हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
१५४ हर्षचरितम् लाहलैलैरालक्ष्यमानक्षेत्रः, क्षीरोदपयःपायिपयोद्सिक्ताभिरिव पुण्ड्रेक्षु- वाटसंततिभिर्निरन्तरः, प्रतिदिशमपूर्वपर्वतकैरिव खलधानधामभिर्विभज्य- मानैः सस्यकूटैः संकटसकलसीमान्तः, समन्तादुद्घातघटीसिच्यमानैर्जीर- कजूटैर्जटिलितभूमिः, उर्वरावरीयोभिः शालेयैरलंकृतः, पाकविशारूराजमा- षनिकरकिर्मीरितैश्च स्फुटितमुद्गफलकोशीकपिशितैर्गोधूमधामभिः स्थलीपष्ठै- रधिष्ठितः, महिषपृष्ठप्रतिष्ठितगायद्गोपालपालितैश्च कीटपटललम्पटचटका- नुसृतैरवटुघटितघण्टाघटीरटितरमणीयैरटद्भिरटवीं हरवृषभपीतमामयाश- ङ्कया बहुधाविभक्तं क्षीरोदमिव क्षीरं क्षरद्भिर्बाष्पच्छेद्यतृणतृप्तैर्गोधनैर्धव- लितविपिनः, विविधमखहोमधूमान्धशतमम्युमुक्तैर्लोचनैरिव सहस्र- संख्यैः कृष्णशारैः शारीकृतोदेशः, धवलधूलिमुचां केतकीवनानां रजोभिः अतिमाधुर्यात्क्षीरोदेत्याद्युत्प्रेक्षा । निरन्तरो निर्विवरः । तदैव कल्पितत्वादपूर्वत्वम् । खलधानधामभिः खलपालैः । उद्घातोऽरघट्टः । जीरकोऽजाजी । जूटः समूहः । उर्वरा सर्वसस्याढ्या भूः । वरीयोभिरुरुतरैः । शालेयैः शालिक्षेत्रैः । युगपत्पा- कसंभवाद्भिशरारुत्वम् । किर्मीरैः शबलैः । कोशी शिम्बिका । गोधनस्य क्षतपृष्ठ- त्वात्कीटसंभवः । अवटुर्ग्रीवा । घण्टेव घटी घण्टाघण्टी । आमयोऽजीर्णम् । हरवृषभेण पीतं संतमजीर्णसंभावनया बहुधा विभक्तम् । बाप्पच्छेद्येति सौकुमार्यकथनपरम् । विपिनं गहनम् । मुक्तैः पतितैः । लोचनान्यपि कृष्णशाराणि सहस्रसंख्यानि च । वर्णन कर रहे हों । चारों ओर पौधों के खेत फैले हुए थे, जिन्हें मानों क्षीर के समुद्र को पीकर आए मेघों ने बरस कर सींचा था । सब ओर जगह-जगह पर खलिहानों में कृत्रिम पर्वत की भाँति धान की ढेरियां लगती थीं । रहट के द्वारा जीरक की फसल से हरी-भरी जमीन सींची जाती । धनखर खेतों में धान लहराते थे । जगह-जगह की कृत्रिम भूमियों में पके हुए राजमाष की रंगीनी और पककर चटके हुए मूँग और गेहूं के खेत सब ओर फैले थे । चरवाहे चारों ओर जंगलों में भैंस की पीठ पर बैठ कर गीत गा रहे थे और चरती हुई गायों की देखभाल करते थे । गायों में कुकुरमक्खियाँ लपट कर उन्हें परेशान करतीं और फुदकुदी चिड़ियाँ भी उनके पीछे पड़ जातीं । गायों की घेंट में बँधी हुई घंटियाँ और छोटे-छोटे घुंबरू बहुत मधुर आवाज करते थे । गायें चारों ओर जंगल में टहरती थीं । अजीर्ण होने की आशंका से शिवजी के बसहे बैल द्वारा पिए हुए क्षीरसमुद्र को मानों दूध के अनेक धार के रूप में उत्पन्न करती थीं । वे गड़ांसी द्वारा छँटी बास की कुट्टी खाकर अघा जाती थीं । अनेक यज्ञों के होमधूमों से अंधे होने के कारण इन्द्र के द्वारा छोड़ी हुई आँखों के रूप में हजारों मृग उस स्थान को चित्र-विचित्र करते थे । केवड़े
तृतीय उच्छ्वासः १५५ पाण्डुरीकृतैः प्रथमोद्धूलनभस्मधूसरैः शिवपुरस्येव प्रवेशैः प्रदेशैरुपशो- भितः, शाककन्दलश्यामलितमामोपकण्ठकाश्यपीपृष्ठः, पदे पदे करभ- पालीभिः पीलुपल्लवप्रस्फोटितैः करपुटपीडितकोमलमातुलुङ्गीदल- रसोपलिप्तैः स्वेच्छाविचितकुङ्कुमकेसरकृतपुष्पप्रकरैः प्रत्यग्रफलरसपान- सुखसुप्तपथिकैर्वनदेवतादीयमानामृतरसप्रपागृहैरिव द्राक्षालतामण्डपैः स्फुरत्फलानां च बीजलग्रशुकचञ्चूरागाणामिव समारूढकपिकुलकपोलसं- दिह्यमानकुसुमानां दाडिमीनां वनैर्विलोभनीयोपनिर्गमः, वनपालपीय- माननारिकेलरसासवैश्च पथिकलोकलुप्यमानपिण्डखर्जूरैर्गोलाङ्गूललिह्य- मानमधुरामोटपिण्डीरसैश्चकोरचञ्चुजर्जरितारुकैरुपवनैरभिरामः, तुङ्गाजु॑- नपालीपरिवृतैश्च गोकुलावतारकलुषितकूलकीलालैरध्वगशतशरण्यैररण्यव- रुणधराबन्धैरवन्ध्यवनरन्ध्रः, करभीयकुमारकपाल्यमानैरुष्ट्रकैरौरभ्रकैश्च कृष्णशारा मृगभेदाश्च । प्रमथा गणाः । प्रवेशैर्मार्गेः । काश्यपी भूः । करभपा- लीभिः । इत्थंभूतलक्षणे तृतीया । करभो बालोष्ट्रः । पीलुवृक्षभेदः । प्रस्फोटितै- र्नीराजनीकृतैः । प्रपा पानीयशालिका । उपनिर्गमनानि निर्गमनमार्गाः । उद्या- नानीति केचित् । अर्जुनाः ककुभवृक्षाः । कीलालं तोयम् । धराबन्धास्तटाकानि । करभेभ्यो हिताः करभीयाः । औष्ट्रकैरूष्ट्रसमूहैः । कृतसंबाध आवृत्तः । किशोरका के वनों से उड़-उड़ कर उजले पराग उस प्रकार भर कर शोभा उत्पन्न करते थे जैसे प्रमथ गणों के भस्म रमाने से भगवान् शिव के नगर-मार्ग शोभित हो जाते हैं । गाँव के गायड़े में साग के साँवले अँखुर लग रहे थे। निर्गम के मार्गों में ऊँट के बच्चे आखरोट के पत्ते तोड़कर चट कर जाते । हाथों से पचकाकर चुभाए हुए मातुलुंगी के कोमल फलों के रस से लिपे, स्वेच्छा से तोड़े गए पुष्पों के पराग से भरे लतामण्डप थे जहाँ ताजे फलों को चूस कर पथिक लोग सुख-पूर्वक सोते, मानों वनदेवताओं ने अमृतरस के पनसाले के रूप में उन्हें अर्पित किया हो । और भी, वहाँ जिनके लाल लाल बीजों में मानों सुग्गे के चोंच की लाली लग गई हो ऐसे अनार के फल लगे थे । उन पर बैठे हुए वानरों के लाल- लाल गालों को देखकर फूलों का भ्रम होने लगता था । वहाँ के उपवनों में माली नारियल के फलों का पानी पीते थे । राह चलते लोग पिंड खजूर लपक लेते थे । लंगूर मधुर गंध से भरी ताड़ी को चाट जाते । चकोर आरुक नामक फलों को कुतर डालते । लम्बे-लम्बे कुकुभ वृक्षों की श्रेणियों से वहाँ के जलाशय घिरे हुए थे । उनमें पशुओं के उतर कर जल पीने से किनारे का पानी मटमैला रहता था । सैकड़ों राही वहाँ आकर टिकते थे । ऊँटों के पालने वाले लोग ऊँटों के साथ-साथ मेढ़ों को भी चारों ओर जुटाते थे । कहीं कहीं
१५६ हर्षचरितम् कृतसंबाधः, दिशि दिशि रविरथतुरगविलोभनायैव विलोठनमृदितकुङ्कु- मस्थलीरससमालब्धानामुत्प्रोथपुटैरन्मुखैरुदरशायिकिशोरकजबजननाय प्रभञ्जनमिव चापिबन्तीनां वातहरिणीनामिव स्वच्छन्दचारिणीनां वड- वानां वृन्दैर्विचरद्भिराचितः, अनवरतक्रतुधूम्रान्धकारप्रवृत्तैर्हंसयूथैरिव गुणैर्धवलितभुवनः, संगीतगतमुरजरवमत्तैर्मयूरैरिव विभवैर्मुखरितजीवलो- कः, शशिकरावदातवृत्तैर्मुक्ताफलैरिव गुणिभिः प्रसाधितः, पथिकशतवि- लुप्यमानस्फीतफलैर्महातरुभिरिव सर्वातिथिभिरभिगमनीयः, मृगमदपरि- मलवाहिमृगरोमाच्छादितैर्हिमवत्पादैरिव महत्तरैः स्थिरीकृतः, प्रोद्दण्ड- सहस्रपत्रोपविष्टद्विजोत्तमैर्नारायणनाभिमण्डलैरिव तोयाशयैर्मण्डितः, वत्सा । प्रभञ्जनं वातम् । वडवा अश्वाः । धूमान्धकारप्रवृत्तैर्बाणैर्वर्धितभुवन इति विरोधच्छाया । हंसानामप्यन्धकारप्रवृत्तत्वं तमसि प्रचारात् । प्रवृत्तैराविर्भूतैः । हंसपक्षे—पलायितैः । वृत्तं चरितम्, परिवर्तुलं च गुणिभिः