हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उच्छ्वासः १६७
बुकायत्ततरलपनम्, अंसावलम्बिना काषायेण योगपट्टकेन विरचितवैक- क्षकम्, हृदयमध्यनिबद्धग्रन्थिना च रागेणेव खण्डशः कृतेन धातुरसा- रुणेन कर्पटेन कृतोत्तरासङ्गम्, पुनरुक्तबालप्रग्रहवेष्टन निश्चलमूलेन बद्ध- मृत्परिशोधनवंशत्वक्तितउना कौपीनसनाथशिखरेण खर्जूरपुटसमुद्गकग- र्भीकृतभिक्षाकपालकेन दारवफलकत्रयत्रिकोणत्रियष्टिनिविष्टकमण्डलुना बहिरुपपादितपादुकावस्थानेन स्थूलदशासूत्रनियन्त्रितपुस्तिकापूलकेन वामकरधृतेन योगभारकेणाध्यासितस्कन्धम्, इतरकरगृहीतवेत्रासनं मस्करिणमद्राक्षीत्। क्षितिपतिरप्युपगतं १मुचितेन चैनमादरेणान्वग्रहीत्। आसीनं च पप्रच्छ - 'क्व भैरवाचार्यः ?' इति। सादरनरपतिवचनमुदि- तमतिस्तु परिव्राट् तमुपनगरं सरस्वतीतटवनावलम्बिनि शून्यायतन स्थितमाचचक्षे। भूयश्चाबभाषे- 'अर्चयति हि महाभागं भगवानाशीर्व-
'अधोऽधरस्य चिबुकम्' । लपनं मुखम् । उत्तरासङ्गमपरिप्रावरणम् । पुनरुक्तं पौनः- पुन्येन कृतम् । प्रग्रहो रज्जुः । तितउश्चालनी परिपवनशब्दवाच्या । कौपीनं गुह्यदेश उपचारात्, तदाच्छादनं च खर्जूराख्यस्य वृक्षस्य च संबन्धिभिः पुटैः क्लृप्तैः, पत्रैश्च समुद्गकः कपालभङ्गो भिक्षायै क्रियते । दारवे काष्ठसंबन्धिनि फल- कत्रये त्रयः कोणास्तेषु यास्तिस्रो यष्टयस्तासु निविष्टः कमण्डलुर्यत्र तेन । योग- भारकेण मात्राभारिकया। मस्करिणं परिव्राजकम् । राजतानि रौप्याणि ।
पट्ट सामने वैकक्षक की तरह पड़ा हुआ था। गेरू से रँग हुए वस्त्र का चादर के रूप में वह ओढ़े था जिसकी गाँठ छाती के बीच में थी, मानों वह वस्त्र उसके द्वारा खण्ड खण्ड किए गए राग का बाह्य रूप था। एक सिरे से बाएँ हाथ में पकड़े हुए बाँस के दूसरे सिरे से उसके कंधे के पीछे लटकती हुई झोली थी। झोली का ऊपरी सिरा बालों की बटी हुई रस्सी से बँधा था। मिट्टी चालने के लिए बाँस की बनी हुई चलनी उसमें बँधी थी। उसके अग्रभाग में कौपीन लटक रहा था। झोली के भीतर खजूर के पत्ते को मोड़कर बनाया हुआ भिक्षाकपाल रखा था। लकड़ी के तीन पट्टों को जोड़ कर बने हुए त्रिकोण के भीतर कमण्डलु रखा हुआ था और उस त्रिकोण के तीन पट्टों में तीन डंडियाँ लगी थीं जिनसे वह बाँस से लटका हुआ था। झोली के बाहर खड़ाऊँ लटक रही थी। कपड़े की मोटी किनारी से बँधे हुए पोथियों के गुटके झोली में रक्खे थे। उसके दाहिने हाथ में बेंत की चटाई थी। पहुँचे हुए उस संन्यासी से राजा आदरपूर्वक मिले। उसके बैठ जाने पर राजा ने पूछा- 'भैरवाचार्य कहाँ हैं?' आदर के साथ कहे हुए राजा के वचन सुनकर
१. मुचितेन नचैनं ।