हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
१३४ हर्षचरितम् चौपलोचितकौलीनकोपितोऽपि मनसा स्निह्यत्येव मयि । यद्यहमक्षिगतः स्याम्, न मे दर्शनेन प्रसादं कुर्यात् । इच्छति तु मां गुणवन्तम् । उपदिशन्ति हि विनयमनुरूपप्रतिपत्त्युपपादनेन वाचा विनापि भर्तव्यानां स्वामिनः । अपि च धिङ्मां स्वदोषान्धमानसमनादरपीडितमेवमति- गुणवति राजन्यन्यथा चान्यथा च चिन्तयन्तम् । सर्वथा तथा करोमि, यथा यथावस्थितं जानाति मामयं कालेन' इत्येवमवधार्य चापरेद्यु- र्निष्क्रम्य कटकात्सुहृदां बान्धवानां च भवनेषु तावदतिष्ठत्, यावदस्य स्वयमेव गृहीतस्वभावः पृथिवीपतिः प्रसादवानभूत् । अविशच्च पुनरपि नरपतिभवनम् । स्वल्पैरेव चाहोभिः परमप्रीतेन प्रसादजन्मनो मानस्य प्रेम्णो विश्रम्भस्य द्रविणस्य नर्मणः प्रभावस्य च परां कोटिमानीयत नरेन्द्रणेति । इति श्रीमहाकविबाणभट्टकृते हर्षचरिते राजदर्शनं नाम द्वितीय उच्छ्वासः नूपुरम् । दक्षिणोऽनुकूलः । कौलीनं जनापवादः । अक्षिगतो द्वेष्यः । विश्रम्भ- स्याश्वासस्य । द्रविणस्य धनस्य । नर्मणः परिहासस्य ॥ इति श्रीशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेते द्वितीय उच्छ्वासः समाप्तः । अनादर से दुखी होकर ऐसे गुणवान् राजा के विषय में कुछ अनाप-शनाप सोचने लगूँ । अब मैं सर्वथा वही करूंगा जिससे समय से वे मुझे ठीक पहचान लें ।' बाण ने ऐसा निश्चय किया और दूसरे दिन प्रातःकाल स्कन्धावार से निकल कर मित्रों और रिश्तेदारों के घर में ठहरा । तब तक सम्राट् स्वयं उसके स्वभाव से परिचित होकर उस पर प्रसन्न हो गए और फिर वह राजभवन में आकर जम गया । थोड़े ही दिनों में सम्राट् उस पर अत्यन्त प्रसन्न हुए और अपने प्रसादजनित सम्मान, प्रेम, विश्वास, धन-सम्पत्ति, परिहास और प्रभाव की पराकाष्ठा पर उसे पहुँचा दिया । द्वितीय उच्छ्वास समाप्त १. चापलोपचित ।
तृतीय उच्छ्वासः निजवर्षादितस्नेहा बहुभक्तजनान्विताः । सुकाला इव जायन्ते प्रजापुण्येन भूभुजः ॥ १ ॥ साधूनामुपकर्तुं लक्ष्मीं द्रष्टुं विहायसा गन्तुम् । न कुतूहलि कस्य मनश्चरितं च महात्मनां श्रोतुम् ॥ २ ॥ अथ कदाचिद्विरलितबलाहके, चातकातङ्ककारिणि, कणत्कादम्बे, दर्दुरद्विपि, मयूरमदमुषि, हंसपथिकसार्थसर्वातिथौ, धौतासिनिभनभसि, निजेति । निज आत्मीयः वर्षों लोकः, वृष्टिश्च । वर्षं वर्षमपि निजं समु- चितकालप्राप्तम् । स्नेहः प्रीतिः, आर्द्रता च । भक्ताः अनुरक्ताः ओदनश्च । भक्तं भक्तरूपाणां भूभृतां सुकालानां च प्रजापुण्यं हेतुः। अनेन महानुभाव- पुष्पभूतिवर्णना सूचिता ॥ १ ॥ साधूनामिश्यादिनापि भैरवाचार्योपकारकरणम् , स्वयं लक्ष्मीदर्शनम् , विहा- यसा गमनं भैरवाचार्यस्य, महात्मचरितश्रवणकुतूहलं च निजभ्रात्रादीनां सूचितम् ॥ २ ॥ अथेत्यादौ । एवंविधे शरत्समयारम्भे बन्धून्द्रष्टुं बाणो ब्राह्मणाधिवासमगादिति संबन्धः । विरलिताः न पुनरेकान्ततोपगताः । बलाहका मेघाः । चातकाः स्तोका- ख्याः पक्षिणः । कादम्बाः कृष्णहंसाः । दर्दुरा मण्डूकाः । हंसा एव पथिकसार्थाः, जब प्रजा के पुण्य। का उदय हाता हं तथा सुकाल का भांति राजा भा उत्पन्न हो जाते हैं और अपने राज्य में सर्वत्र प्रेमभाव फैलाते हैं । अनेक अनुचर उनके इस पुण्यकार्य में सहायक हो जाते हैं । इस प्रकार सुकाल में जल की वर्षा से धरती गीली हो जाती है और बहुत अन्न पैदा होता है । तात्पर्य यह कि सौराज्य और सुसमय दोनों प्रजा के पुण्यों के फल-स्वरूप हैं ॥ १ ॥ सज्जनों के उपकार करने के लिए, लक्ष्मी को साक्षात् देखने के लिए, आकाश मार्ग से उड़कर चलने के लिए एवं महात्माओं के चरित सुनने के लिए किसके मन में कुतूहल पैदा नहीं होते ? ॥ २ ॥ एक समय शरद ऋतु का आरम्भ हुआ । आकाश में मेघ कहीं-कहीं छिट-पुट नजर आने लगे । चातक पक्षियों का सन्ताप बढ़ गया । कलहंस चारों ओर आवाज करने लगे । जल के सूख जाने से बेचारे मेढ़कों पर आफत पड़ गई । मौरों का नृत्य-जनित गर्व
१३६ हर्षचरितम् भास्वरभास्वति, शुचिशशिनि, तरुणतारागणे, गलत्सुनासीरशरासने, सीदत्सौदामनीदाम्नि, दामोदरनिद्राद्रुहि, द्रुतवैदूर्यवर्णार्णसि, घूर्णमानमि- हिकालघुमेघमोघमघवति, निमीलन्नीपे, निष्कुसुमकुटजे, निर्मुकुलकन्दले, कोमलकमले, मधुस्यन्दीन्दीवरे, कह्लाराह्लादिनि, शेफालिकाशीतलीकृ- तनिशे, यूथिकामोदिनि, मोदमानकुमुदावदातदशदिशि, सप्तच्छदधूलि- धूसरितसमीरे, स्तबकितबन्धुरबन्धूकावध्यमानाकाण्डसंध्ये, नीराजित- वाजिनि, उद्दामदन्तिनि, दर्पक्षीणौक्षक्रे, क्षीयमाणपङ्कचक्रवाले, बाल- पुलिनपल्लवितसिन्धुरोधसि, परिणामाश्यानश्यामाके, जनितप्रियङ्गु- तेषां निर्मलजलदानादिना स्यात्सर्वातिथित्वम् । शुचिर्निर्मलः । सुनासीर इन्द्रः । सौदामनी विद्युत् । दामोदरो हरिः । अस्य निद्रां द्रोधि यस्तस्मिन् । तदा किल हरिर्विबुध्यत इति वार्ता । अर्णो जलम् । घूर्णमाना भ्रमन्ती या मिहिका नीहार- स्तद्वल्लघवस्तुच्छा ये मेघास्तैर्मोघो निष्फलो मघवानिन्द्रो यत्र तस्मिन् । वर्षाभावा- द्विन्द्रस्य मोघत्वम् । इन्द्रादेशेन हि मेघा वर्षन्ति । मेघवद्वर्जितमित्यन्ये । नीपाः कुटजाः । कन्दलाश्च वृक्षभेदाः । कह्लाराणि सौगन्धिकापरनामानि श्वेतोत्पलानि । जलकुसुमपत्रिकेत्यन्ये । शेफालिका पुष्पभेदः रात्रावेव विकसति । यूथिका हरिणिका । मोदमानानि विकसन्ति । सप्तच्छदाः सप्तपर्णाख्या वृक्षभेदाः । बन्धुरा हृद्याः । बन्धूका बन्धुजीवाख्या वृक्षभेदाः । नीराजिताः कृतशान्तिविधानाः । क्षीबा- ण्यौक्षकानि दान्तसमूहा यत्र तस्मिन् । चक्रवालं समूहः । बालं तत्क्षणमु- भी कम पड़ गया। राही के रूप में हंस पक्षी सबके अतिथि बन कर आने लगे। पानी चढ़ाए खड्ग की भाँति आकाश निर्मल हो गया। सूर्य में चमक बढ़ गई और चन्द्रमण्डल भी निर्मल हो गया। आकाश में तारे बढ़ने लगे। इन्द्रधनुष अब बिलकुल नहीं उगता। बिजलियाँ भी कम पड़ने लगीं। भगवान् विष्णु की नींद टूटी। जल पिघले हुए वैदूर्य के समान निर्मल हो गया। इन्द्र की आज्ञा से बरसने वाले मेघ बर्फ की भाँति इधर-उधर भटकने लगे। कदम्ब के पेड़ झड़ने लगे। कुटज पुष्पों में फूल नहीं रह गए। कन्दल के वृक्षों में कलियों का निकलना बंद हो गया। कमल खिलने लगे। नीले कमल मकरन्द की वर्षा करने लगे। उजले कमल आह्लादित होने लगे। शेफालिका के फूल खिल खिलकर रात को ठंडी करने लगे। जूही की गंध फैलने लगी। कुमुदों के खिलने से दिशाएँ उज्ज्वल हो गईं। सप्तपर्ण के वृक्ष की धूल से हवा कुछ मैली बहने लगी। लाल-लाल सुन्दर बन्धूक- पुष्प खिल कर असमय में सन्ध्या का दृश्य खड़ा करने लगे। युद्ध की यात्रा में घोड़ों के शान्तिकर्म होने लगे। हाथी मद से उन्मत्त होने लगे। साँड़ गर्वीले और पागल होकर डकारने लगे। जगह-जगह के कीचड़ सूखने लगे। कुछ-कुछ भींगी रेतों पर नदियों के
तृतीय उच्छ्वासः १३७ मञ्जरीरजसि, कठोरितत्रपुसत्वचि, कुसुमस्मेरशरे, शरत्समयारम्भे राज्ञः समीपाद्वाणो बन्धून्द्रष्टुं पुनरपि तं ब्राह्मणाधिवासमगात् । समुपलब्धभूपालसंमानातिशयपरितुष्टास्त्वस्य ज्ञातयः श्लाघमाना निर्ययुः । क्रमेण च कांश्चिदभिवाद्यमानः कैश्चिदभिवाद्यमानः, कैश्चिच्छिरसि चुम्ब्यमानः, कांश्चिन्मूर्ध्नि समाजिघ्रन्, कैश्चिदालिङ्ग्य- मानः, कांश्चिदालिङ्गन्, अन्यैराशिषानुगृह्यमाणः, पराननुगृह्णन्, बहु- बन्धुमध्यवर्ती परं मुमुदे । संभ्रान्तपरिजानोपनीतं चासनमासीनेषु गुरुषु भेजे । भजमानश्चादरादिसत्कारं नितरां ननन्द । प्रीयमाणेन च मनसा सर्वांस्तानपर्यपृच्छत्—'कच्चिदेतावतो दिवसान्सुखिनो यूयम् ? अप्रत्यूहा वा सम्यक्करणपरितोषितद्विजचक्रा क्रातवी क्रिया क्रियते ? यथावद्विक- लमन्त्रभाञ्जि भुञ्जते वा हवींषि हुतभुजः ? यथाकालमधीयते वा वटवः ? प्रतिदिनमविच्छिन्नो वा वेदाभ्यासः ? कच्चित्स एव चिरंतनो यज्ञविद्या- तजलम् । सिन्धवो नद्यः । श्यामाको नीवारः । प्रियङ्गुर्चाङ्गिभेदः । त्रपुसं लाडुकम् । सभ्रान्तः सत्वरः । सत्कारं पूजाम् । कच्चिदितीष्टप्रश्ने । प्रत्यूहो विघ्नः । सम्य- क्करणं यथाशास्त्रं संपादनम् । क्रतूनां यज्ञानामियं