शौर्यादिगुणयुक्तैः, ससूत्रैश्च । फलमैश्वर्यमपि । अभिगमनीयः सेव्यः । मृगमदः कस्तूरिका । मृगरोम- शब्देन तत्कृतवस्त्रमुच्यते । यस्य राङ्कवमिति संज्ञा । यथा च—'राङ्कवं मृग- रोमजम्' । अन्यत्र,-मृगाणां रोमाणि । पादाः प्रत्यन्तपर्वताः । महत्तरैर्वृद्धैः, विपुलैश्च । सहस्रपत्राणि पद्मानि । द्विजोत्तमाः पक्षिश्रेष्ठाः, ब्राह्मणाश्च द्विजोत्तमाः । दिशाओं में घोड़ियाँ मानों सूर्य के रथ के घोड़ों को लुभाने के लिए चरती थीं । कुंकुम की भूमि में मुँहलेट करने से कुंकुम का रस उनके शरीर में लग जाता था । मुँह उठा कर थुथुन को मरोड़ जब वे हवा पीतीं तो लगता कि अपने पेट के बच्चे को हवा की गति सिखाने का प्रयत्न करती हैं । वे वातहरिणियों के समान स्वच्छन्द विचरण करती थीं । निरन्तर यज्ञ-धूम के अन्धकार द्वारा फैलते हुए गुण हंसयूथ की भाँति लगते थे । वह जनपद संगीत में मृदङ्ग की आवाज पर मत्त होकर नाचते हुए मयूरों के समान अपने विभव से सारे जीवलोक को मुखरित कर रहा था । चन्द्रमा की किरणों के समान अवदात चरित वाले मुक्ता-रूप गुणिजनों से वह सुशोभित था । सैकड़ों राही जैसे किसी महान् वृक्ष के फलों को लपक-लपक कर लेने लगते हैं उसी प्रकार सब अतिथि वहाँ आकर तृप्त होते थे । कस्तूरी की सुगन्ध में बसे हुए मृगरोम द्वारा निर्मित वस्त्र को पहनने वाले, हिमालय के समीप के पर्वतों के समान वहाँ महत्त्वशाली लोग रहते थे । विष्णु के नाभि-मण्डल के समान वहाँ अनेक जलाशय थे, जिनमें खिले हुए ऊँचे कमलों पर उत्तम पक्षी १ सुशोभित होते थे । दूध के महने से उठा हुआ महाघोष वहाँ की पृथिवी को धोता १. विष्णु की नाभि के पक्ष में द्विजोत्तम अर्थात् ब्रह्माजी ।
तृतीय उच्छ्वासः १५७ मथितपयःप्रवाहप्रक्षालितक्षितिभिः क्षीरोदमथनारम्भैरिव महाघोषैः पूरिताशः श्रीकण्ठो नाम जनपदः । यत्र त्रेताग्निधूमाश्रुपातजलक्षालिता इवाक्षीयन्त कुदृष्टयः । पच्यमान- चयनेष्टकादहनदग्धानीव नादृश्यन्त दुरितानि । छिद्यमानयूपदारुपरशु- पाटित इव व्यदीर्यताधर्मः । मखशिखिधूमजलधरधाराधौत इव ननाश वर्णसंकरः । दीयमानानेकगोसहस्रशृङ्गखण्ड्यमान इवापलायत कलिः । सुरालयशिलाघट्टनटङ्कनिकरनिकृत्ता इव व्यदीर्यन्त विपदः । महादान- विधानकलकलाभिद्रुता इव प्राद्रवन्नुपद्रवाः । दीप्यमानसत्रमहानससहस्रा- नलसंतापिता इव व्यलीयन्त व्याधयः । वृषविवाहप्रहतपुण्यपटहपटुरव- मथितं तक्रम्, विलोडितं च । पयः क्षीरम् । उभयत्रापि मथनमन्या क्षीरोदस्य । घोषो गोष्ठः, शब्दश्च । आशा आशंका, दिशश्च । 'दक्षिणाग्निर्गार्हपत्याहवनीयौ त्रयोऽग्नयः । अग्नित्रयमिदं त्रेता' इत्यमरसिंहः । अनेकार्थवर्गेऽपि—'त्रेताग्नित्रितये युगे' । त्रेताग्निरूपोऽग्निरित्यग्नित्रिकर्षार्थं त्रेतापदम् । अन्यथा तादृशस्याग्नेर्ग्रहणं प्रसज्येत । कुत्सितानि लोकायतादीनां वेदविरुद्धानि दर्शनादीनि, कुत्सिताश्च दृष्टयः कुदृष्टयः । यत्र त्रेताग्नयो हूयन्ते तत्र क्षालिता आविर्भावाद्वृष्टिर्निर्मला भवति । चयनं चित्या विशिष्टामिष्टकास्थानम् । घनधाराधौतो ह्यवश्यं संकीर्णवर्णो नीलादिर्नश्यति । वर्णाश्च विप्राद्याः । टङ्कः पाषाणदारणः । सत्रं सदादानम् । महानसं पाकस्थानम् । वृषविवाहो नीलवृषोत्सर्गः । यत्र चतसृभि- हुआ दिशाओं में भरने लगता था, तब ऐसा लगता कि क्षीर-सागर के मंथन का आरम्भ हो गया हो । वहां त्रिविध¹ अग्नियों से उत्पन्न धुएँ के लगने के कारण निकले हुए अश्रुजल से धुल कर मानों असत् दृष्टियां (विचार) समाप्त हो गई थीं। चयन-यज्ञ के ईंटे की अग्नियों से मानों जल कर पाप दिखाई नहीं देने लगे । यूप की छिली हुई लकड़ी में बांध कर फरसे से काटे गए पशु की भांति मानो अधर्म विदीर्ण हो गया । यज्ञ की अग्नि से उठे हुए मेघ की भाँति धुएँ की जलधार से धुल कर मानों वर्णों (जातियों) की विषमता मिट गई । दान में दी जाती हुई हजारों की संख्या में गायों के सींगों से मानों टुकड़े-टुकड़े होकर कलि भाग गया । विपत्तियां मानों देवमन्दिर के पत्थरों को छांटने वाली टांकियों से खण्डित होकर चूर्ण हो गईं। उपद्रव मानों महादानों के समय में होने वाले कोलाहल से ऊब कर भाग गए । व्याधियाँ मानों सत्रों के रसोइयाघर १. त्रिविध अग्नियों—दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य और आहवनीय । इन्हें त्रेता कहते हैं ।
१५८ | हर्षचरितम् त्रासिता इव नोपासर्पन्नपमृत्यवः संततब्रह्मघोषबधिरीकृता इवापजग्मु- रीतयः । धर्माधिकारपरिभूतमिव न प्राभवद्द्दैवम् । तत्र चैवंविधे नानारामाभिरामकुसुमगन्धपरिमलसुभगो यौवनारम्भ इव भुवनस्य, कुङ्कुममलनपिञ्जरितबहुमहिषीसहस्रशोभितोऽन्तःपुरनिवेश इव धर्मस्य, मरुदुद्धूयमानचमरीबालव्यजनशतधवलितप्रान्त एकदेश इव सुरराज्यस्य, ज्वलन्मखशिखिसहस्रदीप्यमानदशदिगन्तः शिबिरसंनि- वेश इव कृतयुगस्य; पद्मासनस्थितब्रह्मर्षिध्यानाधीयमानसकलाकुशलप्र- शमः प्रथमोऽवतार इव ब्रह्मलोकस्य, कलकलमुखरमहावाहिनीशतसंकुलो गौर्भिः सह दान्तोऽरण्ये स्वैरविहाराय परित्यज्यते । ब्रह्मघोषो वेदध्वनिः । 'अति- वृष्टिरनावृष्टिर्मूषकाः शलभाः शुकाः । अत्यासन्नाश्च राजानः षडेता ईतयः स्मृताः ॥' इति । तत्र चेत्यादौ । स्थाण्वीश्वराख्यो जनपदविशेष इति संबन्धः । आरामा उप- वनानि, रामाश्च भार्याः । गन्धस्य परिमलस्याभोगोऽनुभवः, संस्कारः । मलनं निवर्तनम्, समालम्भनं च । महिषी मुख्या जायापि । मरुतो वाताः, देवाश्च । शिबिरसंनिवेशः कटकबन्धः । कृतं प्रतिसमाहितं युगं द्वयं स्वपक्षपरपक्षरूपं येन स राजोच्यते; कृतयुगं वाच्यो युगभेदः । पद्मासनमासनभेदः, पद्ममेवासनं च । ब्रह्मर्षय उत्तमद्विजाः । ब्रह्मा चासावृषिश्चेति । यद्वा, -पद्मासनस्थितो ब्रह्मा च ऋषयश्चेति द्वन्द्वः । वाहिन्यो नद्यः, सेना च । विपत्क्षो बलम्, मेरुसमीपवासिनो जनाश्चोत्तरकुरवः । ईश्वरमार्गणो राजदण्डसाधनयाच्ञा, हरशरश्रेष्ठेश्वरमार्गणः । में जलती हुई अग्नियों के ताप से संतप्त होकर विलीन हो गईं । वृषोत्सर्ग के अवसर पर बजाए गए नगाड़ों की ध्वनि से डर कर मानों अपमृत्यु पास में नहीं फटकती थी । ईति बाधाएं मानों निरन्तर वेदध्वनि के होने से बहरी होकर चली गईं । दुर्भाग्य मानों धर्म के अधिकार से परिभूत होकर उत्पन्न ही नहीं हुआ । इस प्रकार के उस जनपद में स्थाण्वीश्वर नाम की राजधानी थी । अनेक उपवनों में सुन्दर फूलों की फैलती हुई गन्ध से ऐसा लगता था मानों संसार के यौवन का आरम्भ होने लगा हो । कुंकुम की उबटन से हजारों सुन्दरियों अपने शरीर की श्रीवृद्धि करती थीं, मानों वह धर्म का अन्तःपुर हो । वायु से कम्पित चमरी गाय के बालों से उसके समीप का भू-भाग सफेद था, मानो वह स्वर्ग का एकदेश हो । जलती हुई हजारों अग्नियों से समस्त दिशाएं प्रकाशित थीं मानो वह सतयुग का सेनानिवेश ( सेना के रहने की छावनी ) हो । पद्मासन लगाकर बैठे हुए ब्रह्मर्षि सारे अकुशलों का शमन करते थे, मानो वह ब्रह्मलोक का प्रथम अवतार हो । बड़ी-बड़ी सैकड़ों नदियां
