हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 206, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उच्छ्वासः १६१ दरिद्रमध्यकलिताश्च, लावण्यवत्यो मधुरभाषिण्यश्च, अप्रमत्ताः प्रसन्नोज्ज्व- लमुखरागाश्च, अकौतुकाः प्रौढाश्च प्रमदाः । यत्र च प्रमदानां चक्षुरेव सहजं मुण्डमालामण्डनं भारः कुवलयदल- दामानि, अलकप्रतिबिम्बान्येव कपोलतलगतान्यक्लिष्टाः श्रवणावतंसाः पुनरुक्तानि तमालकिसलयानि, प्रियकथा एव सुभगाः कर्णांलंकारा आड- म्बरः कुण्डलादिः, कपोला एव सततमालोककारका विभवो १निशासु मणिप्रदीपाः सुरभिनिःश्वासाकृष्टं मधुकरकुलमेव रमणीयं मुखावरणं कलत्रं जघनम् । दरिद्रं क्षामं मध्यमुदरं यासाम् । कलत्रस्य परिवारस्य पृथ्वीः श्रीस्ताः कथं दरिद्राणां निर्धनानां मध्ये कलिताः संख्याता भवन्ति । लावण्यं सौन्दर्यम् ; मधुरं हृद्यम् । लावण्यरसवतीनां मधुरभाषितं विभाव्यते । अप्रमत्ताः प्रमादशून्याः । प्रसन्नो मनोहरः । उज्ज्वलो मनोहारी । प्रसन्ना च सुरा तयोज्ज्वलो मुखरागो यासां ताः, कथमप्रमत्ता अक्षीबाः । अकौतुका अकरकङ्कणाः । विवाहि- तानां हि करकङ्कणोऽवबध्यते । 'रुद्राक्षदर्पसिद्धार्थशिखिपक्षोरगत्वचः । कङ्कणौषध- यश्चेति कौतुकाख्याः प्रकीर्तिताः ॥' मुण्डमालारूपं मण्डनं मुण्डमालामण्डनम् । सहजमकृत्रिमम् । अनेककुवलय- (जो राजा पृथु के समान हो वे दरिद्रों के मध्य में कैसे गिना जायगा ? ) । वे लावण्य वाली और मधुरभाषिणी थीं (जो लावण्यवती अर्थात् नमकीन हैं वे मधुर कैसे हो सकती हैं ?) । वे प्रमादशून्य थीं और उनका वर्ण प्रसन्न एवं उज्ज्वल था (जो प्रमत्त नहीं वे प्रसन्ना अर्थात् मदिरा के कारण शृङ्गार में डूबे हुये मुखराग वाली कैसे हो सकती हैं ?) । अकौतुका अर्थात् प्रियसमागम के लिए उत्सुक न थीं और पूर्ण यौवन पर आ पहुँची थीं (जो अकौतुका अर्थात् वैवाहिक मंगलसूत्र से रहित हों वे प्रौढ़ा अर्थात् विवाहिता कैसे हो सकती हैं ?) । वहां सुन्दरियों की आँखें ही सिर की सहज फूल-माला बन जातीं, कुवलय के फूलों की माला भार प्रतीत होती । उनके गालों पर छितराए हुए बालों के प्रतिबिम्ब ही क्लेश न देने वाले कर्णावतंस बन जाते, फिर कान में कर्णावतंस के रूप में तमालपत्र का लगाना पुनरुक्तिमात्र हो जाता । अपने प्रिय की कथा ही उनके लिए सुन्दर कान का आभूषण बन जाती, फिर भी उनका कुण्डल लगाना आडम्बरमात्र था । उनके कपोल ही निरन्तर आलोक उत्पन्न करते थे, मणियों के दीपक तो केवल वैभव के चिह्न होने के कारण रखे जाते थे। उनकी सुगन्धित सांसों पर लझते हुए भौंरे ही उनके मुख पर १. निःश्वासमणिप्रदीपाः । ११ ह० च०