हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 208, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंकल्याणप्रकृतित्वे, मन्दरमय इव लक्ष्मीसमाकर्षणे, जलनिधिमय इव मर्यादायाम्, आकाशमय इव शब्दप्रादुर्भावे, शशिमय इव कलासंग्रहे, वेदमय इवाकृत्रिमालापत्वे, धरणिमय इव लोकधृतिकरणे, पवनमय इव सर्वपार्थिवरजोविकारहरणे, गुर्व्वचसि, पृथुरुरसि, विशालो मनसि, जनकस्तपसि, सुयात्रस्तेजसि, सुमन्त्रो रहसि, बुधः सदसि, अर्जुनो यशसि, भीष्मो धनुषि, निषधो वपुषि, शत्रुघ्नः समरे, शूरः शूरसेना- क्रमणे, दक्षः प्रजाकर्मणि, सर्वादिराजतेजःपुञ्जनिर्मित इव राजा पुष्य- भूतिरिति नाम्ना बभूव ।
शुक्लाद्याश्च । कल्याणं श्रेयः, सुवर्णं च । मन्दरेण श्रीराकृष्टामृतमन्थने, पुष्यभूतिना भैरवाचार्यवेतालसाधने । मर्यादाचारः, सीमा च । शब्दो यशोऽपि । प्रादुर्भावः प्रकाशता । कला गीताद्याः, लेखाश्च । अकृत्रिमः सत्ययुक्तः, अपौरुषेयश्च । धृतिर्धैर्यम्, धारणं च । पार्थिवो राजा, पृथिवीसंबन्धी च । रजोविकारा रागाद्याः, रेणुकार्याणि । गुर्व्वित्यादिना वक्रोक्त्याज्ञानां गुर्वादिमयत्वं सूचयति । गुरुरुपदेष्टा, गुरुर्महान् । गम्भीरशब्दत्वाद्वृहस्पतिश्च । पृथुर्विपुलः, आदिराजश्च कश्चित् । विशाला विस्तीर्णाः, विशालाद्याश्च नृपा अभवन् । अथ विशालो नाम बोधिसत्त्वः स एव शान्तः शान्तमना इत्यपि प्रतीतिरस्ति । जनको जनयिता, जनक इव तपस्वी च । सुयात्र इति । शोभना यात्रा यस्य सोऽपि । कर्तव्यावधारणं मन्त्रः स शोभनो यस्येति च । बुधः पण्डितः, ग्रहश्च । अर्जुनः शुक्लोऽपि । भीष्मो भयानकः, गाङ्गेयश्च । निषधो धर्षणीयः, कठिनो वा, नलस्य च पिता, गिरिभेदो वा । शूरो विक्रान्तः, यदूनां राजा च । दक्षश्चतुरः, प्रजापतिश्च ।
के नियमनार्थ धनुष धारण किया । कल्याण प्रकृति अर्थात् श्रेय का भावना स भरा होने के कारण वह मानों कल्याण ( सुवर्ण ) के सुमेरु से निर्मित था । वह लक्ष्मी के आकर्षण करने में मन्दराचल के समान, मर्यादा में समुद्र के समान, शब्द रूप यश को उत्पन्न करने में आकाश के समान, कलाओं के संग्रह में चन्द्र के समान, स्वाभाविक बातचीत करने में वेद के समान, सारे लोक के धारण करने में पृथिवी के समान और पार्थिव अर्थात् राजाओं ( अथवा पृथिवी सम्बन्धी ) रजोविकार दूर करने में वायु के समान था । और वह वाणी में महान् या बृहस्पति था, वक्ष के सम्बन्ध में पृथु अर्थात् विपुल था या राजा पृथु के समान था, मन में विशाल था, तपस्या करने में जनक था, तेज में सुयात्र नामक राजा के समान था, रहस्य के सम्बन्ध में सुमन्त्र अर्थात् शोभन मंत्र या विचार देने वाला अथवा सुमन्त्र नामक राजा के समान था, सभा में विद्वान्, यश में अर्जुन ( उज्ज्वल ), धनुष में भीष्म ( भयंकर ), शरीर में अधर्षणीय या निषध, समर में