हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ हर्षचरितम् कृतसंबाधः, दिशि दिशि रविरथतुरगविलोभनायैव विलोठनमृदितकुङ्कु- मस्थलीरससमालब्धानामुत्प्रोथपुटैरन्मुखैरुदरशायिकिशोरकजबजननाय प्रभञ्जनमिव चापिबन्तीनां वातहरिणीनामिव स्वच्छन्दचारिणीनां वड- वानां वृन्दैर्विचरद्भिराचितः, अनवरतक्रतुधूम्रान्धकारप्रवृत्तैर्हंसयूथैरिव गुणैर्धवलितभुवनः, संगीतगतमुरजरवमत्तैर्मयूरैरिव विभवैर्मुखरितजीवलो- कः, शशिकरावदातवृत्तैर्मुक्ताफलैरिव गुणिभिः प्रसाधितः, पथिकशतवि- लुप्यमानस्फीतफलैर्महातरुभिरिव सर्वातिथिभिरभिगमनीयः, मृगमदपरि- मलवाहिमृगरोमाच्छादितैर्हिमवत्पादैरिव महत्तरैः स्थिरीकृतः, प्रोद्दण्ड- सहस्रपत्रोपविष्टद्विजोत्तमैर्नारायणनाभिमण्डलैरिव तोयाशयैर्मण्डितः, वत्सा । प्रभञ्जनं वातम् । वडवा अश्वाः । धूमान्धकारप्रवृत्तैर्बाणैर्वर्धितभुवन इति विरोधच्छाया । हंसानामप्यन्धकारप्रवृत्तत्वं तमसि प्रचारात् । प्रवृत्तैराविर्भूतैः । हंसपक्षे—पलायितैः । वृत्तं चरितम्, परिवर्तुलं च गुणिभिः शौर्यादिगुणयुक्तैः, ससूत्रैश्च । फलमैश्वर्यमपि । अभिगमनीयः सेव्यः । मृगमदः कस्तूरिका । मृगरोम- शब्देन तत्कृतवस्त्रमुच्यते । यस्य राङ्कवमिति संज्ञा । यथा च—'राङ्कवं मृग- रोमजम्' । अन्यत्र,-मृगाणां रोमाणि । पादाः प्रत्यन्तपर्वताः । महत्तरैर्वृद्धैः, विपुलैश्च । सहस्रपत्राणि पद्मानि । द्विजोत्तमाः पक्षिश्रेष्ठाः, ब्राह्मणाश्च द्विजोत्तमाः । दिशाओं में घोड़ियाँ मानों सूर्य के रथ के घोड़ों को लुभाने के लिए चरती थीं । कुंकुम की भूमि में मुँहलेट करने से कुंकुम का रस उनके शरीर में लग जाता था । मुँह उठा कर थुथुन को मरोड़ जब वे हवा पीतीं तो लगता कि अपने पेट के बच्चे को हवा की गति सिखाने का प्रयत्न करती हैं । वे वातहरिणियों के समान स्वच्छन्द विचरण करती थीं । निरन्तर यज्ञ-धूम के अन्धकार द्वारा फैलते हुए गुण हंसयूथ की भाँति लगते थे । वह जनपद संगीत में मृदङ्ग की आवाज पर मत्त होकर नाचते हुए मयूरों के समान अपने विभव से सारे जीवलोक को मुखरित कर रहा था । चन्द्रमा की किरणों के समान अवदात चरित वाले मुक्ता-रूप गुणिजनों से वह सुशोभित था । सैकड़ों राही जैसे किसी महान् वृक्ष के फलों को लपक-लपक कर लेने लगते हैं उसी प्रकार सब अतिथि वहाँ आकर तृप्त होते थे । कस्तूरी की सुगन्ध में बसे हुए मृगरोम द्वारा निर्मित वस्त्र को पहनने वाले, हिमालय के समीप के पर्वतों के समान वहाँ महत्त्वशाली लोग रहते थे । विष्णु के नाभि-मण्डल के समान वहाँ अनेक जलाशय थे, जिनमें खिले हुए ऊँचे कमलों पर उत्तम पक्षी १ सुशोभित होते थे । दूध के महने से उठा हुआ महाघोष वहाँ की पृथिवी को धोता १. विष्णु की नाभि के पक्ष में द्विजोत्तम अर्थात् ब्रह्माजी ।