क्रातवी । अधीयत इति । नट बनने लगे । सावाँ के धान पककर कुछ-कुछ सूखने लग गए । कंगनी की मंजरियों में पराग भर आया । त्रपुष नामक फल के छिलके कड़े हो गए । शर नामक तृणों में फूल खिल उठे । तब बाण अपने बन्धु-बान्धवों को देखने के लिए फिर राजा के पास से ब्राह्मणों के उसी (प्रीतिकूट नामक) निवासस्थान में चला आया । सम्राट् के द्वारा अतिशय सम्मान पाकर पधारे हुए बाण को जब गाँव के भाई-बन्धुओं ने सुना तो अत्यन्त हर्ष के साथ उसके स्वागत के लिए प्रशंसा करते हुए निकल पड़े । बाण ने क्रम से कुछ का अभिवादन किया और कुछ से अभिवादित हुआ; कुछ ने उसका सिर चूमा और उसने कुछ के सिर सूँघे; कुछ ने उसका आलिङ्गन किया और कुछ से वह स्वयं गले मिला; दूसरों ने अपने आशीर्वादों से उस पर अनुग्रह किया और उसने भी कुछ लोगों को असीस कर अनुगृहीत किया । इस प्रकार बाण अपने बहुत से भाई-बन्धुओं के बीच आकर अत्यन्त हर्षित हुआ । परिजन दौड़े और शीघ्र आसन लाकर बिछा दिया । जब गुरुजन बैठ गए तब बाण भी एक आसन पर बैठा और परिजनों द्वारा पूजा- सत्कार पाकर बड़ा ही प्रसन्न हुआ । गद्गद मन से उसने सब लोगों से पूछा—'आप लोग इतने दिनों तक सुख से तो रहे ? ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करने वाले यज्ञ के कार्य शास्त्र
१३८ हर्षचरितम् कर्मण्यभियोगः ? तान्येव व्याकरणे परस्परस्पर्धानुबन्धाबन्ध्यदिवस- दर्शितादराणि व्याख्यानमण्डलानि, सैव वा पुरातनी परित्यक्तान्यकर्तव्या प्रमाणगोष्ठी, स एव वा मन्दीकृतेतरशास्त्ररसो मीमांसायामतिरसः ? कच्चित एवाभिनवसुभाषितसुधावर्षिणः काव्यालापाः ?' इति । अथ ते तमूचुः—'तात ! संतोषजुषां सततसंनिहितविद्याविनोदानां वैतानवह्निमात्रसहायानां कियन्मात्रं नः कृत्यं सुखितया सकलभुवनभुजि भुजङ्गराजदेहदीर्घे रक्षति क्षितिं क्षितिभुजे । सर्वथा सुखिन एव वयम् , विशेषेण तु त्वयि विमुक्तकौसीद्ये परमेश्वरपार्श्ववर्तिनि वेत्रासनमधिति- ष्ठति । सर्वे च यथाशक्ति यथाविभवं यथाकालं च संपाद्यन्ते विप्रजनो- वेदपाठो बालानामेवोचितः । प्रमाणं तर्कविद्या । मीमांसा ब्रह्मनिदर्शनम् । अत एवाह—अतिरस इति । तात इति पूजावचनम् । वैतानाः क्रातवाः । कौसीद्यमालस्यम् । निष्प्रयत्न- तेत्यर्थः । के अनुसार बिना किसी विघ्न-बाधा के तो होते रहे ? यज्ञ की अग्नियों में नियमानुसार मंत्र के साथ-साथ हविष भोजनार्थ तो मिल रहा है ? बटु लोगों का समय से अध्ययन तो चल रहा है ? वेदों का प्रतिदिन होने वाला अभ्यास विच्छिन्न तो नहीं होता ? यज्ञ- सम्बन्धी विद्या और कर्मों के प्रति वही पुराना भाव तो है न ? परस्पर एक दूसरे को जीतने की इच्छा से निरन्तर