भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

१६४ हर्षचरितम् पृथुना गौरिवेयं कृतेति यः स्पर्धमान इव महीं महिषीं चकार । निसर्गस्वैरिणी स्वरुच्यनुरोधिनी च भवति हि महतां मतिः । यतस्तस्य केनचिदनुपदिष्टा सहजैव शैशवादारभ्यानन्यदेवता भगवति, भक्ति- सुलभे, भुवनभृति, भूतभावने, भवच्छिदि, भवे भूयसी भक्तिरभूत् । अकृतवृषभध्वजपूजाविधिर्न स्वप्नेऽप्याहारमकरोत् । अजम्, अजरम् , अमरगुरुम् , असुरपुररिपुम् , अपरिमितगणपतिम् , अचलदुहितृपतिम्, अखिलभुवनकृतचरणनतिम्, पशुपतिं प्रपन्नोऽन्यदेवताशून्यममन्यत त्रैलो- क्यम् । भर्तृचित्तानुवर्तिन्यश्चानुजीविनां प्रकृतयः । तथा हि-गृहे गृहे भग- वान्पूज्यत खण्डपरशुः। ववुरस्य होमालवालानलविलीयमानबहलगुग्गुलु- गन्धगर्भाः स्नपनक्षीरशीकरक्षोदक्षारिणो बिल्वपल्लवदामदलोद्वाहिनः पुण्य- महिषीं महादेवीमपि । निसर्गः स्वभावः । स्वैरिणी स्ववशा । खण्डपरशुः शिवः । ववुरवहन् । होमालवालमग्निकुण्डम् । सपर्या पूजा । उपायनं ढौकनिका स्वयानीयते । प्राभृतं कौशालिका सखिभिः प्रहीयते । करदीकृता दण्डदाः कृताः । कूटं शृङ्गम् । यत्र वस्त्रेषु पुष्पाणि सूत्रैः क्रियन्ते स पुष्पपट्टः । ज्वलन्मणिशिखरः शत्रुघ्न ( शत्रु को मारने वाला ), शूरसन या शूरों का सेना पर आक्रमण करने में शूर और प्रजा के कार्य में दक्ष अर्थात् चतुर या दक्षप्रजापति के समान था । इस प्रकार वह मानों पूर्वकाल के समस्त राजाओं की तेजराशि से निर्मित हुआ था । आदिराज पृथु ने पृथिवी को धेनु बनाया था । इसी स्पर्धा में उसने पृथिवी को अपनी महिषी (भैंस, अर्थात् पत्नी) बना दिया । बड़े लोगों की बुद्धि स्वभाव से ही स्वतन्त्र और अपनी रुचि के अनुरोध पर चलने वाली होती है । जैसा कि उस राजा की अनन्य भक्ति किसी के उपदेश के बिना ही सहज रूप में बाल्यकाल से ही भगवान् शंकर में थी, जो भक्तिद्वारा सुलभ, संसार का भरण करने वाले और मोक्ष देने वाले हैं। स्वप्न में भी वह बिना शिव की पूजा किए कुछ भी खाना-पीना न था । वह भगवान् पशुपति शंकर की शरण में प्रपन्न था, जो अज, अजर, देवों के देव, त्रिपुरारि, असंख्य प्रमथ गणों के स्वामी, पार्वती के पति, सारे संसार द्वारा वन्दित चरणों वाले हैं। वह मानता था कि शिव के अतिरिक्त इस संसार में कोई अन्य देवता नहीं। स्वामी के चित्त के अनुसार ही स्वभाव से उसके अनुजीवी लोग भी प्रवृत्त होते हैं। फलतः घर-घर में भगवान् शंकर की पूजा होती थी । चारों ओर उस राजा के देश में होम के थले में पड़ते हुए गुग्गुल की गंध से भरी हुई, शिवजी को दूध से नहलाने में उड़े हुए फुहारों से शीतल, एवं बेल के पत्ते की माला को उड़ाती हुई हवा बहने लगी । पुरवासी, राज्य