भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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तृतीय उच्छ्वासः १५१

श्वो निवेदयितास्मि' इति । सर्वे च ते 'तथा' इति प्रत्यपद्यन्त । नाति- चिरादुत्थाय संध्यामुपासितुं शोणमयासीत् । अथ मधुमदपल्लवितमालवीकपोलकोमलातपे मुकुलितेऽह्नि, कम- लिनीमीलनादिव लोहिततमे तमोलिहि रवौ लम्बमाने, रविरथ तुरग- मार्गानुसारेण यममहिष इव धावति नभसि तमसि, क्रमेण च गृहता- पसकुटीरकपटलावलम्बिषु रक्तात्तपच्छेदैः सह संहृतेषु वल्कलेषु, कलि- कल्मषमुषि मुष्णति गगनमग्निहोत्रधामधूमे, सनियमे यजमानजने मौनव्रतिनि, विहारवेलाविलोले पर्यटति पत्नीजने, विकीर्यमाणहरितश्या- माकशालिपूलिकासु दुग्धासु होमकपिलासु, हूयमाने वैतानतनूनपाति, पूतविष्टरोपविष्टे कृष्णाजिनजटिले जटिनि जपति बटुजने, ब्रह्मासनाध्या- सिनि ध्यायति योगिगणे, तालध्वनिधावमानानन्तान्तेवासिनि अलस-

अथेत्यादौ । अस्मिन्नस्मिन्सति बाणस्तयैव गोष्ठ्या तस्थाविति संबन्धः । कपोल- कोमलो गण्डसदृशः । मुकुलिते प्राप्तसंकोचे । कुटीरं जरद्गृहम् । पटलं छादनम् । विहारो वह्निसंधुक्षणमग्निहोत्रार्थम् । पूलिका वरण्डः परिमाणभेदः । तनूनपाद्वह्निः । विष्टरमासनम् तालध्वनिरङ्गुलीजः शब्दः । अन्तेवासिनः शिष्याः । श्रोत्रिये-

रहे हैं । इसलिए कल निवेदन करूँगा ।' तब सबने 'ऐसा ही' कहकर स्वीकार किया । बाण थोड़ी देर में सन्ध्योपासन के लिए शोण के तीर पर चले गए । दिन ढलते ही मधुपान करने से रक्त मालव-सुन्दरियों के कपोल की भाँति आतप कोमल हो गया । कमलिनी द्वारा आँख बंद कर लेने से मानों क्रोध से लाल होकर सूर्य लटकने लगा । अन्धकार मानों सूर्य के रथ के घोड़ों का पीछा करता हुआ यमराज के भैंसे की भाँति आकाश में दौड़ने लगा । क्रम से गृहस्थ-जीवन व्यतीत करने वाले तपस्वियों की कुटियों की छान्द पर सूखने के लिए लटकाए गए वल्कल आतप के लाल टुकड़ों के साथ बटोर लिए गए । कलि के पापों को दूर करने वाला अग्निहोत्र-गृह का धुआँ आकाश में छाने लगा । याज्ञिक लोग नियम-पूर्वक मौन होकर बैठ गए । उनकी पत्नियाँ चारों ओर अग्निहोत्र के लिए आग जोरने की तैयारी में घूमने लगीं । हरे-हरे साँवा के पुआल की ओटियाँ छींट कर होमधेनुओं का दुहना आरम्भ हो गया । यज्ञ की अग्नि में हवन होने लगा । कृष्णाजिन ओढ़े, जटा बढ़ाए बटुजन पवित्र आसन पर बैठ कर जप करने लगे । योगी लोग ब्रह्मासन जमाकर ध्यान करने लगे । ताली बजते ही बहुत से शिष्य दौड़ मारने लगे । लुहेड़ा स्वभाव वाले मूर्ख शिष्य ऋचाओं के उच्चारण