हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 193, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ें[Page Header] १४८ हर्षचरितम्
[Main Text] सिन्धुराजं प्रमथ्य लक्ष्मीरात्मीकृता। अत्र बलिना मोचितभूभृद्वेष्टनो मुक्तो महानागः। अत्र देवेनाभिषिक्तः कुमारः। अत्र स्वामिनैकप्रहार- प्रपतितारातिना प्रख्यापिता शक्तिः। अत्र नरसिंहेन स्वहस्तवविशसिता- रातिना प्रकटीकृतो विक्रमः। अत्र परमेश्वरेण तुषारशैलभुवो दुर्गाया गृहीतः करः। अत्र लोकनाथेन दिशां मुखेषु परिकल्पिता लोकपालाः,
[Sanskrit Commentary] क्षीरोदधिश्च। लक्ष्मीरच्छत्रचामरादिरूपा, देवताकृतिश्च। बलिना बलवता, असु- रेश्वरेण च भूभृद्राजा श्रीकुमाराख्यः। श्रीकुमारो नाम राजा किल दर्पशातेनोपजात- मदेन हस्तिना वेष्टितः। ततः श्रीहर्षेणाकृष्य खड्गं तस्मान्मोचितोऽसौ दन्ती च रोषाद्वने परित्यक्त इति वार्ता। भूभृच्च पर्वतो मन्दराख्यः। महानागो दर्प- शातः, वासुकिश्च। मोचितभूभृद्वेष्टनोऽमृतमन्थनार्थे। मन्थनार्थे कुमारः कुमार- गुप्ताख्यः, कुमारो वा यो दर्पशातान्मोचितः। कुमारो गुहः, पुत्रश्च कुमारः। स्वामी प्रभुः, कुमारश्च। अरातयः शत्रवः, तारकश्चासुराधिपतिः। शक्तिः सामर्थ्यम्, आयुधभेदश्च। नरसिंहः उत्तमो नरः, नृसिंहरूपो हरिश्च। सहस्तेनेति। न तु साधनबलेन। अन्यत्र तु चक्रादिनिजायुधेन। परमेश्वरेण सार्वभौमेन। न तु मण्डलमात्रस्य भोक्त्रा हरेण। दुर्गाया दुर्गमायाः, गौर्याश्च। करो दण्डः, पाणिश्च। लोकनाथो राजा, हरिः, बुद्धश्च। दिशां मुखेषु सीमासु। लोकनाथाः (लोकपालाः)
[Hindi Translation] (और पुरुषोत्तम कृष्ण ने सिन्धुराज अर्थात् क्षीरसागर को मथकर लक्ष्मी को अपनाया)। पराक्रमी हर्ष ने अपने महाग़ज दर्पशात को श्रीकुमार नामक राजा को सूंड में लेकर दबोचते हुए देख कर छुड़ाया और उसे जंगल में छुड़वा दिया (और दैत्यराज बलि ने महानाग वासुकि को मन्दराचल से लिपट कर समुद्रमंथन के बाद छोड़ दिया)। देव हर्ष ने कुमार का अभिषेक किया (और देवराज इन्द्र ने कुमार कार्तिकेय को सेनापति के पद पर अभिषिक्त किया)। स्वामी हर्ष ने एक ही प्रहार से शत्रुओं को मार गिरा कर अपनी शक्ति का परिचय दिया (और स्वामी कार्तिकेय ने एक ही प्रहार से तारकासुर का वध करके अपनी शक्ति (अस्त्रविशेष) प्रसिद्ध कर दिया)। नरों में केसरी हर्ष ने अपने भुजबल से शत्रु को मार कर अपना पराक्रम दिखाया (और भगवान् नृसिंह ने भी शत्रु हिरण्यकशिपु के वक्ष को अपने हाथों से फाड़कर अपना पराक्रम दिखाया)। परमेश्वर हर्ष ने हिमालय के दुर्गम प्रदेश के राजाओं से भी कर लिया (और परमेश्वर शिव ने हिमालय की पुत्री पार्वती का करग्रहण किया)। राजा हर्ष ने प्रत्येक दिशा में प्रजापालकों को देखभाल के लिए नियुक्त किया (और प्रजापति ब्रह्मा ने भी इन्द्र आदि लोकपालों को प्रत्येक दिशा की रक्षा के लिए नियुक्त किया)। समस्त धन के भाण्डागारों