भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 198

तृतीय उच्छ्वासः १५३ कुर्वन्नामुग्नपृष्ठो मुखनिकटकटिः कंधरामातिरश्चीं लोलेनाहन्यमानं तुहिनकणमुचा चञ्चता केसरेण । निद्राकण्डूकषायं कषति निबिडितश्रोत्रशुक्तिस्तुरङ्ग- स्त्वङ्गत्पक्ष्मग्रलग्नप्रतनुबुसकणं कोणमक्षणः खुरेण ॥ ६ ॥ बाणस्तु तच्छ्रुत्वा समुत्सृज्य निद्रामुत्थाय प्रक्षाल्य वदनमुपास्य च भगवतीं संध्यामुदिते च भगवति सवितरि गृहीतताम्बूलस्तत्रैवातिष्ठत् । अत्रान्तरे सर्वेऽस्य ज्ञातयः समाजग्मुः, परिवार्य चासांचक्रिरे । असा- वपि पूर्वोद्घातेन विदिताभिप्रायस्तेषां पुरो हर्षचरितं कथयितुमारेभे— श्रूयताम्—अस्ति पुण्यकृतामधिवासो वासवावास इव वसुधामव- तीर्णः सततमसंकीर्णवर्णव्यवहारस्थितिः कृतयुगव्यवस्थः, स्थलकमल- बहलतया पोत्रोन्मूल्यमानमृणालैरुद्गीतमेदिनीसारगुणैरिव कृतमधुकरको- परि प्रोथः प्रतानमुत्तरोष्ठमध्यम् । 'वक्रास्ये वदनं तुण्डमाननं लपनं मुखम्' । तुहिनमवश्यायः । केसराणि ललाटतटस्थाः केशाः, अश्वकृकाटिकाालम्बनः केश- पाशो वा । कषायमापिङ्गलम् । त्वङ्गदुच्चम् । कोणं प्रान्तम् । उद्घातः कथाप्रस्तावः । अस्तीत्यादौ । श्रीकण्ठनामा जनपदोऽस्तीति संबन्धः । पुण्यकृतो देवा अपि । अधिवासो वसतिः । वासवावासः स्वर्गः । पोत्रं हलमुखम् । सारा उत्कृष्टाः । जिसके कान की सीपी भरी हुई है ऐसा घोड़ा अपनी पीठ सिकोड़, मुँह के पास कमर को ला और ग्रीवा को बिल्कुल टेढ़ी करके आँख के कोने को खुर से खुजला रहा है। अपनी चमकीली चंचल अयाल से पानी के फुहारे उड़ाता हुआ मुँह पर झार रहा है। उसकी आँख निद्रा के आवेग से लाल हो गई है। आँख की पपनियों में भूसे की खर चिपक गई है ॥ ६ ॥ श्लोकों को सुनकर बाण नींद छोड़ उठा और मुँह धो, भगवती संध्या की उपासना कर भगवान् सूर्य के उदित होने पर मुँह में पान का बीड़ा रख वही बैठा। इसी बीच उसके सब भाई-बन्धु जुट आए और घेर कर बैठ गए। बाण ने भी पहले के प्रस्ताव से उनका अभिप्राय समझ, उनके सामने हर्षचरित कहना आरम्भ किया— सुनिए—श्रीकण्ठ नाम का एक था जनपद । वह मानों पृथिवी पर उतरा हुआ पुण्य- शाली लोगों का निवास स्वर्ग था। वहाँ ब्राह्मण आदि वर्णों की मर्यादा एक में एक घुली- मिली न थी, मानों वहाँ सतयुग की व्यवस्था हो गई हो । हल से वहाँ खेत जोते जा रहे थे, स्थलकमलों के अधिक होने के कारण हल के फार से मृणाल उखाड़े जाते थे और कमलों में बैठे हुए भौंरे जब गुञ्जारने लगते तो लगता कि पृथिवी के उत्कृष्ट गुणों का