भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 204

तृतीय उच्छ्वासः १५६ विपक्ष इवोत्तरकुरुणाम् , ईश्वरमार्गणसंतापानभिज्ञसकलजनो विजिगी- षुरिव त्रिपुरस्य, सुधारससिक्तधवलगृहपङ्क्तिपाण्डुरः प्रतिनिधिरिव चन्द्र- लोकस्य, मधुमदमत्तकाशिनीभूषणरवभरितभुवनो नामाभिहार इव कुबेर- नगरस्य, स्थाण्वीश्वराख्यो जनपदविशेषः । यस्तपोवनमिति मुनिभिः, कामायतनमिति वेश्याभिः, संगीतशालेति लासकैः, यमनगरमिति शत्रुभिः, चिन्तामणिभूमिरित्यर्थिभिः, वीरक्षेत्र- मिति शस्त्रोपजीविभिः, गुरुकुलमिति विद्यार्थिभिः, गन्धर्वनगरमिति गायनैः, विश्वकर्ममन्दिरमिति विज्ञानिभिः, लाभभूमिरिति वैदेहकैः, द्यूतस्थानमिति बन्दिभिः, साधुसमागम इति सद्भिः, वज्रपञ्जरमिति शरणागतैः, विटगोष्ठीति विदग्धैः, सुकृतपरिणाम इति पथिकैः, असुर- संतापानभिज्ञेति । ईश्वरशरेण हि सस्त्रीकं त्रिपुरं दग्धम् । योधजनास्ते हि युद्धे देवैर्हता इत्याहुः । जेताऽत्र विजिगीषुः । 'सुधा मकोलामृतयोः'। मत्तकाशिनी मुख्या स्त्री, यक्षिणी च । नामाभिहारः पर्यायान्तरम् । लासकैर्नटैः । वैदेहकैर्वणिग्भिः । द्यूतस्थानमिति साधुभ्यो भागो दीयते तत्र । (महावाहिनी या सेनाएं) अपनी कलकल से उसे भर देती थीं, मानो उत्तर कुरु ही वहां आ गए हों। राजा के छल-पूर्वक कर लेने की बात तो यहां के लोग जानते ही नहीं थे, मानो वह त्रिपुर के जीतने का इच्छुक है । सुधा १ के रस से पुते हुए उजले-उजले वहां भवन थे, मानों वह चन्द्रलोक का प्रतिनिधि हो । मधुपान से मतवाली कामिनियों के गहनों की आवाज सारे भुवन में व्याप्त हो जाती थी मानो वह कुबेर की नगरी अलका का ही बदला हुआ रूप हो । मुनि लोग उसे तपोवन कहते, वेश्याएं उसे कामायतन (कामोपभोग का स्थान) समझतीं, लासक अर्थात् नर्तक लोग समझते कि यह संगीतशाला है, शत्रु समझते कि यमनगर है, याचक समझते कि चिन्तामणि की भूमि है, शस्त्रों की जीविकावाले लोग उसे वीरक्षेत्र कहते, विद्यार्थी उसे गुरुकुल कहते, गाने वाले उसे गन्धर्वनगर समझते, वैज्ञानिक उसे विश्वकर्मा का मन्दिर समझते, वणिक् लोग कहते कि आमदनी की जगह है, बन्दी लोगों का निर्णय था कि जुआ खेलने योग्य स्थान है, सज्जन लोग उसे साधु- समागम कहते, शरणार्थी लोग उसे वज्रनिर्मित पिंजड़ा समझते, चतुर लोग विटगोष्ठी की कल्पना करते, पथिक लोग उसे अपने पुण्यों का परिणाम-स्वरूप मानते, वातिक लोग साधना के लिए उसे असुर-विवर समझते, भिक्षु लोग उसे बौद्धविहार मानते, १. चूना, चन्द्रपक्ष में अमृत ।