भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 506 में से

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पृष्ठ 200

तृतीय उच्छ्वासः १५५ पाण्डुरीकृतैः प्रथमोद्धूलनभस्मधूसरैः शिवपुरस्येव प्रवेशैः प्रदेशैरुपशो- भितः, शाककन्दलश्यामलितमामोपकण्ठकाश्यपीपृष्ठः, पदे पदे करभ- पालीभिः पीलुपल्लवप्रस्फोटितैः करपुटपीडितकोमलमातुलुङ्गीदल- रसोपलिप्तैः स्वेच्छाविचितकुङ्कुमकेसरकृतपुष्पप्रकरैः प्रत्यग्रफलरसपान- सुखसुप्तपथिकैर्वनदेवतादीयमानामृतरसप्रपागृहैरिव द्राक्षालतामण्डपैः स्फुरत्फलानां च बीजलग्रशुकचञ्चूरागाणामिव समारूढकपिकुलकपोलसं- दिह्यमानकुसुमानां दाडिमीनां वनैर्विलोभनीयोपनिर्गमः, वनपालपीय- माननारिकेलरसासवैश्च पथिकलोकलुप्यमानपिण्डखर्जूरैर्गोलाङ्गूललिह्य- मानमधुरामोटपिण्डीरसैश्चकोरचञ्चुजर्जरितारुकैरुपवनैरभिरामः, तुङ्गाजु॑- नपालीपरिवृतैश्च गोकुलावतारकलुषितकूलकीलालैरध्वगशतशरण्यैररण्यव- रुणधराबन्धैरवन्ध्यवनरन्ध्रः, करभीयकुमारकपाल्यमानैरुष्ट्रकैरौरभ्रकैश्च कृष्णशारा मृगभेदाश्च । प्रमथा गणाः । प्रवेशैर्मार्गेः । काश्यपी भूः । करभपा- लीभिः । इत्थंभूतलक्षणे तृतीया । करभो बालोष्ट्रः । पीलुवृक्षभेदः । प्रस्फोटितै- र्नीराजनीकृतैः । प्रपा पानीयशालिका । उपनिर्गमनानि निर्गमनमार्गाः । उद्या- नानीति केचित् । अर्जुनाः ककुभवृक्षाः । कीलालं तोयम् । धराबन्धास्तटाकानि । करभेभ्यो हिताः करभीयाः । औष्ट्रकैरूष्ट्रसमूहैः । कृतसंबाध आवृत्तः । किशोरका के वनों से उड़-उड़ कर उजले पराग उस प्रकार भर कर शोभा उत्पन्न करते थे जैसे प्रमथ गणों के भस्म रमाने से भगवान् शिव के नगर-मार्ग शोभित हो जाते हैं । गाँव के गायड़े में साग के साँवले अँखुर लग रहे थे। निर्गम के मार्गों में ऊँट के बच्चे आखरोट के पत्ते तोड़कर चट कर जाते । हाथों से पचकाकर चुभाए हुए मातुलुंगी के कोमल फलों के रस से लिपे, स्वेच्छा से तोड़े गए पुष्पों के पराग से भरे लतामण्डप थे जहाँ ताजे फलों को चूस कर पथिक लोग सुख-पूर्वक सोते, मानों वनदेवताओं ने अमृतरस के पनसाले के रूप में उन्हें अर्पित किया हो । और भी, वहाँ जिनके लाल लाल बीजों में मानों सुग्गे के चोंच की लाली लग गई हो ऐसे अनार के फल लगे थे । उन पर बैठे हुए वानरों के लाल- लाल गालों को देखकर फूलों का भ्रम होने लगता था । वहाँ के उपवनों में माली नारियल के फलों का पानी पीते थे । राह चलते लोग पिंड खजूर लपक लेते थे । लंगूर मधुर गंध से भरी ताड़ी को चाट जाते । चकोर आरुक नामक फलों को कुतर डालते । लम्बे-लम्बे कुकुभ वृक्षों की श्रेणियों से वहाँ के जलाशय घिरे हुए थे । उनमें पशुओं के उतर कर जल पीने से किनारे का पानी मटमैला रहता था । सैकड़ों राही वहाँ आकर टिकते थे । ऊँटों के पालने वाले लोग ऊँटों के साथ-साथ मेढ़ों को भी चारों ओर जुटाते थे । कहीं कहीं