दिन को सफल करने वाले व्याकरण-शास्त्र के वे ही व्याख्यान मण्डल तो अब भी जम रहे हैं न ? दूसरे कार्यों को छोड़-छाड़ कर न्याय शास्त्र पर विचार करने वाली गोष्ठी तो वही पुरानी आज भी चल रही है न ? दूसरे शास्त्रों के रस को फीका कर देने वाले मीमांसाशास्त्र में रस तो वही मिलता है न ? नये-नये सुभाषितों की सुधा बरसाने वाले काव्यालाप तो वही हो रहे हैं न ?' तब वे बोले—'हे तात, जब समस्त भुवन पर शासन करने वाला और शेषनाग के समान दीर्घ शरीर वाला राजा सुखपूर्वक पृथिवी की रक्षा करने में संलग्न है तो थोड़े ही में सन्तोष कर लेने वाले, हमेशा विद्या के विनोद में लगे रहने वाले तथा केवल यज्ञ की अग्नि को अपना सहायक मानने वाले हम ब्राह्मणों का कार्य ही कितना है ? हम सब प्रकार से सुखी हैं, विशेष तो सुखी इसलिए हैं कि तुम आलस्य छोड़कर महाराजाधिराज हर्ष के नजदीक वेत्रासन पर विराजमान हो । अपनी शक्ति के अनुसार और अपने विभव के अनुसार हमलोग समय से ब्राह्मण के लिए उचित सब काम करते रहे हैं।' इस प्रकार बातें हुईं, स्कन्धावार के सम्बन्ध की चर्चा भी छिड़ी, लड़कपन में खेले हुए खेलों की याद
तृतीय उच्छ्वासः १३६
चिताः क्रियाकलापाः' इत्येवमादिभिरालापैः स्कन्धावारवार्ताभिश्च शैशवातिक्रान्तक्रीडानुस्मरणैः पूर्वजकथाभिश्च विनोदितमनास्तैः सह सुचिरमतिष्ठत् । उत्थाय च मध्यन्दिने यथाक्रियमाणाः स्थितिरकरोत् । भुक्तवन्तं च तं सर्वे ज्ञातयः पर्यवारयन् । अत्रान्तरे दुकूलपट्टप्रभवे शिखण्ड्यपाङ्गपाण्डुनी पौण्ड्रे वाससी वसानः स्नानावसानसमये वन्दितया तीर्थमृदा गोरोचनया च रचि- ततिलकः, तैलामलकमसृणितमौलिः, अनुच्चचूडाचुम्बिना निबिडेन कुसु- मापीडकेन समुद्भासमानः, असकृदुपयुक्तताम्बूलविरलाधररागकान्तिः, एकशलाकाञ्जनजनितलोचनरुचिः, अचिरभुक्तः, विनीतमार्यं च वेषं दधानः, पुस्तकवाचकः सुदृष्टिराजगाम । नातिदूरवर्तिन्यां चासन्यां निषसाद । स्थित्वा च मुहूर्तभिव तत्कालापनीतसूत्रवेष्टनमपि नख-
अत्रेत्यादौ । सुदृष्टिः पुस्तकवाचक आजगामेति संबन्धः । दुगूलेति । एकस्माद्दु- गूलपट्टाद्दीर्घाच्छित्त्वा गृहीते, शिखण्ड्यपाङ्गपाण्डुरत्वेन कार्कश्यमपि दर्शितम् । पौण्ड्रे पुण्ड्रदेशजे । गोरोचना रक्षाद्रव्यभेदः । मौलयः केशाः । अनुच्चेति । अदीर्घ- तया कुसुमापीडकस्य श्रोत्रियत्वं विनीतत्वं चास्य दर्शितम् । निबिडेन संहत- पुष्पेण । रुचिरं नैर्मल्यम् । भोजनं भुक्तमचिरं भुक्तं यस्य सः । अनेन तस्यानवखि- न्नसत्त्वमुक्तम् । आसन्द्यां वेत्रपीठिकायाम् । स्थित्वेत्यादौ । पुराणं पपाठेति संबन्धः ।
