हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उच्छ्वासः १४६ सकलभुवनकोशश्चाग्रजन्मनां विभक्तः, इत्येषमादयः प्रथमकृतयुगस्येव दृश्यन्ते महासमारम्भाः । अतोऽस्य सुगृहीतनाम्नः पुण्यराशेः पूर्वपुरुष- वंशानुक्रमेणादितः प्रभृति चरितमिच्छामः श्रोतुम् । सुमहान्कालो नः शुश्रूषमाणानाम् । अयस्कान्तमणय इव लोहानि नीरसनिष्ठुराणि क्षुल्ल- कानामप्याकर्षन्ति मनांसि महतां गुणाः, किमुत स्वभावसरसमृदूनी- तरेषाम् । कस्य न द्वितीयमहाभारते भवेदस्य चरिते कुतूहलम् ? आचष्टां भवान् । भवतु भार्गवोऽयं वंशः शुचिनानेन पुण्यराजर्षिचरित- श्रवणेन सुतरां शुचितरः, इत्येवमभिधाय तूष्णीमभूत् । बाणस्तु विहस्याब्रवीत्—आर्य ! न युक्त्यनुरूपमभिहितम् । अघट- मानमनोरथमिव भवतां कुतूहलमवकल्पयामि । शक्याशक्यपरिसंख्या- नशून्याः प्रायेण स्वार्थतृषः । परगुणानुरागिणी प्रियजनकथाश्रवणरस- सीमापतयः, इन्द्राद्या दिक्पालाश्च । कोशो(गञ्जं) धनसंचयः मध्यम् , ग्रन्थभेदश्च । अग्रजन्मानो द्विजाः, आदिनृपाः, श्रमणाश्च । एवमादय इति । न ह्येतावन्त एव । प्रथमकृतयुगस्येवेति । पर्वतपक्षशातनादयो वृत्तान्ता अभवन् । मणय इवेति । मणिशब्देनोपमेयानां गुणानां रत्नत्वमुक्तम् । लोहान्यपि नीरसनिष्ठुराणि । क्षुल्लकाः खलाः । बाला इत्यन्ये । आचष्टामाख्यातु । भार्गव इति भृगुगोत्रत्त्वम् । अवकल्पयामि निश्चिनोमि । शक्तमिदमित्येवंरूपेण परिसंख्यानेन गणनया स्वार्थतृषो गृध्नवः, शून्याः । शक्याशक्यविवेकं गृध्नवो न जानन्तीत्यर्थः । बहु- को उन्होंने ब्राह्मणों को अर्पित कर दिया ( और लोकपाल भगवान् बुद्ध ने भी कोश नामक ग्रन्थ को विभक्त करके श्रमणों को अर्पित किया ) । इत्यादि सत्युग के समान उनके अनेक महान् कार्य दिखाई पड़ते हैं । इसलिए प्रातःस्मरणीय पुण्यों के राशि देव हर्ष का चरित पूर्वपुरुषों की परम्परा के साथ हम सुनना चाहते हैं । बहुत दिनों से हम लोगों की यह इच्छा बनी है। महापुरुषों के गुण क्षुद्र लोगों के नीरस और निष्ठुर मन को इस प्रकार खींच लेते हैं जैसे चुम्बक लोहे को, और जो स्वभाव से ही सरस और कोमल स्वभाव के लोग हैं उनकी तो बात ही क्या ? दूसरे महाभारत के समान उनके चरित को सुनने के लिए किस के मन में कुतूहल न होगा ? अतः आप कहें । यह भार्गववंश उस पुण्यवान् राजर्षि का पवित्र चरित सुन कर और भी पवित्र बन जाय ।' यह कह कर वह चुप हो गया । बाण ने हँस कर कहा—'आर्य आपने युक्तिसंगत बात नहीं कही । मेरा निश्चय है कि इस कुतूहल में आपका मनोरथ सिद्ध न होगा । प्रायः ऐसा देखा जाता है कि स्वार्थ