भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 506 में से

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पृष्ठ 202

तृतीय उच्छ्वासः १५७ मथितपयःप्रवाहप्रक्षालितक्षितिभिः क्षीरोदमथनारम्भैरिव महाघोषैः पूरिताशः श्रीकण्ठो नाम जनपदः । यत्र त्रेताग्निधूमाश्रुपातजलक्षालिता इवाक्षीयन्त कुदृष्टयः । पच्यमान- चयनेष्टकादहनदग्धानीव नादृश्यन्त दुरितानि । छिद्यमानयूपदारुपरशु- पाटित इव व्यदीर्यताधर्मः । मखशिखिधूमजलधरधाराधौत इव ननाश वर्णसंकरः । दीयमानानेकगोसहस्रशृङ्गखण्ड्यमान इवापलायत कलिः । सुरालयशिलाघट्टनटङ्कनिकरनिकृत्ता इव व्यदीर्यन्त विपदः । महादान- विधानकलकलाभिद्रुता इव प्राद्रवन्नुपद्रवाः । दीप्यमानसत्रमहानससहस्रा- नलसंतापिता इव व्यलीयन्त व्याधयः । वृषविवाहप्रहतपुण्यपटहपटुरव- मथितं तक्रम्, विलोडितं च । पयः क्षीरम् । उभयत्रापि मथनमन्या क्षीरोदस्य । घोषो गोष्ठः, शब्दश्च । आशा आशंका, दिशश्च । 'दक्षिणाग्निर्गार्हपत्याहवनीयौ त्रयोऽग्नयः । अग्नित्रयमिदं त्रेता' इत्यमरसिंहः । अनेकार्थवर्गेऽपि—'त्रेताग्नित्रितये युगे' । त्रेताग्निरूपोऽग्निरित्यग्नित्रिकर्षार्थं त्रेतापदम् । अन्यथा तादृशस्याग्नेर्ग्रहणं प्रसज्येत । कुत्सितानि लोकायतादीनां वेदविरुद्धानि दर्शनादीनि, कुत्सिताश्च दृष्टयः कुदृष्टयः । यत्र त्रेताग्नयो हूयन्ते तत्र क्षालिता आविर्भावाद्वृष्टिर्निर्मला भवति । चयनं चित्या विशिष्टामिष्टकास्थानम् । घनधाराधौतो ह्यवश्यं संकीर्णवर्णो नीलादिर्नश्यति । वर्णाश्च विप्राद्याः । टङ्कः पाषाणदारणः । सत्रं सदादानम् । महानसं पाकस्थानम् । वृषविवाहो नीलवृषोत्सर्गः । यत्र चतसृभि- हुआ दिशाओं में भरने लगता था, तब ऐसा लगता कि क्षीर-सागर के मंथन का आरम्भ हो गया हो । वहां त्रिविध¹ अग्नियों से उत्पन्न धुएँ के लगने के कारण निकले हुए अश्रुजल से धुल कर मानों असत् दृष्टियां (विचार) समाप्त हो गई थीं। चयन-यज्ञ के ईंटे की अग्नियों से मानों जल कर पाप दिखाई नहीं देने लगे । यूप की छिली हुई लकड़ी में बांध कर फरसे से काटे गए पशु की भांति मानो अधर्म विदीर्ण हो गया । यज्ञ की अग्नि से उठे हुए मेघ की भाँति धुएँ की जलधार से धुल कर मानों वर्णों (जातियों) की विषमता मिट गई । दान में दी जाती हुई हजारों की संख्या में गायों के सींगों से मानों टुकड़े-टुकड़े होकर कलि भाग गया । विपत्तियां मानों देवमन्दिर के पत्थरों को छांटने वाली टांकियों से खण्डित होकर चूर्ण हो गईं। उपद्रव मानों महादानों के समय में होने वाले कोलाहल से ऊब कर भाग गए । व्याधियाँ मानों सत्रों के रसोइयाघर १. त्रिविध अग्नियों—दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य और आहवनीय । इन्हें त्रेता कहते हैं ।

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