भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 195

१३० हर्षचरितम् रभसमोहिता च मन्ये महतामपि मतिरपहरति प्रधिवेकम् । पश्यत्वार्य्यः- क परमाणुपरिमाणं बटुहृदयम्, क समस्तब्रह्मास्तम्भव्यापि देवस्य चरितम् ? क परिमितवर्णवृत्तयः कतिपये शब्दाः, क संख्यातिगा- स्तद्गुणाः ? सर्वज्ञस्याप्ययमविषयः, वाचस्पतेरप्यगोचरः, सरस्वत्या अप्यतिभारः, किमुतास्मद्विधस्य ? कः खलु पुरुषायुशतेनापि शक्नु- याद्विकलमस्य चरितं वर्णयितुम् ? एकदेशे तु यदि कुतूहलं वः, सज्जा वयम् । इयमधिगतकतिपयाक्षरलबलघीयसी जिह्वा कोपयोगं गमिष्यति ? भवन्तः श्रोतारः । वर्ण्यते हर्षचरितम् । किमन्यत् । अद्य तु परिणतप्रायो दिवसः । पश्चाल्लम्बमानकपिलकिरणजटाभारभास्वरो भगवान्भार्गवो राम इव समन्तपञ्चकरुधिरमहाह्रदे निमज्जति संध्यरागपटले पूषा । द्विजशिशुः । ब्रह्मस्तम्भं जगत् । पुरुषायुषेत्यादिना योग्येऽपि मयि वर्णयितरि वर्णनीयस्य भूयस्त्वम्, अल्पीयस्त्वाच्चायुषः सामास्येन वर्णनं न घटत इति प्रति- पादितम् । अत एवाह — एकदेश इति । संझा ( सज्जा ? ) वर्णनाभिमुखा इति । भवन्त इति ? न तु यादृशतादृशाः । हर्षचरितमिति । न तु यदेव किंचित् । समन्त- पञ्चकं कुरुक्षेत्रम् । तथेति एवमस्त्विति । प्रत्यपद्यन्ताङ्गीकृतवन्तः । की चाह में लोग सामर्थ्य और असामर्थ्य की बात को ध्यान में नहीं लाते । मैं समझता हूं कि दूसरे-दूसरे के गुणों में अनुराग करने वाली और अपने प्रियजन के कथामृत का पान करने के मोह में पड़ी हुई बड़े-बड़े लोगों की बुद्धि भी तत्काल विवेक को छोड़ देती है । हे आर्य, स्वयं आप ही देखें, परमाणु की भाँति मेरे जैसे बटु का हृदय कहाँ और सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त देव हर्ष का चरित कहाँ ? कुछ थोड़े से अक्षरों वाले मेरे शब्द कहाँ और देव के असंख्य गुण कहाँ ? अगर कोई सर्वज्ञ भी हो तो इसे नहीं जान सकता, और तो क्या, साक्षात् बृहस्पति भी नहीं बता सकते । सरस्वती के लिए भी यह बहुत भारी बोझ है, तो हम जैसे लोगों की क्या गणना है ? पूरे सौ वर्ष जीकर भी कौन उनके सारे चरित को सुनाने में समर्थ हो सकता है ? यदि आपका उस चरित के एकदेश में कुतूहल है तो हम सुनाने के लिए तैयार हैं । यह मेरी छोटी-सी जिह्वा, जिसने लवमात्र कुछ अक्षरों का ग्रहण किया है, किस जगह उपयोग में आएगी ? आप जैसे लोग सुनने वाले हैं । हर्ष- चरित का वर्णन करता हूँ । और क्या ? अब तो दिन ढलने लगा है । जैसे पीली जटाओं से देदीप्यमान भगवान् परशुराम ने कुरुक्षेत्र के रुधिर-सरोवर में स्नान किया था उसी प्रकार सूर्य भी अपने पीताभ किरण-समूह को लटकाते हुए संध्या की लाली में डूबते जा