भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 506 में से

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तृतीय उच्छ्वासः १६५ विषयेषु वायवः । शिवसपर्यासमुचितैरुपायनैः प्राभृतैश्च पौराः पादोपजी- विनः सचिवाः स्वभुजबलनिर्जिताश्च करदीकृता महासामन्तास्तं सिषे- विरे । तथा हि-कैलासकूटधवलैः कनकपत्रलतालंकृतविषाणकोटिभिर्महा- प्रमाणैः संध्याबलिवृषैः सौवर्णैश्च स्नपनकलशैरर्घभाजनैश्च धूपपात्रैश्च पुष्प- पट्टैश्च मणियष्टिप्रदीपेभ्र्च ब्रह्मसूत्रैश्च महार्हमाणिक्यखण्डखचितैश्च मुखकोषैः परितोषमस्य मनसि चक्रुः । अन्तःपुराण्यपि स्वयमारब्धबालेयतण्डुलक- ण्डनानि देवगृहोपलेपनलोहिततरकरकिसलयानि कुसुमग्रथनव्यग्रसमस्त- परिजनानि तस्याभिलषितमन्ववर्तन्त । तथा च परममाहेश्वरः स भूपालो लोकतः शुश्राव भुवि भगवन्तमपरमिव साक्षाद्दक्षमखमथनं दाक्षिणात्यं बहुविधविद्याप्रभावप्रख्यातैर्गुणैः शिष्यैरनेकसहरुसंख्यैर्व्याप्तमर्त्यलोकं भैरवाचार्यनामानं महाशैवम् । उपनयन्ति हि हृदयमदृष्टमपि जनं शील- स्वर्णयष्टिर्यष्टिप्रदीपः। ब्रह्मसूत्रैर्यज्ञोपवीतैः। मुखयुक्ताः कोषा मुखकोषाः, ये लिङ्गोपरि दीयन्ते । बलये हिता बालेयाः । 'छदिरुपधिवलेर्ढञ्' । ग्रथनशब्दश्चिन्त्यः । ग्रन्थन- मिति भाव्यम् । अभिलषितमन्ववर्तन्तेत्यनेन चित्तानुवृत्तिः शुद्धान्तानां वर्णिता । मुनीनि । भूस्थश्वेऽप्यसुलभवत्त्वद्दर्शनमस्योक्तम् । शीलसंवादाश्चारित्रसादृश्यानि । कपर्दिनी शिवे । के कर्मचारी, मंत्री और भुजबल से पराजित होकर कर देने वाले बड़े-बड़े सामन्त भी भगवान् शिव की पूजा के उपयोग में आने वाले उपहारों से उसकी सेवा करते थे । कैलास के शिखर के समान उज्ज्वल, सोने के पत्तरों से मढ़े सींग के अग्रभाग वाले एवं विशाल आकृति वाले संध्याकालीन पूजा के बैल, स्नान कराने के लिए सोने के कलस, अर्घ्य के पात्र, धूप के पात्र, कढ़े हुए फूलदार कपड़े, मणिनिर्मित यष्टिप्रदीप, यज्ञोपवीत और शिवलिंग पर चढ़ाए जाने वाले मुखकोश को समर्पित करके लोग उसका मन सन्तुष्ट करते थे । अन्तःपुरों में भी उसकी इच्छा के अनुकूल पूजा के लिए स्वयं चावल के फटकने-बनाने का कार्य होता रहता था । देवमन्दिर को स्वयं लीपने से उनके हाथ लाल हो जाते थे । सबके सब परिजन माला गूथने में व्यग्र रहते थे । भगवान् शिव के परम भक्त उस राजा ने लोगों से सुना कि कोई भैरवाचार्य नामक दाक्षिणात्य महाशैव हैं जो साक्षात् भगवान् शंकर के दूसरे अवतार हैं और हजारों की संख्या में गुणों के समान अपने शिष्यों से सारे संसार में प्रसिद्ध हैं । शीलगुण का सम्मिलन पहले कभी न देखे हुए भी व्यक्ति को हृदय के समीप कर देते हैं। क्योंकि वह राजा दूर होने पर भी साक्षात् शिवस्वरूप भैरवाचार्य के विषय में सुनते ही अत्यधिक श्रद्धा करने लगा । आँखों

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