तृतीय उच्छ्वासः १५६ विपक्ष इवोत्तरकुरुणाम् , ईश्वरमार्गणसंतापानभिज्ञसकलजनो विजिगी- षुरिव त्रिपुरस्य, सुधारससिक्तधवलगृहपङ्क्तिपाण्डुरः प्रतिनिधिरिव चन्द्र- लोकस्य, मधुमदमत्तकाशिनीभूषणरवभरितभुवनो नामाभिहार इव कुबेर- नगरस्य, स्थाण्वीश्वराख्यो जनपदविशेषः । यस्तपोवनमिति मुनिभिः, कामायतनमिति वेश्याभिः, संगीतशालेति लासकैः, यमनगरमिति शत्रुभिः, चिन्तामणिभूमिरित्यर्थिभिः, वीरक्षेत्र- मिति शस्त्रोपजीविभिः, गुरुकुलमिति विद्यार्थिभिः, गन्धर्वनगरमिति गायनैः, विश्वकर्ममन्दिरमिति विज्ञानिभिः, लाभभूमिरिति वैदेहकैः, द्यूतस्थानमिति बन्दिभिः, साधुसमागम इति सद्भिः, वज्रपञ्जरमिति शरणागतैः, विटगोष्ठीति विदग्धैः, सुकृतपरिणाम इति पथिकैः, असुर- संतापानभिज्ञेति । ईश्वरशरेण हि सस्त्रीकं त्रिपुरं दग्धम् । योधजनास्ते हि युद्धे देवैर्हता इत्याहुः । जेताऽत्र विजिगीषुः । 'सुधा मकोलामृतयोः'। मत्तकाशिनी मुख्या स्त्री, यक्षिणी च । नामाभिहारः पर्यायान्तरम् । लासकैर्नटैः । वैदेहकैर्वणिग्भिः । द्यूतस्थानमिति साधुभ्यो भागो दीयते तत्र । (महावाहिनी या सेनाएं) अपनी कलकल से उसे भर देती थीं, मानो उत्तर कुरु ही वहां आ गए हों। राजा के छल-पूर्वक कर लेने की बात तो यहां के लोग जानते ही नहीं थे, मानो वह त्रिपुर के जीतने का इच्छुक है । सुधा १ के रस से पुते हुए उजले-उजले वहां भवन थे, मानों वह चन्द्रलोक का प्रतिनिधि हो । मधुपान से मतवाली कामिनियों के गहनों की आवाज सारे भुवन में व्याप्त हो जाती थी मानो वह कुबेर की नगरी अलका का ही बदला हुआ रूप हो । मुनि लोग उसे तपोवन कहते, वेश्याएं उसे कामायतन (कामोपभोग का स्थान) समझतीं, लासक अर्थात् नर्तक लोग समझते कि यह संगीतशाला है, शत्रु समझते कि यमनगर है, याचक समझते कि चिन्तामणि की भूमि है, शस्त्रों की जीविकावाले लोग उसे वीरक्षेत्र कहते, विद्यार्थी उसे गुरुकुल कहते, गाने वाले उसे गन्धर्वनगर समझते, वैज्ञानिक उसे विश्वकर्मा का मन्दिर समझते, वणिक् लोग कहते कि आमदनी की जगह है, बन्दी लोगों का निर्णय था कि जुआ खेलने योग्य स्थान है, सज्जन लोग उसे साधु- समागम कहते, शरणार्थी लोग उसे वज्रनिर्मित पिंजड़ा समझते, चतुर लोग विटगोष्ठी की कल्पना करते, पथिक लोग उसे अपने पुण्यों का परिणाम-स्वरूप मानते, वातिक लोग साधना के लिए उसे असुर-विवर समझते, भिक्षु लोग उसे बौद्धविहार मानते, १. चूना, चन्द्रपक्ष में अमृत ।
१६० हर्षचरितम्
विवरमिति वातिकैः शाक्याश्रम इति शमिभिः, अप्सरःपुरमिति कामिभिः, महोत्सवसमाज इति चारणैः, वसुधारेति च विप्रैरगृह्यत । यत्र च मातङ्गगामिन्यः शीलवत्यश्च, गौर्यो विभवरताश्च, श्यामाः पद्मरागिण्यश्च, धवलद्विजशुचिवदना मदिरामोदिश्वसनाश्च, चन्द्रकान्त- वपुषः शिरीषकोमलाङ्ग्यश्च, अभुजङ्गगम्याः कञ्चुकिन्यश्च, पृथुकलत्रश्रियो
बन्दिभ्योऽभिवाञ्छितसंपत्तेः सुकृतपरिणामता । वातिकैर्विवरव्यसनिभिराचार्यैः । शाक्यो बौद्धः । चारणैः कुशीलवैः । वसुधारा धनप्रवाहः । मातङ्गेत्यादयो विरोधाः । मातङ्गो हस्ती, चण्डालश्च । याः प्रमदाश्चण्डालानपि गच्छन्ति ताः कथं शीलवत्य इति विरोधः सर्वत्र ज्ञेयः । गौर्यो गौराङ्ग्यः । विभव ऐश्वर्ये रक्ताः । यन्न विगता भवतस्तन्न कथं गौरा रतेति । विगतं भवे रतं यस्या वा । श्यामाः श्यामलाङ्ग्यः । पद्मरागिण्यो लोहितमणिभूषणाः । श्यामा रात्रयः कथं पद्मरागिण्यः । रात्रौ पद्मानां संकोचात् । द्विजैर्दन्तैः । शुचिवदना मदिरावन्मदिरयैव वा । आमोदी श्वसनो मुखमारुतो यासां, धवलद्विजवच्छुद्धब्राह्मणवच्छुचि वदनं ताः कथं मदिरामोदिश्वसनाः । चन्द्रवत्कान्तं वपुर्यासाम् । शिरीषपुष्पवत्सुकुमाराङ्ग्य- श्चन्द्रकान्तस्येव वपुर्यासां ताः, कथं शिरीषकोमलाङ्ग्यः । भुजङ्गा विटाः, कञ्चुकं स्त्रीणां वासः, वारबाणाख्यश्च । याश्च कञ्चुकिन्यः सर्पिण्यस्ताः कथं भुजङ्गैर्न गम्याः ।
कामी लोग उसे अप्सराओं का नगर कहते, चारणों के अनुसार वह महोत्सवों का समाज था और उसे धन का प्रवाह ही समझते । वहां१ की स्त्रियां मातङ्गगामिनी (चाण्डाल का गमन करने वाली नहीं बल्कि) अर्थात् हाथी के समान चलने वाली और शीलवती थीं। वे गौरी (पार्वती) अर्थात् गौर वर्ण वाली थीं और (पार्वती होकर भी भव अर्थात् शिव में अनुरक्त न थीं) विभव अर्थात् ऐश्वर्य में अनुराग करती थीं। श्यामा (रात्रियां) अर्थात् सांवली थीं और पद्मरागिणी (कमलों में अनुराग करने वाली, रातें कमलों में अनुराग नहीं करतीं) अर्थात् लाल मणियों के आभूषण पहनती थीं। उजले दाँतों से उनका मुख पवित्र था और मदिरा की गंध वाली सांस लेती थीं। चन्द्रमा के समान सुन्दर देहवाली थीं (या चन्द्रकान्त के समान कठोर थीं फिर भी) शिरीष के फूल के समान उनके अंग कोमल थे। भुजङ्ग अर्थात् गुंडे उन्हें प्राप्त नहीं कर सकते थे और वे कञ्चुक धारण करती थीं (जो कंचुकिनी अर्थात् सर्पिणी हैं वे क्यों नहीं भुजङ्ग अर्थात् सर्पों द्वारा गम्य हैं?), पृथु अर्थात् मोटे जघनों से सुशोभित थीं और उनका मध्य अर्थात् कटिभाग पतला था
१. यहां कोष्ठकों में विरोध के रूप में आभासित होने वाले अर्थ दिए गए हैं।
तृतीय उच्छ्वासः १६१ दरिद्रमध्यकलिताश्च, लावण्यवत्यो मधुरभाषिण्यश्च, अप्रमत्ताः प्रसन्नोज्ज्व- लमुखरागाश्च, अकौतुकाः प्रौढाश्च प्रमदाः । यत्र च प्रमदानां चक्षुरेव सहजं मुण्डमालामण्डनं भारः कुवलयदल- दामानि, अलकप्रतिबिम्बान्येव कपोलतलगतान्यक्लिष्टाः श्रवणावतंसाः पुनरुक्तानि तमालकिसलयानि, प्रियकथा एव सुभगाः कर्णांलंकारा आड- म्बरः कुण्डलादिः, कपोला एव सततमालोककारका विभवो १निशासु मणिप्रदीपाः सुरभिनिःश्वासाकृष्टं मधुकरकुलमेव रमणीयं मुखावरणं कलत्रं जघनम् । दरिद्रं क्षामं मध्यमुदरं यासाम् । कलत्रस्य परिवारस्य पृथ्वीः श्रीस्ताः कथं दरिद्राणां निर्धनानां मध्ये कलिताः संख्याता भवन्ति । लावण्यं सौन्दर्यम् ; मधुरं हृद्यम् । लावण्यरसवतीनां मधुरभाषितं विभाव्यते । अप्रमत्ताः प्रमादशून्याः । प्रसन्नो मनोहरः । उज्ज्वलो मनोहारी । प्रसन्ना च सुरा तयोज्ज्वलो मुखरागो यासां ताः, कथमप्रमत्ता अक्षीबाः । अकौतुका अकरकङ्कणाः । विवाहि- तानां हि करकङ्कणोऽवबध्यते । 