हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ | हर्षचरितम् त्रासिता इव नोपासर्पन्नपमृत्यवः संततब्रह्मघोषबधिरीकृता इवापजग्मु- रीतयः । धर्माधिकारपरिभूतमिव न प्राभवद्द्दैवम् । तत्र चैवंविधे नानारामाभिरामकुसुमगन्धपरिमलसुभगो यौवनारम्भ इव भुवनस्य, कुङ्कुममलनपिञ्जरितबहुमहिषीसहस्रशोभितोऽन्तःपुरनिवेश इव धर्मस्य, मरुदुद्धूयमानचमरीबालव्यजनशतधवलितप्रान्त एकदेश इव सुरराज्यस्य, ज्वलन्मखशिखिसहस्रदीप्यमानदशदिगन्तः शिबिरसंनि- वेश इव कृतयुगस्य; पद्मासनस्थितब्रह्मर्षिध्यानाधीयमानसकलाकुशलप्र- शमः प्रथमोऽवतार इव ब्रह्मलोकस्य, कलकलमुखरमहावाहिनीशतसंकुलो गौर्भिः सह दान्तोऽरण्ये स्वैरविहाराय परित्यज्यते । ब्रह्मघोषो वेदध्वनिः । 'अति- वृष्टिरनावृष्टिर्मूषकाः शलभाः शुकाः । अत्यासन्नाश्च राजानः षडेता ईतयः स्मृताः ॥' इति । तत्र चेत्यादौ । स्थाण्वीश्वराख्यो जनपदविशेष इति संबन्धः । आरामा उप- वनानि, रामाश्च भार्याः । गन्धस्य परिमलस्याभोगोऽनुभवः, संस्कारः । मलनं निवर्तनम्, समालम्भनं च । महिषी मुख्या जायापि । मरुतो वाताः, देवाश्च । शिबिरसंनिवेशः कटकबन्धः । कृतं प्रतिसमाहितं युगं द्वयं स्वपक्षपरपक्षरूपं येन स राजोच्यते; कृतयुगं वाच्यो युगभेदः । पद्मासनमासनभेदः, पद्ममेवासनं च । ब्रह्मर्षय उत्तमद्विजाः । ब्रह्मा चासावृषिश्चेति । यद्वा, -पद्मासनस्थितो ब्रह्मा च ऋषयश्चेति द्वन्द्वः । वाहिन्यो नद्यः, सेना च । विपत्क्षो बलम्, मेरुसमीपवासिनो जनाश्चोत्तरकुरवः । ईश्वरमार्गणो राजदण्डसाधनयाच्ञा, हरशरश्रेष्ठेश्वरमार्गणः । में जलती हुई अग्नियों के ताप से संतप्त होकर विलीन हो गईं । वृषोत्सर्ग के अवसर पर बजाए गए नगाड़ों की ध्वनि से डर कर मानों अपमृत्यु पास में नहीं फटकती थी । ईति बाधाएं मानों निरन्तर वेदध्वनि के होने से बहरी होकर चली गईं । दुर्भाग्य मानों धर्म के अधिकार से परिभूत होकर उत्पन्न ही नहीं हुआ । इस प्रकार के उस जनपद में स्थाण्वीश्वर नाम की राजधानी थी । अनेक उपवनों में सुन्दर फूलों की फैलती हुई गन्ध से ऐसा लगता था मानों संसार के यौवन का आरम्भ होने लगा हो । कुंकुम की उबटन से हजारों सुन्दरियों अपने शरीर की श्रीवृद्धि करती थीं, मानों वह धर्म का अन्तःपुर हो । वायु से कम्पित चमरी गाय के बालों से उसके समीप का भू-भाग सफेद था, मानो वह स्वर्ग का एकदेश हो । जलती हुई हजारों अग्नियों से समस्त दिशाएं प्रकाशित थीं मानो वह सतयुग का सेनानिवेश ( सेना के रहने की छावनी ) हो । पद्मासन लगाकर बैठे हुए ब्रह्मर्षि सारे अकुशलों का शमन करते थे, मानो वह ब्रह्मलोक का प्रथम अवतार हो । बड़ी-बड़ी सैकड़ों नदियां