आई, पुराने लोगों की बातें चल पड़ीं । इस तरह बाण उन लोगों के साथ देर तक मन- बहलाव की बातचीत में बैठा रहा । मध्याह्न के समय उठकर उसने सबकी भाँति स्नान- ध्यान किए । तत्पश्चात् भोजन के बाद ही सबके सब भाई-बन्धु फिर उसे घेर कर बैठ गए । इसी बीच बाण का पुस्तक-वाचक सुदृष्टि वहाँ आ पहुँचा । वह पुंड्र देश के बने दुकूल-पट्ट के थान में से तैयार किए, मोर की आँखों के कोने की भाँति दो श्वेत वस्त्र पहने था । स्नान करने के बाद उसने माथे पर मंत्र से पवित्र तीर्थ की मिट्टी और गोरोचना से तिलक लगाया था । उसके सिर के बालों में आँवले के तेल की मालिश से चिकनाहट थी । लटकती हुई शिखा से लगी हुई फूलमाला से वह शोभित हो रहा था । हमेशा पान चबाते रहने से उसके अधर की कांति खिल उठी थी । उसकी आँखों में अंजन की बारीक रेखा खिंची हुई थी । वह अभी-अभी भोजन करके उठा था । उसका वेष विनय से भरा हुआ और सौम्य था । वह कुछ दूर रखे हुए बेंत के आसन पर बैठ गया । क्षण भर ठहर कर तत्काल उसने सूत की बेठन खोल दी, फिर भी उसके नखों की किरणें पुस्तक में सह
१४० हर्षचरितम् किरणैर्मृदुमृणालसूत्रैरिवावेष्टितं पुस्तकं पुरोनिहितशरशलाकायन्त्रके निधाय, पृष्ठतः सनीडसंनिविष्टाभ्यां मधुकरपारावताभ्यां वांशिकाभ्यां दत्ते स्थानके प्राभातिकप्रपाठकच्छेदचिह्नीकृतमन्तरं पत्रमुत्क्षिप्य, गृहीत्वा च कतिपयपत्रलघ्वीं कपाटिकाम्, क्षालयन्निव मषीमलिनान्य- क्षराणि दन्तकान्तिभिः, अर्चयन्निव सितकुसुममुक्तिभिर्ग्रन्थम्, मुख- संनिहितसरस्वतीनूपुररवैरिब गमकैर्मधुरैराक्षिपन्मनांसि श्रोतॄणां गीत्या पवमानप्रोक्तं पुराणं पपाठ । तस्मिंश्च तथा श्रुतिसुभगगीतिगर्भं पठति सुदृष्टौ नातिदूरवर्ती बन्दी सूचीबाणस्तारमधुरेण गीतिध्वनिमनुवर्तमानः स्वरेणेदमार्या- युगलमगायत्— 'तदपि मुनिगीतमतिपृथु तदपि जगद्व्यापि पावनं तदपि । सनीडे समीपे । प्रपाठको वाचकः, प्रपठन वा । तस्य तत्र वा छेदः । इयन्मात्रं वाचितं नान्यदिति तेन चिह्नीकृतं लक्ष्यीकृतम् । गमयन्ति रागस्वरूपमिति गमकाः । असाधारणानि स्वराणां निमीलनानि । यानि लक्ष्यज्ञैष्वान्तरमार्ग इति प्रसिद्धास्तैर्गमकैः स्वरयति विशेषैः । पवमानो वायुः । बन्दी स्तुतिपाठकः । पृथुरादिनृपोऽपि । पवमानं वायुप्रोक्तमपि । गीतपक्षे— वंशेन वेणुनानुगमो ययोस्तौ विवादिनौ स्वरौ विश्रुत्यन्तरौ गान्धारनिषादौ स्वरौ यत्र तत् । करणमपदः । सताल आविद्धः स्वरसंनिवेशः, उच्चारणस्थानं वा । भारतं प्रकार फैल गई मानों मृणालसूत्रों में बाँधी गई हो । पुस्तक को उसने सरकण्डों के बने पीढ़े पर रख दिया । पीछे समीप में बैठे हुए मधुकर और पारावत नामक बंशी बजाने वाले बाण के दो मित्रों ने जब अवकाश दिया, तब सुदृष्टि ने