'रुद्राक्षदर्पसिद्धार्थशिखिपक्षोरगत्वचः । कङ्कणौषध- यश्चेति कौतुकाख्याः प्रकीर्तिताः ॥' मुण्डमालारूपं मण्डनं मुण्डमालामण्डनम् । सहजमकृत्रिमम् । अनेककुवलय- (जो राजा पृथु के समान हो वे दरिद्रों के मध्य में कैसे गिना जायगा ? ) । वे लावण्य वाली और मधुरभाषिणी थीं (जो लावण्यवती अर्थात् नमकीन हैं वे मधुर कैसे हो सकती हैं ?) । वे प्रमादशून्य थीं और उनका वर्ण प्रसन्न एवं उज्ज्वल था (जो प्रमत्त नहीं वे प्रसन्ना अर्थात् मदिरा के कारण शृङ्गार में डूबे हुये मुखराग वाली कैसे हो सकती हैं ?) । अकौतुका अर्थात् प्रियसमागम के लिए उत्सुक न थीं और पूर्ण यौवन पर आ पहुँची थीं (जो अकौतुका अर्थात् वैवाहिक मंगलसूत्र से रहित हों वे प्रौढ़ा अर्थात् विवाहिता कैसे हो सकती हैं ?) । वहां सुन्दरियों की आँखें ही सिर की सहज फूल-माला बन जातीं, कुवलय के फूलों की माला भार प्रतीत होती । उनके गालों पर छितराए हुए बालों के प्रतिबिम्ब ही क्लेश न देने वाले कर्णावतंस बन जाते, फिर कान में कर्णावतंस के रूप में तमालपत्र का लगाना पुनरुक्तिमात्र हो जाता । अपने प्रिय की कथा ही उनके लिए सुन्दर कान का आभूषण बन जाती, फिर भी उनका कुण्डल लगाना आडम्बरमात्र था । उनके कपोल ही निरन्तर आलोक उत्पन्न करते थे, मणियों के दीपक तो केवल वैभव के चिह्न होने के कारण रखे जाते थे। उनकी सुगन्धित सांसों पर लझते हुए भौंरे ही उनके मुख पर १. निःश्वासमणिप्रदीपाः । ११ ह० च०
१६२ हर्षचरितम् कुलस्त्रीजनाचारो जालिका, वाण्येव मधुरतरा वीणा बाह्यविज्ञानं तन्त्री- ताडनम्, हासा एवातिशयसुरभयः पटवासा निरर्थकाः कर्पूरपांसवः, अधरकान्तिविसर एवोज्ज्वलतरोऽङ्गरागो निर्गुणो लावण्यकलङ्कः कुङ्कुम- पङ्कः, बाहव एव कोमलतमाः, परिहासप्रहारवेत्रलता निष्प्रयोजनानि मृणालानि, यौवनोष्मस्वेदबिन्दव एव विदग्धाः कुचालंकृतयो हारास्तु भाराः, श्रोण्य एव विशालस्फटिकशिलातलचतुरस्रा रागिणां विश्रमका- रणनिमित्तं भवनमणिवेदिकाः । कमलोभनिलीनान्यलिकुलान्येव मुखराणि पदाभरणकानि निष्फलानीन्द्रनीलमणिनूपूराणि । नूपुररवाहूता भवनकलहंसा एव समुचिताः संचरणसहाया ऐश्वर्यप्रपञ्चाः परिजनाः । तत्र च साक्षात्सहस्राक्ष इव सर्ववर्णधरं धनुर्दधानः, मेरुमय इव दलदामाभ्यासोत्कर्षः, न तु कुवलयदल्दामसंभवेऽपि प्रतिनिधि रूपतापादनम् । भार इत्यनेनैष एवार्थः प्रकटितः । एवमक्लिष्टा इत्यादिदौ बोद्धव्यम् । आडम्बरः स्फुटः । जालिका शिरोवस्त्रभेदः । चतुरस्त्रा रम्याः । विश्रमकारणमिति गुरुत्वात् । तत्र चेत्यादौ । तत्र पुष्यभूतिर्नाम राजासीदिति संबन्धः । वर्णा विप्राद्याः, सुन्दर घूँघट-पट का काम करते थे, फिर भी प्रथा के नाते वे अपने मुख पर घूंघट का जाली डाल लेती थीं । उनकी वाणी अत्यन्त मधुर थी, वाह्य कला के रूप में वे तारों को छेड़ कर वीणा बजाती थीं । उनकी मुसकान ही अत्यन्त सुगन्धित पटवास का काम देती, फिर कपूर की धूल निरर्थक प्रतीत होती थी । उनके अधर की फैलती हुई कान्ति ही उनके शरीर पर अंगराग का रूप धारण कर लेती, फिर बिना किसी लाभ के कुंकुम लगाना उनके लावण्य का कलंक बन जाता था । उनकी कोमल भुजाएँ ही परिहास के अवसर में ठोंकने की वेत्रलता थीं, फिर मृणालों का वहां प्रयोजन ही क्या ? जवानी की गरमी से उनके स्तनों पर छूटते हुए पसीने ही सुन्दर हार के समान लगते, फिर उनके शरीर पर हार बोझ मात्र प्रतीत होते थे । उनके नितम्ब ही प्रेमी जनों के विश्राम के लिए स्फटिकमणि के विशाल गढ़े हुए शिलातल की बनी भवन वेदिका के समान थे । उनके चरणों को कमल समझ कर बैठे हुए भौंरे ही उनके चरणाभरण थे, वहां इन्द्रनील मणियों के नूपुर निष्फल थे । नूपुर की आवाज से खिंचे हुए भवन के कलहंस ही उनके घूमने के लिए योग्य साथी बनते, केवल ऐश्वर्य के प्रदर्शन के लिए उनके साथ परिजन रहा करते थे । उस स्थाण्वीश्वर में पुष्पभूति नामक एक राजा हुआ । जैसे इन्द्र विविध प्रकार के वर्णों (रंगों) वाला धनुष धारण करता है उसी प्रकार उसने समस्त ब्राह्मण आदि वर्णों
कल्याणप्रकृतित्वे, मन्दरमय इव लक्ष्मीसमाकर्षणे, जलनिधिमय इव मर्यादायाम्, आकाशमय इव शब्दप्रादुर्भावे, शशिमय इव कलासंग्रहे, वेदमय इवाकृत्रिमालापत्वे, धरणिमय इव लोकधृतिकरणे, पवनमय इव सर्वपार्थिवरजोविकारहरणे, गुर्व्वचसि, पृथुरुरसि, विशालो मनसि, जनकस्तपसि, सुयात्रस्तेजसि, सुमन्त्रो रहसि, बुधः सदसि, अर्जुनो यशसि, भीष्मो धनुषि, निषधो वपुषि, शत्रुघ्नः समरे, शूरः शूरसेना- क्रमणे, दक्षः प्रजाकर्मणि, सर्वादिराजतेजःपुञ्जनिर्मित इव राजा पुष्य- भूतिरिति नाम्ना बभूव ।
शुक्लाद्याश्च । कल्याणं श्रेयः, सुवर्णं च । मन्दरेण श्रीराकृष्टामृतमन्थने, पुष्यभूतिना भैरवाचार्यवेतालसाधने । मर्यादाचारः, सीमा च । शब्दो यशोऽपि । प्रादुर्भावः प्रकाशता । कला गीताद्याः, लेखाश्च । अकृत्रिमः सत्ययुक्तः, अपौरुषेयश्च । धृतिर्धैर्यम्, धारणं च । पार्थिवो राजा, पृथिवीसंबन्धी च । रजोविकारा रागाद्याः, रेणुकार्याणि । गुर्व्वित्यादिना वक्रोक्त्याज्ञानां गुर्वादिमयत्वं सूचयति । गुरुरुपदेष्टा, गुरुर्महान् । गम्भीरशब्दत्वाद्वृहस्पतिश्च । पृथुर्विपुलः, आदिराजश्च कश्चित् । विशाला विस्तीर्णाः, विशालाद्याश्च नृपा अभवन् । अथ विशालो नाम बोधिसत्त्वः स एव शान्तः शान्तमना इत्यपि प्रतीतिरस्ति । जनको जनयिता, जनक इव तपस्वी च । सुयात्र इति । शोभना यात्रा यस्य सोऽपि । कर्तव्यावधारणं मन्त्रः स शोभनो यस्येति च । बुधः पण्डितः, ग्रहश्च । अर्जुनः शुक्लोऽपि । भीष्मो भयानकः, गाङ्गेयश्च । निषधो धर्षणीयः, कठिनो वा, नलस्य च पिता, गिरिभेदो वा । शूरो विक्रान्तः, यदूनां राजा च । दक्षश्चतुरः, प्रजापतिश्च ।
के नियमनार्थ धनुष धारण किया । कल्याण प्रकृति अर्थात् श्रेय का भावना स भरा होने के कारण वह मानों कल्याण ( सुवर्ण ) के सुमेरु से निर्मित था । वह लक्ष्मी के आकर्षण करने में मन्दराचल के समान, मर्यादा में समुद्र के समान, शब्द रूप यश को उत्पन्न करने में आकाश के समान, कलाओं के संग्रह में चन्द्र के समान, स्वाभाविक बातचीत करने में वेद के समान, सारे लोक के धारण करने में पृथिवी के समान और पार्थिव अर्थात् राजाओं ( अथवा पृथिवी सम्बन्धी ) रजोविकार दूर करने में वायु के समान था । और वह वाणी में महान् या बृहस्पति था, वक्ष के सम्बन्ध में पृथु अर्थात् विपुल था या राजा पृथु के समान था, मन में विशाल था, तपस्या करने में जनक था, तेज में सुयात्र नामक राजा के समान था, रहस्य के सम्बन्ध में सुमन्त्र अर्थात् शोभन मंत्र या विचार देने वाला अथवा सुमन्त्र नामक राजा के समान था, सभा में विद्वान्, यश में अर्जुन ( उज्ज्वल ), धनुष में भीष्म ( भयंकर ), शरीर में अधर्षणीय या निषध, समर में
