुः।' इति कृतवचसि च तस्मिन्नन्धकारप्रविष्ट इव दृष्टप्रकाशः प्राप्तोपकारावकाशः प्रमुदितेनान्तरात्मना नरेन्द्रः सम- भाषत—'भगवन् ! परमनुगृहीतोऽस्म्यनेन शिष्यजनसामान्येन निदेशेन कृतपरिग्रहमिवात्मानमवैमि' इति । ननन्द च तेन नरेन्द्रव्याहृतेन भैरवाचार्यः। चकार च संकेतम्—'अस्यामेवागामिन्यामसितपक्षचतुर्द- शोन्नपायामित्यां वेलायाममुष्मिन्महाश्मशानसमीपभाजि शून्यायने शस्त्रद्वितीयेनायुष्मता द्रष्टव्या वयम्' इति । अथातिक्रान्तेष्वहःसु प्राप्तायां च तस्यामेव कृष्णचतुर्दश्यां शैवेन विधिना दीक्षितः क्षितिपो नियमवानभूत्। कृताधिवासं च संपादितगन्ध- धूपमाल्यादिपूजं खड्गमट्टहासमकरोत् । ततः परिणते दिवसे केनापि कर्मसाधनाय कृतरुधिरबलिविधानास्विव लोहितायमानासु दिक्षु, रुधि- रवलिलम्पटासु च वेतालजिह्वास्रिव लम्बमानासु च रविदीधितिषु, नरेन्द्रानुरागेण गृहीतापरदिशि स्वयमिव दिक्पालतां चिकीर्षति सवि-
दीक्षितः कृतनियमः। अधिवासो नियमदिवसादाद्येऽहनि यथाशास्त्रं विधिना मन्त्रन्यासादिः। पर्वपूजेति यावत् । तत इत्यादौ । ततोऽस्मिन्सति राजा नग- शिष्य। यदि आप ठीक समझते हैं तो दिङ्नाग की सूँड़ के समान लम्बे अपने भुज में अट्टहास लेकर एक दिशा की रक्षा करते हुए एक रात ठहरिए।' भैरवाचार्य के इस प्रकार कहने पर अन्धकार में पड़े हुए राजा ने मानों प्रकाश को देख लिया। उपकार करने का अवसर देखकर प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने कहा—'भगवन्, आपने सामान्य शिष्यजन की भाँति मुझे स्वीकार करके जो आज्ञा दी इससे मैं आपका अत्यन्त अनुगृहीत हूं।' राजा की इस बात से भैरवाचार्य अत्यन्त प्रसन्न हुए और इशारा किया—'इसी आने वाली कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की रात को महाश्मशान के समीप वाले शून्यायतन में केवल हाथ में तलवार लेकर आप हमसे मिलें।' कई दिनों के बाद उस कृष्ण चतुर्दशी के दिन राजा शैवविधि से दीक्षित होकर व्रत में लग गया और पहले दिन ही अभिमंत्रित करके गन्ध, धूप, माला आदि से अट्टहास नामक खङ्ग की पूजा की। तब सन्ध्या हो गई। दिशायें इस प्रकार लाल हो गईं जैसे किसी ने वेतालसाधना के लिए रुधिर की बलि चढ़ाई हो। सूर्य की किरणें इस प्रकार लटक गईं मानों रुधिर-बलि के लिये लपलपाती हुई वेताल की जीभ हो। राजा के प्रति