हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Page Header] १५२ हर्षचरितम्
वृद्धश्रोत्रियानुमतेन गलद्ग्रन्थदण्डकोद्गारिणि संध्यां समबधारयति बठरवि- टबटुसमाजे, समुन्मज्जति च ज्योतिषि तारकाख्ये खे, प्राप्ते प्रदोषारम्भे भवनमागत्योपविष्टः स्निग्धैर्बन्धुभिश्च सार्धं तयैव गोष्ठ्या तस्थौ । नीत- प्रथमयामश्च गणपतेर्भवने परिकल्पितं शयनीयमसेवत । इतरेषां तु सर्वेषां निमीलितदृशामप्यनुपजातनिद्राणां कमलवनानामिव सूर्योदयं प्रतिपालयतां कुतूहलेन कथमपि सा क्षपा क्षयमगच्छत् । अथ यामिन्यास्तुर्ये यामे प्रतिबुद्धः स एव बन्दी श्लोकद्वयमगायन्— 'पश्चादङ्घ्रि प्रसार्य त्रिकनतिविततं द्राघयित्वाङ्गमुच्चै- रासज्याभुग्नकण्ठो मुखमुरसि सटा धूलिधूम्रा विधूय । घासग्रासाभिलाषादनवरतचलत्प्रोथतुण्डस्तुरङ्गो मन्दं शब्दायमानो विलिखति शयनादुत्थितः क्ष्मा खुरेण ॥५॥ वेदोपाध्यायः । तदनुमतेन संध्यां स संधारयति । वदनन्यग्रत्वाद्गलतो विस्मरतः । बन्धमाने व्यग्रत्वादङ्गलन्ति । विस्मरन्तं ग्रन्थदण्डकं ऋग्गणं उद्गिरति यस्तस्मिन् । बठरा मूर्खाः । विटा भुजङ्गप्रायाः । बटवो बालाश्च। गृहश्रोत्रियैर्बालाः संध्यावन्दनाय प्रवर्त्यन्ते निर्विवेकत्वात् । तुर्यश्चतुर्थः । त्रिकं पृष्ठकटीसंधिः । द्राघयित्वा दीर्घतरीकृत्या । आभुग्नो नमितः कण्ठो यस्य तत् । मुखमुरसि । आसज्य कृत्वा । धूम्रा धूसराः । प्रतानस्यो- में मटक जाते थे, उनको आलसी वैदिक संध्यावंदन का नियम सिखाता था। धीरे-धीरे आकाश में तारे उगने लगे । शाम होने लगा तो बाण घर आ गया और वहाँ भी प्रेमी बांधवों के साथ गोष्ठी का आनन्द लेने लगा । एक पहर रात बिता कर गणपति के भवन में बिछी हुई शय्या पर सो रहा । दूसरे सब लोगों ने आँखें बंद कर लीं मगर नींद नहीं आई । जैसे कमल के वन रात भर सूर्योदय की प्रतीक्षा करते हैं उसी प्रकार वह रात कुतूहल के कारण किसी-किसी प्रकार करवट बदल-बदल कर बीती । रात के चौथे पहर में बंदी उठा और उसने दो श्लोकों का गान किया— घोड़ा सोकर उठ गया, और वह पिछाड़ के पैरों को तान, पीठ की रीढ़ गढ़ा, अपने अङ्गों को जोर से फैला, गर्दन झुका, मुँह को छाती में लगा, धूल से मटमैले अयाल को झाड़, घास के कौर लेने की इच्छा से हमेशा अपनी थुथुन को लुपलुपाता हुआ और मंद मंद घुरघुराता हुआ खुरों से जमीन कुरेद रहा है ॥ ५ ॥