१६४ हर्षचरितम् पृथुना गौरिवेयं कृतेति यः स्पर्धमान इव महीं महिषीं चकार । निसर्गस्वैरिणी स्वरुच्यनुरोधिनी च भवति हि महतां मतिः । यतस्तस्य केनचिदनुपदिष्टा सहजैव शैशवादारभ्यानन्यदेवता भगवति, भक्ति- सुलभे, भुवनभृति, भूतभावने, भवच्छिदि, भवे भूयसी भक्तिरभूत् । अकृतवृषभध्वजपूजाविधिर्न स्वप्नेऽप्याहारमकरोत् । अजम्, अजरम् , अमरगुरुम् , असुरपुररिपुम् , अपरिमितगणपतिम् , अचलदुहितृपतिम्, अखिलभुवनकृतचरणनतिम्, पशुपतिं प्रपन्नोऽन्यदेवताशून्यममन्यत त्रैलो- क्यम् । भर्तृचित्तानुवर्तिन्यश्चानुजीविनां प्रकृतयः । तथा हि-गृहे गृहे भग- वान्पूज्यत खण्डपरशुः। ववुरस्य होमालवालानलविलीयमानबहलगुग्गुलु- गन्धगर्भाः स्नपनक्षीरशीकरक्षोदक्षारिणो बिल्वपल्लवदामदलोद्वाहिनः पुण्य- महिषीं महादेवीमपि । निसर्गः स्वभावः । स्वैरिणी स्ववशा । खण्डपरशुः शिवः । ववुरवहन् । होमालवालमग्निकुण्डम् । सपर्या पूजा । उपायनं ढौकनिका स्वयानीयते । प्राभृतं कौशालिका सखिभिः प्रहीयते । करदीकृता दण्डदाः कृताः । कूटं शृङ्गम् । यत्र वस्त्रेषु पुष्पाणि सूत्रैः क्रियन्ते स पुष्पपट्टः । ज्वलन्मणिशिखरः शत्रुघ्न ( शत्रु को मारने वाला ), शूरसन या शूरों का सेना पर आक्रमण करने में शूर और प्रजा के कार्य में दक्ष अर्थात् चतुर या दक्षप्रजापति के समान था । इस प्रकार वह मानों पूर्वकाल के समस्त राजाओं की तेजराशि से निर्मित हुआ था । आदिराज पृथु ने पृथिवी को धेनु बनाया था । इसी स्पर्धा में उसने पृथिवी को अपनी महिषी (भैंस, अर्थात् पत्नी) बना दिया । बड़े लोगों की बुद्धि स्वभाव से ही स्वतन्त्र और अपनी रुचि के अनुरोध पर चलने वाली होती है । जैसा कि उस राजा की अनन्य भक्ति किसी के उपदेश के बिना ही सहज रूप में बाल्यकाल से ही भगवान् शंकर में थी, जो भक्तिद्वारा सुलभ, संसार का भरण करने वाले और मोक्ष देने वाले हैं। स्वप्न में भी वह बिना शिव की पूजा किए कुछ भी खाना-पीना न था । वह भगवान् पशुपति शंकर की शरण में प्रपन्न था, जो अज, अजर, देवों के देव, त्रिपुरारि, असंख्य प्रमथ गणों के स्वामी, पार्वती के पति, सारे संसार द्वारा वन्दित चरणों वाले हैं। वह मानता था कि शिव के अतिरिक्त इस संसार में कोई अन्य देवता नहीं। स्वामी के चित्त के अनुसार ही स्वभाव से उसके अनुजीवी लोग भी प्रवृत्त होते हैं। फलतः घर-घर में भगवान् शंकर की पूजा होती थी । चारों ओर उस राजा के देश में होम के थले में पड़ते हुए गुग्गुल की गंध से भरी हुई, शिवजी को दूध से नहलाने में उड़े हुए फुहारों से शीतल, एवं बेल के पत्ते की माला को उड़ाती हुई हवा बहने लगी । पुरवासी, राज्य
तृतीय उच्छ्वासः १६५ विषयेषु वायवः । शिवसपर्यासमुचितैरुपायनैः प्राभृतैश्च पौराः पादोपजी- विनः सचिवाः स्वभुजबलनिर्जिताश्च करदीकृता महासामन्तास्तं सिषे- विरे । तथा हि-कैलासकूटधवलैः कनकपत्रलतालंकृतविषाणकोटिभिर्महा- प्रमाणैः संध्याबलिवृषैः सौवर्णैश्च स्नपनकलशैरर्घभाजनैश्च धूपपात्रैश्च पुष्प- पट्टैश्च मणियष्टिप्रदीपेभ्र्च ब्रह्मसूत्रैश्च महार्हमाणिक्यखण्डखचितैश्च मुखकोषैः परितोषमस्य मनसि चक्रुः । अन्तःपुराण्यपि स्वयमारब्धबालेयतण्डुलक- ण्डनानि देवगृहोपलेपनलोहिततरकरकिसलयानि कुसुमग्रथनव्यग्रसमस्त- परिजनानि तस्याभिलषितमन्ववर्तन्त । तथा च परममाहेश्वरः स भूपालो लोकतः शुश्राव भुवि भगवन्तमपरमिव साक्षाद्दक्षमखमथनं दाक्षिणात्यं बहुविधविद्याप्रभावप्रख्यातैर्गुणैः शिष्यैरनेकसहरुसंख्यैर्व्याप्तमर्त्यलोकं भैरवाचार्यनामानं महाशैवम् । उपनयन्ति हि हृदयमदृष्टमपि जनं शील- स्वर्णयष्टिर्यष्टिप्रदीपः। ब्रह्मसूत्रैर्यज्ञोपवीतैः। मुखयुक्ताः कोषा मुखकोषाः, ये लिङ्गोपरि दीयन्ते । बलये हिता बालेयाः । 'छदिरुपधिवलेर्ढञ्' । ग्रथनशब्दश्चिन्त्यः । ग्रन्थन- मिति भाव्यम् । अभिलषितमन्ववर्तन्तेत्यनेन चित्तानुवृत्तिः शुद्धान्तानां वर्णिता । मुनीनि । भूस्थश्वेऽप्यसुलभवत्त्वद्दर्शनमस्योक्तम् । शीलसंवादाश्चारित्रसादृश्यानि । कपर्दिनी शिवे । के कर्मचारी, मंत्री और भुजबल से पराजित होकर कर देने वाले बड़े-बड़े सामन्त भी भगवान् शिव की पूजा के उपयोग में आने वाले उपहारों से उसकी सेवा करते थे । कैलास के शिखर के समान उज्ज्वल, सोने के पत्तरों से मढ़े सींग के अग्रभाग वाले एवं विशाल आकृति वाले संध्याकालीन पूजा के बैल, स्नान कराने के लिए सोने के कलस, अर्घ्य के पात्र, धूप के पात्र, कढ़े हुए फूलदार कपड़े, मणिनिर्मित यष्टिप्रदीप, यज्ञोपवीत और शिवलिंग पर चढ़ाए जाने वाले मुखकोश को समर्पित करके लोग उसका मन सन्तुष्ट करते थे । अन्तःपुरों में भी उसकी इच्छा के अनुकूल पूजा के लिए स्वयं चावल के फटकने-बनाने का कार्य होता रहता था । देवमन्दिर को स्वयं लीपने से उनके हाथ लाल हो जाते थे । सबके सब परिजन माला गूथने में व्यग्र रहते थे । भगवान् शिव के परम भक्त उस राजा ने लोगों से सुना कि कोई भैरवाचार्य नामक दाक्षिणात्य महाशैव हैं जो साक्षात् भगवान् शंकर के दूसरे अवतार हैं और हजारों की संख्या में गुणों के समान अपने शिष्यों से सारे संसार में प्रसिद्ध हैं । शीलगुण का सम्मिलन पहले कभी न देखे हुए भी व्यक्ति को हृदय के समीप कर देते हैं। क्योंकि वह राजा दूर होने पर भी साक्षात् शिवस्वरूप भैरवाचार्य के विषय में सुनते ही अत्यधिक श्रद्धा करने लगा । आँखों
१६६ हर्षचरितम् संवादाः । यतः स राजा श्रवणसमकालमेव तस्मिन्भैरवाचार्ये भगवति द्वितीय इव कपर्दिनि दूरगतेऽपि गरीयसीं बबन्ध भक्तिम् । आचकाङ्क्ष च मनोरथैरप्यस्य सर्वथा दर्शनम् । अथ कदाचित्पर्यस्तेऽस्ताचलचुम्बिनि वासरेऽन्तःपुरवर्तिनं राजान- मुपसृत्य प्रतीहारी विज्ञापितवती- 'देव ! द्वारि परिव्राडास्ते, कथयति च भैरवाचार्यवचनाद्देवमनुप्राप्तोऽस्मि' इति । राजा तु तच्छ्रुत्वा साद- रम्- 'क्वासौ ? आनयात्रैव, प्रवेशयैनम्' इति चाब्रवीत् । तथा चाकरोत् प्रतीहारी । न चिराच्च प्रविशन्तं प्रांशुम् , आजानुभुजम् , भैक्षक्षाम- मपि स्थूलास्थिभिरवयवैः पीवरमिवोपलक्ष्यमाणम् , पृथूत्तमाङ्गम् . उत्तुङ्गवलिभङ्गस्थपुटललाटम् , निर्मांसगण्डकूपकम् , मधुबिन्दुपिङ्गल- परिमण्डलाक्षम् , ईषदवक्रघोणम् , अतिप्रलम्बैककर्णपाशम् , अला- बुबीजविकटोन्नतदन्तपङ्क्तिम् , तुरगानूकश्मथाधरलेखम् , लम्बचि- न चिराच्चेत्यादौ । मस्करिणमद्राक्षीदिति संबन्धः । प्रांशुं दीर्घम् । जानुरूरुपर्व । उक्तं च- 