हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 211, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ें१६६ हर्षचरितम् संवादाः । यतः स राजा श्रवणसमकालमेव तस्मिन्भैरवाचार्ये भगवति द्वितीय इव कपर्दिनि दूरगतेऽपि गरीयसीं बबन्ध भक्तिम् । आचकाङ्क्ष च मनोरथैरप्यस्य सर्वथा दर्शनम् । अथ कदाचित्पर्यस्तेऽस्ताचलचुम्बिनि वासरेऽन्तःपुरवर्तिनं राजान- मुपसृत्य प्रतीहारी विज्ञापितवती- 'देव ! द्वारि परिव्राडास्ते, कथयति च भैरवाचार्यवचनाद्देवमनुप्राप्तोऽस्मि' इति । राजा तु तच्छ्रुत्वा साद- रम्- 'क्वासौ ? आनयात्रैव, प्रवेशयैनम्' इति चाब्रवीत् । तथा चाकरोत् प्रतीहारी । न चिराच्च प्रविशन्तं प्रांशुम् , आजानुभुजम् , भैक्षक्षाम- मपि स्थूलास्थिभिरवयवैः पीवरमिवोपलक्ष्यमाणम् , पृथूत्तमाङ्गम् . उत्तुङ्गवलिभङ्गस्थपुटललाटम् , निर्मांसगण्डकूपकम् , मधुबिन्दुपिङ्गल- परिमण्डलाक्षम् , ईषदवक्रघोणम् , अतिप्रलम्बैककर्णपाशम् , अला- बुबीजविकटोन्नतदन्तपङ्क्तिम् , तुरगानूकश्मथाधरलेखम् , लम्बचि- न चिराच्चेत्यादौ । मस्करिणमद्राक्षीदिति संबन्धः । प्रांशुं दीर्घम् । जानुरूरुपर्व । उक्तं च- 'जङ्घा तु प्रसृता जानूरुपर्वाष्ठीवद्वस्त्रियाम्' । पीवरं स्थूलम् । स्थपुटं निम्नोन्नतम् । ललाटमलिकं गोधिः । गण्डकूपोऽक्ष्णोरधोदेशः । घोणा नासिका । अलाबुस्तुम्बी । उक्तं च- 'तुम्ब्यलाबू उभे समे' । तुरगानामधस्तादोधोऽनूकः । की तो बात क्या ? वह केवल अपने मन के रथ पर चढ़ कर ही सर्वथा उनके दर्शन की आकांक्षा करने लगा । किसी दिन जब अस्ताचल की ओर दिन ढलने लगा तब प्रतीहारी ने अन्तःपुर में विराजमान महाराज के पास आकर निवेदन किया - 'देव, द्वार पर एक परिव्राजक पधारे हैं और कहते हैं कि भैरवाचार्य की आज्ञा से मै महाराज से भेंट करने आया हूँ।' उसे सुनकर राजा ने बड़े आदर के साथ 'कहाँ हैं ? यहीं लाओ, उन्हें प्रवेश करने दो' यह कहा । प्रतीहारी ने वैसा ही किया । थोड़ी देर में राजा ने प्रवेश करते हुए उस संन्यासी को देखा । उसकी कद लम्बी थी । भुजाएँ घुटनों तक थीं । भिक्षाटन के कारण वह दुबला था फिर भी मोटी हड्डियों वाले अङ्गों से वह भरा-सा प्रतीत होता था । उसका मस्तक चौड़ा था । लम्बी रेखाओं के कारण उसका ललाट नीचा-ऊँचा हो गया था । मांस के न होने से गालों में गड्ढे पड़ गए थे । पुतलियाँ शहद की बूंद की तरह पीलापन लिए थीं । नाक कुछ टेढ़ी थी । कान की एक पाली अधिक लम्बी थी । लौकी के बीज की भाँति दन्त- पंक्ति निकली हुई थी । अधर घोड़े के निचले होठ की तरह लटका हुआ था । लम्बी ठुड्डी के कारण उसका मुँह लम्बोतरा जान पड़ता था । उसके कंधे से लटकता हुआ छाल योग-