प्रभात में पढ़े हुए विराम के बीच चिह्न के रूप में लगाए हुए पन्ने को निकाल कर कुछ पन्नों के साथ हल्की दफ्ती को उठा लिया और मानों अपने दाँतों की किरणों से स्याही के अक्षरों को धोता हुआ, या अपनी मुस्कान के फूलों से ग्रन्थ की अर्चना करता हुआ, गमक नामक स्वरों से मुख में सन्निहित सरस्वती के नूपुरों की आवाज का अनुकरण करके गीत के द्वारा सुनने वालों के मन को रमाता हुआ वायुपुराण का पाठ करने लगा । उस प्रकार जब सुदृष्टि मधुर गीत के साथ साथ पाठ कर रहा था, तभी सूचीबाण नामक बन्दी ने ऊंचे स्वर में उसी गीत की लय का अनुकरण करते हुए दो आर्या-छन्दों का गान किया— वायु-पुराण मुनि व्यास द्वारा गीत है, अत्यन्त बड़ा भी, जगत् में विख्यात भी और
तृतीय उच्छ्वासः १४१ हर्षचरितादभिन्नं प्रतिभाति हि मे पुराणमिदम् ॥ ३ ॥ वंशानुगमविवादि स्फुटकराणं भरतमार्गभजनगुरु । श्रीकण्ठविनिर्यातं गीतमिव हर्षराज्यमिव ॥ ४ ॥ तच्छ्रुत्वा बाणस्य चत्वारः पितामहमुखपद्मा इव वेदाभ्यासपवित्रित- मूर्तयः, उपाया इव सामप्रयोगललितमुखाः, गणपतिः, अधिपतिः, तारा- पतिः, श्यामल इति पितृव्यपुत्रा भ्रातरः, प्रसन्नवृत्तयः, गृहीतवाक्याः, कृतगुरूपदन्यासाः, न्यायवादिनः, सुकृतसंग्रहाभ्यासगुरवो लब्धसाधु- भरतमुनिकृतो ग्रन्थः । श्रीकण्ठः श्रीयुक्तः कण्ठः वैस्वर्यादिदोषाभावात् । यद्वा,- श्रीकण्ठो हर एव सर्वविद्यानां तत एवोत्पत्तेः । हर्षराज्यमपीदृशमेव । तथा च वंशं कुलमनुगच्छत्यनुसरति यत्तद्वंशानुगम् । तथाविद्यमाना विवादिनो यत्र तद्विवादि सौराज्यम् । न केचित्तत्र विवदन्ते । करणमधिकरणं यत्र विद्यापरीक्षा धर्मनिर्णयो वा क्रियते, व्यापारो वा । भरतो नाम पूर्वं राजाभूत् । श्रीकण्ठो देश- भेदः। गीतमपि हर्षस्य प्रमोदस्त्य राज्यमिव । तस्य विजृम्भमाणत्वात् । तच्छ्रुत्वेत्यादौ। बाणस्य चत्वारो भ्रातरः परस्परस्य मुखानि व्यलोकयन्निति संबन्धः । तच्छ्रु- त्वेत्यादिनास्य प्रकरणस्य प्रकृतानुगुणत्वं दर्शितम् । तेषां च प्रस्ताववेदित्वम् । मुखपद्मा अपि चत्वारः सामवेदभेदाः । सान्त्वं च मुखमारम्भोऽपि । प्रसन्ना शुद्धा, सुबोद्धा च । वृत्तिर्वर्तनम् , सूत्रविवरणं च । गृहीतमादृतम् , ज्ञातार्थं च । वाक्यं विवरणम् , वार्तिकं च । यत्करणात्कात्यायनो वार्तिककार उच्यते । कृतो गुरूणां संबन्धिनि पदे स्थाने न्यासः स्थितियेषां ते । सर्वेणोपदेष्टृपदे स्थापितास्त इत्यर्थः । यद्वा;—कृतो गुरुणि पदे न्यासो यैः । महति पदे स्थिता इत्यर्थः । अन्यत्र,-कृतोऽ भ्यस्तो गुरुपदे दुर्बोधशब्दे न्यासो वृत्तिविवरणं यैः । न्यायो युक्तम् , उपपत्य- नुपपत्तिविचारश्च । सुकृतं पुण्यम् , सुष्ठु विहितं च । संग्रहः संचयः, व्याकरणे पवित्र भी हैं, फिर भी यह पुराण मेरी समझ में हर्षचरित से अभिन्न ही प्रतीत हो रहा है॥