'जङ्घा तु प्रसृता जानूरुपर्वाष्ठीवद्वस्त्रियाम्' । पीवरं स्थूलम् । स्थपुटं निम्नोन्नतम् । ललाटमलिकं गोधिः । गण्डकूपोऽक्ष्णोरधोदेशः । घोणा नासिका । अलाबुस्तुम्बी । उक्तं च- 'तुम्ब्यलाबू उभे समे' । तुरगानामधस्तादोधोऽनूकः । की तो बात क्या ? वह केवल अपने मन के रथ पर चढ़ कर ही सर्वथा उनके दर्शन की आकांक्षा करने लगा । किसी दिन जब अस्ताचल की ओर दिन ढलने लगा तब प्रतीहारी ने अन्तःपुर में विराजमान महाराज के पास आकर निवेदन किया - 'देव, द्वार पर एक परिव्राजक पधारे हैं और कहते हैं कि भैरवाचार्य की आज्ञा से मै महाराज से भेंट करने आया हूँ।' उसे सुनकर राजा ने बड़े आदर के साथ 'कहाँ हैं ? यहीं लाओ, उन्हें प्रवेश करने दो' यह कहा । प्रतीहारी ने वैसा ही किया । थोड़ी देर में राजा ने प्रवेश करते हुए उस संन्यासी को देखा । उसकी कद लम्बी थी । भुजाएँ घुटनों तक थीं । भिक्षाटन के कारण वह दुबला था फिर भी मोटी हड्डियों वाले अङ्गों से वह भरा-सा प्रतीत होता था । उसका मस्तक चौड़ा था । लम्बी रेखाओं के कारण उसका ललाट नीचा-ऊँचा हो गया था । मांस के न होने से गालों में गड्ढे पड़ गए थे । पुतलियाँ शहद की बूंद की तरह पीलापन लिए थीं । नाक कुछ टेढ़ी थी । कान की एक पाली अधिक लम्बी थी । लौकी के बीज की भाँति दन्त- पंक्ति निकली हुई थी । अधर घोड़े के निचले होठ की तरह लटका हुआ था । लम्बी ठुड्डी के कारण उसका मुँह लम्बोतरा जान पड़ता था । उसके कंधे से लटकता हुआ छाल योग-
तृतीय उच्छ्वासः १६७
बुकायत्ततरलपनम्, अंसावलम्बिना काषायेण योगपट्टकेन विरचितवैक- क्षकम्, हृदयमध्यनिबद्धग्रन्थिना च रागेणेव खण्डशः कृतेन धातुरसा- रुणेन कर्पटेन कृतोत्तरासङ्गम्, पुनरुक्तबालप्रग्रहवेष्टन निश्चलमूलेन बद्ध- मृत्परिशोधनवंशत्वक्तितउना कौपीनसनाथशिखरेण खर्जूरपुटसमुद्गकग- र्भीकृतभिक्षाकपालकेन दारवफलकत्रयत्रिकोणत्रियष्टिनिविष्टकमण्डलुना बहिरुपपादितपादुकावस्थानेन स्थूलदशासूत्रनियन्त्रितपुस्तिकापूलकेन वामकरधृतेन योगभारकेणाध्यासितस्कन्धम्, इतरकरगृहीतवेत्रासनं मस्करिणमद्राक्षीत्। क्षितिपतिरप्युपगतं १मुचितेन चैनमादरेणान्वग्रहीत्। आसीनं च पप्रच्छ - 'क्व भैरवाचार्यः ?' इति। सादरनरपतिवचनमुदि- तमतिस्तु परिव्राट् तमुपनगरं सरस्वतीतटवनावलम्बिनि शून्यायतन स्थितमाचचक्षे। भूयश्चाबभाषे- 'अर्चयति हि महाभागं भगवानाशीर्व-
'अधोऽधरस्य चिबुकम्' । लपनं मुखम् । उत्तरासङ्गमपरिप्रावरणम् । पुनरुक्तं पौनः- पुन्येन कृतम् । प्रग्रहो रज्जुः । तितउश्चालनी परिपवनशब्दवाच्या । कौपीनं गुह्यदेश उपचारात्, तदाच्छादनं च खर्जूराख्यस्य वृक्षस्य च संबन्धिभिः पुटैः क्लृप्तैः, पत्रैश्च समुद्गकः कपालभङ्गो भिक्षायै क्रियते । दारवे काष्ठसंबन्धिनि फल- कत्रये त्रयः कोणास्तेषु यास्तिस्रो यष्टयस्तासु निविष्टः कमण्डलुर्यत्र तेन । योग- भारकेण मात्राभारिकया। मस्करिणं परिव्राजकम् । राजतानि रौप्याणि ।
पट्ट सामने वैकक्षक की तरह पड़ा हुआ था। गेरू से रँग हुए वस्त्र का चादर के रूप में वह ओढ़े था जिसकी गाँठ छाती के बीच में थी, मानों वह वस्त्र उसके द्वारा खण्ड खण्ड किए गए राग का बाह्य रूप था। एक सिरे से बाएँ हाथ में पकड़े हुए बाँस के दूसरे सिरे से उसके कंधे के पीछे लटकती हुई झोली थी। झोली का ऊपरी सिरा बालों की बटी हुई रस्सी से बँधा था। मिट्टी चालने के लिए बाँस की बनी हुई चलनी उसमें बँधी थी। उसके अग्रभाग में कौपीन लटक रहा था। झोली के भीतर खजूर के पत्ते को मोड़कर बनाया हुआ भिक्षाकपाल रखा था। लकड़ी के तीन पट्टों को जोड़ कर बने हुए त्रिकोण के भीतर कमण्डलु रखा हुआ था और उस त्रिकोण के तीन पट्टों में तीन डंडियाँ लगी थीं जिनसे वह बाँस से लटका हुआ था। झोली के बाहर खड़ाऊँ लटक रही थी। कपड़े की मोटी किनारी से बँधे हुए पोथियों के गुटके झोली में रक्खे थे। उसके दाहिने हाथ में बेंत की चटाई थी। पहुँचे हुए उस संन्यासी से राजा आदरपूर्वक मिले। उसके बैठ जाने पर राजा ने पूछा- 'भैरवाचार्य कहाँ हैं?' आदर के साथ कहे हुए राजा के वचन सुनकर
१. मुचितेन नचैनं ।
१६८ हर्षचरितम् चसा' इत्युक्त्वा चोपनिन्थे । योगभारकादाकृष्य भैरवाचार्यप्रहितानि रत्नवन्ति बहलालोकलिप्तानतःपुराणि पञ्च राजतानि पुण्डरीकाणि । नरपतिस्तु प्रियजनप्रणयभङ्गकातरो दाक्षिण्यमनुरुध्यमानो ग्रहणला- घवं च लङ्घयितुमसमर्थो दोलायमानेन मनसा स्थित्वा चिरं कथंकथमप्य- तिसौजन्यनिघ्नस्तानि जग्राह । जगाद च—'सर्वफलप्रसवहेतुः शिवभ- क्तिरियं नो मनोरथदुर्लभानि फलति फलानि । येनैवमस्मासु प्रीयते तत्रभगवान्भुवनगुरुर्भैरवाचार्यः । श्वो द्रष्टास्मि भगवन्तम्' इत्युक्त्वा च मस्करिणं व्यसर्जयत् । अनया च वार्तया परां मुदमवाप । अपरेद्युश्च प्रातरेवोत्थाय वाजिनमधिरुह्य समुच्छ्रितश्वेतातपत्रः समु- द्धूयमानधवलचामरयुगलः कतिपयैरेव राजपुत्रैः परिवृतो भैरवाचार्यं सवितारमिव शशी द्रष्टुं प्रतस्थे । गत्वा च किंचिदन्तरं तदीयमेवाभिमु- खमापतन्मन्यतमं शिष्यमद्राक्षीत् । अप्राक्षीच्च—'क्व भगवानास्ते ?' लङ्घयितुमुत्सोढुम् । निघ्नः स्ववशः । अन्यतममपरम् । उत्तरेणोत्तरास्यां दिशि । उस संन्यासी ने प्रसन्नतापूर्वक सूचित किया की नगर के समीप हीं सरस्वती नदी के तटवर्ती जंगल के एक शून्यायतन में भैरवाचार्य हैं । और फिर बोला—'महाभाग ! आपको भगवान् भैरवाचार्य अपने आशीर्वादवचन द्वारा सम्मानित करते हैं !' यह कहकर उसने भैरवाचार्य द्वारा उपहार के रूप में भेजे हुए रत्नजटित चाँदी के पाँच कमलों को अर्पित किया जो सारे अन्तःपुर को आलोकित कर रहे थे । राजा ने अपने प्रिय भैरवाचार्य के प्रेम के भङ्ग होने के भय से उदारता का अनुरोध करते हुए, दी हुई वस्तु के ग्रहण करने की छुटपन को सहने में असमर्थ, अपने दोलारूढ़ मन से कुछ देर तक ठहर कर किसी-किसी प्रकार अपने सौजन्य के विवश होते हुए उन रत्नों को ले लिया और बोले—'सब प्रकार के फलों को उत्पन्न करने वाली यह शिवभक्ति हमारे मनोरथ भी जिन्हें नहीं प्राप्त करते ऐसे फलों को उत्पन्न करती है । इसी कारण आदरणीय जगद्गुरु भैरवाचार्य हम पर प्रसन्न हैं । कल भगवान् के दर्शन करूँगा ।' यह कहकर उस संन्यासी को विदा किया । इस समाचार से वे अत्यन्त प्रसन्न हुए । दूसरे दिन राजा ने सबेरे ही उठ घोड़े पर सवार हो श्वेत छत्र लगा उज्ज्वल चँवरों से विराजमान हो कुछ राजपुत्रों के साथ भैरवाचार्य के दर्शन के लिए प्रस्थान किया, मानों चन्द्रमा सूर्य की ओर बढ़ता हो । कुछ ही दूर चले कि उन्हीं के सामने आते हुए एक शिष्य को देखा और पूछा—'भगवान् कहाँ हैं ?' उसने कहा—'यहीं पुराने देवी के
