भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

१६२ हर्षचरितम् कुलस्त्रीजनाचारो जालिका, वाण्येव मधुरतरा वीणा बाह्यविज्ञानं तन्त्री- ताडनम्, हासा एवातिशयसुरभयः पटवासा निरर्थकाः कर्पूरपांसवः, अधरकान्तिविसर एवोज्ज्वलतरोऽङ्गरागो निर्गुणो लावण्यकलङ्कः कुङ्कुम- पङ्कः, बाहव एव कोमलतमाः, परिहासप्रहारवेत्रलता निष्प्रयोजनानि मृणालानि, यौवनोष्मस्वेदबिन्दव एव विदग्धाः कुचालंकृतयो हारास्तु भाराः, श्रोण्य एव विशालस्फटिकशिलातलचतुरस्रा रागिणां विश्रमका- रणनिमित्तं भवनमणिवेदिकाः । कमलोभनिलीनान्यलिकुलान्येव मुखराणि पदाभरणकानि निष्फलानीन्द्रनीलमणिनूपूराणि । नूपुररवाहूता भवनकलहंसा एव समुचिताः संचरणसहाया ऐश्वर्यप्रपञ्चाः परिजनाः । तत्र च साक्षात्सहस्राक्ष इव सर्ववर्णधरं धनुर्दधानः, मेरुमय इव दलदामाभ्यासोत्कर्षः, न तु कुवलयदल्दामसंभवेऽपि प्रतिनिधि रूपतापादनम् । भार इत्यनेनैष एवार्थः प्रकटितः । एवमक्लिष्टा इत्यादिदौ बोद्धव्यम् । आडम्बरः स्फुटः । जालिका शिरोवस्त्रभेदः । चतुरस्त्रा रम्याः । विश्रमकारणमिति गुरुत्वात् । तत्र चेत्यादौ । तत्र पुष्यभूतिर्नाम राजासीदिति संबन्धः । वर्णा विप्राद्याः, सुन्दर घूँघट-पट का काम करते थे, फिर भी प्रथा के नाते वे अपने मुख पर घूंघट का जाली डाल लेती थीं । उनकी वाणी अत्यन्त मधुर थी, वाह्य कला के रूप में वे तारों को छेड़ कर वीणा बजाती थीं । उनकी मुसकान ही अत्यन्त सुगन्धित पटवास का काम देती, फिर कपूर की धूल निरर्थक प्रतीत होती थी । उनके अधर की फैलती हुई कान्ति ही उनके शरीर पर अंगराग का रूप धारण कर लेती, फिर बिना किसी लाभ के कुंकुम लगाना उनके लावण्य का कलंक बन जाता था । उनकी कोमल भुजाएँ ही परिहास के अवसर में ठोंकने की वेत्रलता थीं, फिर मृणालों का वहां प्रयोजन ही क्या ? जवानी की गरमी से उनके स्तनों पर छूटते हुए पसीने ही सुन्दर हार के समान लगते, फिर उनके शरीर पर हार बोझ मात्र प्रतीत होते थे । उनके नितम्ब ही प्रेमी जनों के विश्राम के लिए स्फटिकमणि के विशाल गढ़े हुए शिलातल की बनी भवन वेदिका के समान थे । उनके चरणों को कमल समझ कर बैठे हुए भौंरे ही उनके चरणाभरण थे, वहां इन्द्रनील मणियों के नूपुर निष्फल थे । नूपुर की आवाज से खिंचे हुए भवन के कलहंस ही उनके घूमने के लिए योग्य साथी बनते, केवल ऐश्वर्य के प्रदर्शन के लिए उनके साथ परिजन रहा करते थे । उस स्थाण्वीश्वर में पुष्पभूति नामक एक राजा हुआ । जैसे इन्द्र विविध प्रकार के वर्णों (रंगों) वाला धनुष धारण करता है उसी प्रकार उसने समस्त ब्राह्मण आदि वर्णों