हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० हर्षचरितम्
विवरमिति वातिकैः शाक्याश्रम इति शमिभिः, अप्सरःपुरमिति कामिभिः, महोत्सवसमाज इति चारणैः, वसुधारेति च विप्रैरगृह्यत । यत्र च मातङ्गगामिन्यः शीलवत्यश्च, गौर्यो विभवरताश्च, श्यामाः पद्मरागिण्यश्च, धवलद्विजशुचिवदना मदिरामोदिश्वसनाश्च, चन्द्रकान्त- वपुषः शिरीषकोमलाङ्ग्यश्च, अभुजङ्गगम्याः कञ्चुकिन्यश्च, पृथुकलत्रश्रियो
बन्दिभ्योऽभिवाञ्छितसंपत्तेः सुकृतपरिणामता । वातिकैर्विवरव्यसनिभिराचार्यैः । शाक्यो बौद्धः । चारणैः कुशीलवैः । वसुधारा धनप्रवाहः । मातङ्गेत्यादयो विरोधाः । मातङ्गो हस्ती, चण्डालश्च । याः प्रमदाश्चण्डालानपि गच्छन्ति ताः कथं शीलवत्य इति विरोधः सर्वत्र ज्ञेयः । गौर्यो गौराङ्ग्यः । विभव ऐश्वर्ये रक्ताः । यन्न विगता भवतस्तन्न कथं गौरा रतेति । विगतं भवे रतं यस्या वा । श्यामाः श्यामलाङ्ग्यः । पद्मरागिण्यो लोहितमणिभूषणाः । श्यामा रात्रयः कथं पद्मरागिण्यः । रात्रौ पद्मानां संकोचात् । द्विजैर्दन्तैः । शुचिवदना मदिरावन्मदिरयैव वा । आमोदी श्वसनो मुखमारुतो यासां, धवलद्विजवच्छुद्धब्राह्मणवच्छुचि वदनं ताः कथं मदिरामोदिश्वसनाः । चन्द्रवत्कान्तं वपुर्यासाम् । शिरीषपुष्पवत्सुकुमाराङ्ग्य- श्चन्द्रकान्तस्येव वपुर्यासां ताः, कथं शिरीषकोमलाङ्ग्यः । भुजङ्गा विटाः, कञ्चुकं स्त्रीणां वासः, वारबाणाख्यश्च । याश्च कञ्चुकिन्यः सर्पिण्यस्ताः कथं भुजङ्गैर्न गम्याः ।
कामी लोग उसे अप्सराओं का नगर कहते, चारणों के अनुसार वह महोत्सवों का समाज था और उसे धन का प्रवाह ही समझते । वहां१ की स्त्रियां मातङ्गगामिनी (चाण्डाल का गमन करने वाली नहीं बल्कि) अर्थात् हाथी के समान चलने वाली और शीलवती थीं। वे गौरी (पार्वती) अर्थात् गौर वर्ण वाली थीं और (पार्वती होकर भी भव अर्थात् शिव में अनुरक्त न थीं) विभव अर्थात् ऐश्वर्य में अनुराग करती थीं। श्यामा (रात्रियां) अर्थात् सांवली थीं और पद्मरागिणी (कमलों में अनुराग करने वाली, रातें कमलों में अनुराग नहीं करतीं) अर्थात् लाल मणियों के आभूषण पहनती थीं। उजले दाँतों से उनका मुख पवित्र था और मदिरा की गंध वाली सांस लेती थीं। चन्द्रमा के समान सुन्दर देहवाली थीं (या चन्द्रकान्त के समान कठोर थीं फिर भी) शिरीष के फूल के समान उनके अंग कोमल थे। भुजङ्ग अर्थात् गुंडे उन्हें प्राप्त नहीं कर सकते थे और वे कञ्चुक धारण करती थीं (जो कंचुकिनी अर्थात् सर्पिणी हैं वे क्यों नहीं भुजङ्ग अर्थात् सर्पों द्वारा गम्य हैं?), पृथु अर्थात् मोटे जघनों से सुशोभित थीं और उनका मध्य अर्थात् कटिभाग पतला था
१. यहां कोष्ठकों में विरोध के रूप में आभासित होने वाले अर्थ दिए गए हैं।