[header] तृतीय उच्छ्वासः १६६ [/header]
इति। सोऽकथयत्—'अस्य जीर्णमातृगृहस्योत्तरेण बिल्ववाटिकामध्यास्ते' इति। गत्वा च तं प्रदेशमवततार तुरगात्। प्रविवेश च बिल्ववाटिकां। अथ महतः कार्पटिकवृन्दस्य मध्ये प्रातरेव स्नातम्, दत्ताष्टपुष्पि- कम्, अनुष्ठिताग्निकार्यम्, कृतभस्मरेखापरिहारपरिकरे हरितगोमयो- पलिप्तक्षितितलवितते व्याघ्रचर्मण्युपविष्टम्, कृष्णकम्बलप्रावरणनिभे- नासुरविवरप्रवेशाशङ्कया पातालान्धकारावासमिवाभ्यस्यन्तम्, उन्मि- षता विद्युत्कपिलेनात्मतेजसा महामांसविक्रयक्रीतेन मनःशिलापङ्केनेव शिष्यलोकं लिम्पन्तम्, जटीकृतैकदेशलम्बमानरुद्राक्षशङ्खगुटिकेनोर्ध्व- बद्धेन शिखापाशेन बघ्नन्तमिव विद्यावलेपदुर्विदग्धानुपरिसंचरतः सिद्धान्, धवलकतिपयशिरोरुहेण वयसा पञ्चपञ्चाशतं वर्षाण्यतिक्रा- मन्तम्, खालित्यक्षीयमाणशङ्खलोमलेखम्, लोमशकर्णशष्कुलीप्रदेशम्, पृथुललाटतटम्, तिरःश्यामभस्मललाटिकया बहुशः शिरोर्धधृतदग्ध- गुग्गुलुसंतापस्फुटितकपालास्थिपाण्डुरराजिशङ्कामिव जनयन्तम्, सहज-
अथेत्यादौ । भैरवाचार्यं ददर्शेति संबन्धः। कार्पटिका व्रतिनः । अष्टपुष्पिका प्रागुक्ता। परिहारोऽत्र मर्यादा । शङ्खे ललाटास्थिन। उक्तं च—'शङ्खो निधौ लला- टास्थिन' । गुटिका खण्डिका। उपरीत्याद्यभिप्रायेणोक्तम्— ऊर्ध्वबद्धे( वृद्धे ? )नेति । प्रशस्ता शिखा शिखापाशः। अवलेपोऽहंकृतिः। खालित्यं खल्वाटता। शङ्खो
मन्दिर के उत्तर विल्ववाटिका में आसन लगाए हैं।' उस स्थान पर जाकर वे घोड़े से उतर गए और विल्ववाटिका में प्रवेश किया। साधुओं की जमात के बीच प्रातःस्नान, अष्टपुष्पिका द्वारा शिवार्चन और अग्निहोत्र से निवृत्त होकर भस्म से पुरे चौक के बीच गोबर से लिपी जमीन पर बिछे व्याघ्र-चर्म पर विराजमान भैरवाचार्य को देखा। काले कंबल को ओढ़कर मानों वे असुर-विवर में प्रवेश करने की इच्छा से पाताल के घने अन्धकार में रहने का अभ्यास कर रहे थे। बिजली के समान पीले चमकते हुए अपने तेज से शिष्यों को मानों श्मशान का महामांस बेच कर खरीदे हुए मैनसिल के चन्दन से चर्चित कर रहे थे। एक ओर चोटी में रुद्राक्ष और शंख की गुरियों को गूंथकर लटकाये हुए और चोटी को खड़ी बाँधे हुये मानों विद्या के मद में फूलकर ऊपर-ऊपर उड़ते हुए सिद्धों को बाँध रहे थे। उनके सिर के कुछ बाल सफेद हो गये थे और अवस्था के वह पचपन साल गुजार चुके थे। उनकी गञ्जी खोपड़ी के बाल झड़ चुके थे। कान के भीतर भी बाल जम गए थे। ललाट प्रशस्त था, उसपर भस्म की टेढ़ी और साँवली रेखा से ऐसा लगता था कि उनके सिर पर आधे जले हुए
१७० हर्षचरितम्
ललाटवलिभङ्गसंकोचितकूर्चभागं बभ्रुभासं भ्रूसंगत्या निरन्तरामाया- मिनीमेकामिव भ्रूरेखां बिभ्राणम्, ईषत्काचरकनीनिकेन रक्तापाङ्ग- निर्गतांशुप्रतानेन मध्यधवलभासेन्द्रायुधेनेवातिदीर्घेण लोचनयुगलेन परितो महामण्डलमिवानेकवर्णरागमालिखन्तम्, सितपीतलोहित- पताकावलिशबलम्, शिवबलिमिव दिक्षु विक्षिपन्तम्, तार्क्ष्यतुण्ड- कोटिकुब्जाग्रघोणम्, दूरविदीर्णसृक्कसंक्षिप्तकपोलम्, किंचिदन्तुरतया सदाहृदयसंनिहितहरमौलिचन्द्रातपेनेव निर्गच्छता दन्तालोकेन धवल- यन्तं दिशां जालम्, जिह्वाप्रस्थितसर्वशैवसंहितातिभारेणेव मनाक्प्र- लम्बितौष्ठम, प्रलम्बश्रवणपालीप्रेङ्खिताभ्यां स्फाटिककुण्डलाभ्यां शुक्रबृ- हस्पतिभ्यामिव सुरासुरविजयविद्यासिद्धिश्रद्धयानुबध्यमानम्, बद्धविवि- धौषधिमन्त्रसूत्रपङ्किना सलोहवलयेनैकप्रकोष्ठेन शङ्खखण्डं पूष्णो दन्तमिव भगवता भवेन भग्नं भक्त्या भूषणीकृतं कलयन्तम्, अखिलरसकूपोद्धृ- ललाटास्थि । शष्कुली कुहरम् । 'कूर्चमस्त्री भ्रुवोर्मध्यम्' । काचरा पीतवर्णा । तुण्डं मुखम् । कोटिः प्रान्तः, चञ्च्वग्रम् । 'प्रान्तावोष्ठस्य सृक्किणी, प्रकोष्ठमन्तरं विद्यादर- त्निमणिबन्धयोः' । पूष्णो रविभेदस्य । पुरा दक्षयज्ञगतस्य हरं निन्दतः 'मय्यनागते किमर्थमागतोऽस्मि' इति मुष्टिप्रहारेण हरेण दन्ता भग्नाः। तत्करस्पर्शन पावनत्वात्तन्न गुग्गुल की गरभी से फूटी कपाल की खोपड़ी सफेद दिखाइ दे रही हो । माथ पर सिकन पड़ने से भौंहों के बीच का हिस्सा सिकुड़ गया था और दोनों भौंहों के मिल जाने से एक भ्रूरेखा बन गई थी । आँखों की पुतली कच्चे काँच की तरह पीले रङ्ग की थी और लाल अपाङ्गों से निकलती हुई किरणें मध्य में सफेद इन्द्रायुध के दृश्य को उत्पन्न कर रही थीं । ऐसा लग रहा था कि साधना करने के लिये वे अनेक रङ्गों वाले महामण्डल की रचना कर रहे थे । सफेद, पीली, लाल झण्डियों से रङ्ग-बिरङ्ग के लग रहे थे । दिशाओं में शिव की बलि छोड़ रहे थे । गरुड़ की टोर के समान उनकी नाक का अग्रभाग झुका हुआ था । ओठ के बगल की दूर तक कटाव से उनके कपोल छोटे लग रहे थे । हमेशा उनके हृदय में सन्निहित रहने वाले भगवान् शिव के मस्तक की चन्द्रकिरणों के समान दाँतों की टेढ़ी रश्मियाँ निकलकर दिशाओं को धवलित कर रही थीं, मानों जीभ के अग्रभाग में स्थित समस्त शैवसंहिताओं के भारी बोझ से उनका ओष्ठ नीचे की ओर लटका हुआ था । कान की लम्बी पालियों में स्फटिक के कुंडल लटक रहे थे, मानों देवताओं और असुरों पर विजय पाने के लिये विद्या सीखने की श्रद्धा से शुक्र और बृहस्पति उनके पीछे लगे हों । एक हाथ में लोहे के कड़े में पिरोया हुआ शंख का टुकड़ा पहने थे, जिसमें
तृतीय उच्छ्वासः १७१ नघटीयन्त्रमालामिव रुद्राक्षमालां दक्षिणेन पाणिना भ्रमयन्तम्, उरसि दो- लायमानेनापिङ्गलाग्रेण कूर्चककलापेन संमार्जयन्तमिवान्तर्गतं निजरजो- निकरम्, अतिनिबिडनीललोममण्डलविचितं च ध्यानलब्धेन ज्योतिषा दग्धमिव हृदयदेशं दधानम्, ईषत्प्रशिथिलवलिवलयबध्यमानतुन्दम्, उप- चीयमानस्फिङ्मांसपिण्डकम्, पाण्डुरपवित्रक्षौमावृतकौपीनम्, सावष्टम्भ- पर्यङ्कबन्धमण्डलितेनामृतफेनश्वेतरुचा योगपट्टकेन वासुकिनेवाप्रतिहता- नेकमन्त्रप्रभावाविर्भूतेन प्रदक्षिणीक्रियमाणम्, अरुणतामरससुकुमारतर- तलस्य पादयुगलस्य निर्मलैर्नखमयूखजालैर्जर्जयन्तमिव महानिधानो- द्धरणरसेन रसातलम्, तोयक्षालितशुचिना धौतपादुकायुगलेन हंसमिथु- नेनेव भागीरथीतीर्थयात्रापरिचयागतेनामुच्यमानचरणान्तिकम्, शिख- रनिखातकुब्जकालायसकण्टकेन वैणवेन विशाखिकादण्डेन सर्वत्रिगासि- भक्तिः। अखिलस्य रसस्य कूपादुद्धनाय घटीयन्त्रमालापि भ्राम्यते। दोलाय- मानत्वेन संमार्जनसंभावना। कलापग्रहणं मार्जनीसादृश्यार्थम्। रजो रागः, रेणुश्च। विचितं व्याप्तम्। तुन्दमुदरम्। स्फिजावुभयत्र प्रसिद्धे। 