हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५४ हर्षचरितम् लाहलैलैरालक्ष्यमानक्षेत्रः, क्षीरोदपयःपायिपयोद्सिक्ताभिरिव पुण्ड्रेक्षु- वाटसंततिभिर्निरन्तरः, प्रतिदिशमपूर्वपर्वतकैरिव खलधानधामभिर्विभज्य- मानैः सस्यकूटैः संकटसकलसीमान्तः, समन्तादुद्घातघटीसिच्यमानैर्जीर- कजूटैर्जटिलितभूमिः, उर्वरावरीयोभिः शालेयैरलंकृतः, पाकविशारूराजमा- षनिकरकिर्मीरितैश्च स्फुटितमुद्गफलकोशीकपिशितैर्गोधूमधामभिः स्थलीपष्ठै- रधिष्ठितः, महिषपृष्ठप्रतिष्ठितगायद्गोपालपालितैश्च कीटपटललम्पटचटका- नुसृतैरवटुघटितघण्टाघटीरटितरमणीयैरटद्भिरटवीं हरवृषभपीतमामयाश- ङ्कया बहुधाविभक्तं क्षीरोदमिव क्षीरं क्षरद्भिर्बाष्पच्छेद्यतृणतृप्तैर्गोधनैर्धव- लितविपिनः, विविधमखहोमधूमान्धशतमम्युमुक्तैर्लोचनैरिव सहस्र- संख्यैः कृष्णशारैः शारीकृतोदेशः, धवलधूलिमुचां केतकीवनानां रजोभिः अतिमाधुर्यात्क्षीरोदेत्याद्युत्प्रेक्षा । निरन्तरो निर्विवरः । तदैव कल्पितत्वादपूर्वत्वम् । खलधानधामभिः खलपालैः । उद्घातोऽरघट्टः । जीरकोऽजाजी । जूटः समूहः । उर्वरा सर्वसस्याढ्या भूः । वरीयोभिरुरुतरैः । शालेयैः शालिक्षेत्रैः । युगपत्पा- कसंभवाद्भिशरारुत्वम् । किर्मीरैः शबलैः । कोशी शिम्बिका । गोधनस्य क्षतपृष्ठ- त्वात्कीटसंभवः । अवटुर्ग्रीवा । घण्टेव घटी घण्टाघण्टी । आमयोऽजीर्णम् । हरवृषभेण पीतं संतमजीर्णसंभावनया बहुधा विभक्तम् । बाप्पच्छेद्येति सौकुमार्यकथनपरम् । विपिनं गहनम् । मुक्तैः पतितैः । लोचनान्यपि कृष्णशाराणि सहस्रसंख्यानि च । वर्णन कर रहे हों । चारों ओर पौधों के खेत फैले हुए थे, जिन्हें मानों क्षीर के समुद्र को पीकर आए मेघों ने बरस कर सींचा था । सब ओर जगह-जगह पर खलिहानों में कृत्रिम पर्वत की भाँति धान की ढेरियां लगती थीं । रहट के द्वारा जीरक की फसल से हरी-भरी जमीन सींची जाती । धनखर खेतों में धान लहराते थे । जगह-जगह की कृत्रिम भूमियों में पके हुए राजमाष की रंगीनी और पककर चटके हुए मूँग और गेहूं के खेत सब ओर फैले थे । चरवाहे चारों ओर जंगलों में भैंस की पीठ पर बैठ कर गीत गा रहे थे और चरती हुई गायों की देखभाल करते थे । गायों में कुकुरमक्खियाँ लपट कर उन्हें परेशान करतीं और फुदकुदी चिड़ियाँ भी उनके पीछे पड़ जातीं । गायों की घेंट में बँधी हुई घंटियाँ और छोटे-छोटे घुंबरू बहुत मधुर आवाज करते थे । गायें चारों ओर जंगल में टहरती थीं । अजीर्ण होने की आशंका से शिवजी के बसहे बैल द्वारा पिए हुए क्षीरसमुद्र को मानों दूध के अनेक धार के रूप में उत्पन्न करती थीं । वे गड़ांसी द्वारा छँटी बास की कुट्टी खाकर अघा जाती थीं । अनेक यज्ञों के होमधूमों से अंधे होने के कारण इन्द्र के द्वारा छोड़ी हुई आँखों के रूप में हजारों मृग उस स्थान को चित्र-विचित्र करते थे । केवड़े