'स्त्रियां स्फिजौ कटिप्रीथौ' इत्यमरः। फेनवत्तैश्च श्वेता। वासुकिनेवेति। न सामान्येनेति प्रभावपरिशोधकम्। जर्जयन्तं खण्डशः कुर्वाणम्। तोयेत्यादि। हंसमिथुनस्यापि विशेषणम्। शिखरे- त्यादिनाङ्कुशसादृश्यं विशाखिकादण्डस्योक्तम्। निखात उत्कीर्णः। कालायसं शस्त्र- अनेक औषधियां मन्त्र और सूत्र के अक्षर लिखकर बँधे थे, मानों उस शंख के टुकड़े के रूप में भगवान् शिव द्वारा तोड़े गए पूषा के दाँत को उन्होंने भक्ति से आभूषण बना लिया था। दाहिने हाथ में रुद्राक्ष की माला को घुमा रहे थे, मानों सारे रस को निकाल लेने के लिए रहट चला रहे थे। छाती पर पीले अग्रभाग वाली दाढ़ी लहरा रही थी, मानों हृदय के रजोविकार को झाड़ रहे थे। घने और नीले भरे रोंगटे को देखकर लगता मानों ध्यान से प्राप्त ज्योति के कारण जले हुए हृदय को धारण कर रहे हों। उदर में वलियाँ पड़ गई थीं। नितम्ब का मांस बढ़ गया था। उनका कौपीन उज्ज्वल और पवित्र क्षौम वस्त्र से ढका हुआ था। वीरासन लगाकर विराजमान उनके चारों ओर अमृतफेन के समान योगपट्ट घिरा हुआ था मानों उनके विफल न होने वाले मन्त्रों के प्रभाव से प्रकट होकर वासुकि नामक नागराज उनकी प्रदक्षिणा कर रहा हो। लाल कमल के समान सुकुमार तलवे वाले दोनों चरणों के नखों की निर्मल किरणें फैल रही थीं, मानों बहुमूल्य निधि को निकालने के लिए पाताल को विदीर्ण कर रहे थे। पैरों के पास पानी से धुला हुआ पवित्र खड़ाउओं का जोड़ा रखा हुआ था, मानों गङ्गा के तीर्थों में विचरने के समय परिचय हो जाने से हंसों का जोड़ा साथ लग गया हो। पास में बाँस का बैसाखी दण्ड।
१७२ हर्षचरितम् द्धिविघ्नविनायकापनयनाङ्कुशेनेव सततपार्श्ववर्तिना विराज मानम् , अबहु- भाषिणं मन्दहासिर्न सर्वोपकारिणं कुमारब्रह्मचारिणम् , अतितपस्विनम् , महामनस्विनं कृशक्रोधम् , अकृशानुरोधम् , महानगरमिवादीनप्रकृतिशो- भितम् , मेरुमिव कल्पतरुपल्लवराशिसुकुमारच्छायम् , कैलासमिव पशुपति- चरणरजःपवित्रितशिरसम् , शिवलोकमिव माहेश्वरगणानुयातम् , जलनिधिमिवानेकनदनदीसहस्रप्रक्षालितशरीरम् , जाह्नवीप्रवाहमिव बहु- पुण्यतीर्थस्थानशुचिम् , धाम धर्मस्य, तीर्थं तथ्यस्य, कोशं कुशलस्य, पत्तनं १ पूततायाः, शाला शोलस्य, क्षेत्रं क्षमायाः, शालेयं शालीनतायाः, स्थानं स्थितेः, आधारं धृतेः, आकरं करुणायाः, निकेतनं कौतुकस्य, आरामं रमणीयकस्य, प्रासादं प्रसादस्य, आगारं गौरवस्य, समाजं भेदः । विशाखिका खनित्रिका । विघ्नोऽन्तरायः । विनायको गजाननः । प्रकृतिः स्वभावः, मायादिका च । राशिवत्तेन च सुकुमाराः । गणाः समूहाः, प्रमथाश्च । नदनदीत्येकशेषो युक्तः । सहस्रेषु तैः प्रक्षालितशि(शरी ? ) राः । तीर्थेषु यत्स्थानं वसनं तेन शुचिम् । तीर्थस्नानः कनखलाद्यवस्थितिभिश्च शुचिः । शालीनता विनी- तत्वम् । निकेतनं गृहम् । तत्र हि सर्वस्य कौतुकं जायते । था जिसके सिरे पर टेढ़ा लोहे का कोल जड़ा हुआ था मानो समस्त विद्याओ का सिद्धि में विघ्न पहुँचाने वाले विघ्नराज गजानन को हटाने के लिये अंकुश हो । वे बहुत कम बोलने वाले, मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए, सब प्रकार के उपकारी, आजन्म ब्रह्मचारी, महा- तपस्वी, महामनस्वी, क्रोधरहित और समाहृत थे । महानगर की भाँति उनकी प्रकृति (स्वभाव या नागरिक जन) अदीन अर्थात् दीनतारहित थी । सुमेरु के समान कल्पवृक्ष के पल्लव की भाँति उनकी कान्ति थी (सुमेरु पर कल्पवृक्ष के पत्तों की छाया रहती है) । भगवान् शिव के चरणों की धूल से उनका सिर पवित्र था जैसे कैलास पर्वत शिव की चरणधूलि से पवित्र होता है। शैव लोग उनके साथ थे जैसे शिवलोक में प्रमथगण रहते हैं। अनेक नद और नदियों में उन्होंने अपने शरीर को समुद्र की भाँति प्रक्षालित किया था । वे अनेक पुण्यतीर्थों में भ्रमण करके गङ्गा के प्रवाह की भाँति पवित्र हो चुके थे । वे धर्म के धाम, सत्य के तीर्थ, कुशल के कोश, पवित्रता के नगर, शीलगुण के गृह, क्षमा के क्षेत्र, नम्रता के निवासस्थान, मर्यादा के स्थान, धैर्य के आधार, करुणा के खान, कौतूहल के निकेतन, सौन्दर्य के उपवन, प्रसन्नता के प्रासाद, गौरव के गृह, सौजन्य के १. पत्तनं पूततायाः ।
तृतीय उच्छ्वासः १७३ सौजन्यस्य, संभवं सद्भावस्य, कालं कलेः, भगवन्तं साक्षादिव विरू- पाक्षं भैरवाचार्य ददर्श । भैरवाचार्यस्तु दूरादेव राजानं दृष्ट्वा शशिनमिव जलनिधिश्चचाल । प्रथमतरोत्थितशिष्यलोकम्रोत्थाय प्रत्युज्जगाम । समर्पितश्रीफलोपायनश्च जह्नुकर्णसमुद्गीर्यमाणगङ्गाप्रवाहह्लादगम्भीरया गिरा स्वस्तिशब्दमकरोत् । नरपतिरपि प्रीतिविस्तार्यमाणधवलिम्ना चक्षुषा प्रत्यर्पयन्निव बहुत- राणि पुण्डरीकवनानि ललाटपट्टपर्यस्तेन चोदंशुना शिखामणिना महेश्व- रप्रसादमिव तृतीयनयनोद्गमेन प्रकाशयन्नावर्जितकर्णपल्लवपलायमानमधु- करः शिवसेवासमुन्मूलिताशेषपापलवमुच्यमान इव दूरादवनतः प्रणाम- मभिनवं चकार । आचार्योऽपि—'आगच्छ अत्रोपविश' इति शार्दूलच- र्मात्मीयमदर्शयत् । उपदर्शितप्रश्रयस्तु राजा मत्तहंसकलगद्गदस्वरसुभगां मधुरसमय महानदीमिव प्रवर्तयन्वाचं व्याजहार—'भगवन् ! नार्हसि शश्यपि राजा तं च दूरादेव दृष्ट्वा जलनिधिश्चलति । गाम्भीर्याच्च जलनिधिरेवे- त्युक्तम् । बिल्वं श्रीफलम् । गङ्गेत्यादिना पवित्रत्वमाह । धवलिम्नेत्यनेन पुण्डरीकाणां धवलत्वमाह । प्राभृतपुण्डरीकाणां राजतत्त्वात् । आवर्जितं स्वरवच्च तेन शुभगात् । शार्दूलो व्याघ्रः । समाज, सद्भाव के उत्पत्तिस्थान एव काल के अन्तक थे । इस प्रकार वे साक्षात् शिव के समान लग रहे थे । भैरवाचार्य दूर से ही राजा को देखकर उस प्रकार चल पड़े जैसे समुद्र चन्द्रमा को देखकर उमड़ उठता है । पहले ही उठे हुए शिष्यों को साथ लेकर राजा के पास पहुंचे और श्रीफल का उपहार भेंट किया। तब जह्नु के कर्णकुहर से निकलते हुए गंगा-प्रवाह की ध्वनि के समान गम्भीर वाणी द्वारा 'स्वस्ति' शब्द का उच्चारण किया । राजा ने प्रीति से आँखों की सफेदी को बढ़ाते हुए देखा मानों बहुत से कमलबनों को उनके स्वागत में अर्पित कर रहा हो । ललाट में लगी हुई शिखामणि के ऊपर की ओर फैलती हुई किरणों से मानों भगवान् शंकर के तीसरे नेत्र से प्राप्त प्रसाद को धारण कर रहा हो। जब वह झुकने लगा तब उसके कर्णपल्लव पर बैठे हुए भौंरे उड़े मानों भगवान् शिव को सेवा करने से उसके पाप उड़े जा रहे हों। इस प्रकार उसने दूर ही से झुककर प्रणाम किया । आचार्य ने भी 'आओ, यहाँ बैठो' यह कह कर अपने व्याघ्रचर्म की ओर निर्देश किया । विनय प्रकट करते हुए राजा ने मत्त कलहंस की आवाज की भाँति सुन्दर, मधु रस की महानदी को मानों प्रवाहित करते हुए कहा—'भगवन्, मुझे आप दूसरे