३॥ यह गीत हर्ष के राज्य के समान है । गीत वंशी वाद्य से अनुगत तथा राज्य वंश- परम्परागत है । गीत में दो परस्पर विरोधी गान्धार और निषाद स्वर नहीं हैं तथा राज्य में कोई विवाद करने वाला विद्रोही नहीं है । गीत के ताल और लय बिलकुल स्पष्ट हैं तथा राज्य के करण अर्थात् विद्यापरीक्षा या धर्मनिर्णय के स्थान प्रसिद्ध हैं । गीत संगीतशास्त्र के रचयिता भरत मुनि द्वारा प्रदर्शित मार्ग के अनुसार होने से महनीय है तथा राज्य भरत नामक प्राचीन राजा की नीति का अनुसरण करने से महनीय है । गीत मधुर कंठ से निकला हुआ है तथा राज्य श्रीकंठ नामक स्थान से निकला हुआ है ॥४॥ दोनों आर्याओं को सुन कर बाण के चचेरे भाई—गणपति, अधिपति, तारापति
१४२ हर्षचरितम् शब्दा लोक इव व्याकरणेऽपि सकलपुराणराजर्षिचरिताभिज्ञाः, महाभारत- तभावितात्मानः, विदितसकलेतिहासाः, महाविद्वांसः, महाकवयः, महापुरुषवृत्तान्तकुतूहलिनः, सुभाषितश्रवणरसरसायनाः, वितृष्णाः, वयसि वचसि यशसि तपसि सदसि महसि वपुषि यजुषि च प्रथमाः, पूर्वमेव कृतसंगराः, विवक्षवः, स्मितसुधाधवलितकपोलोदराः, परस्परस्य मुखानि व्यलोकयन् । अथ तेषां कनीयान्कमलदलदीर्घलोचनः श्यामलो नाम बाणस्य व्याडिकृतो ग्रन्थश्च । गुरवो महान्तः, उपाध्यायाश्च । साधुशब्दः साधुवादः, साधवोऽमी इत्येवंरूपो वा । साधवः संस्कृताः, शब्दाश्च । पाण्डित्यप्रकटनेनानेन द्रष्टुमिष्टस्य वस्तुन उत्कृष्टतोच्यते । सकलेत्यादिविशेषणत्रयेण द्विजराजादिवृत्तान्तेऽ- भिज्ञतोच्यते । महापुरुषेत्यादि । हर्षचरिते शुश्रूषाया हेतुः । सुभाषितेत्यादि । स्वकाव्यप्रशंसासूचनपरम् । सदसि सभायाम् । संगरं संकेतं । कनीयानिति । अनेन प्रियवचनत्वमस्य दर्शितम् । ब्रूहीति दत्तसंज्ञः । तात और श्यामल एक दूसरे को देखने लगे । ब्रह्मा के चार मुख-कमलों की भांति वे वेदाभ्यास करने से पवित्र थे । साम-दान आदि चार उपायों के समान साम अर्थात् सान्त्वनापूर्ण वचन या सामवेद का प्रयोग करने से उनके मुख सुन्दर थे । लोक के समान व्याकरण में भी उनकी वृत्ति अर्थात् जीविका शुद्ध थी या वृत्ति अर्थात् सूत्र के विवरण में सुबोध थे, वाक्य अर्थात् वचन का आदर करते थे या वाक्य अर्थात् वार्तिकों के अर्थ का ज्ञान रखते थे, गुरु पद अर्थात् श्रेष्ठ स्थान पर प्रतिष्ठित थे या उन्होंने दुर्बोध पदों में न्यास अर्थात् वृत्ति का अभ्यास किया था, न्याय अर्थात् युक्ति की बात बोलते थे या उपपत्ति और अनुपपत्ति का विचार रखते थे, पुण्य के संगृहीत करने के अभ्यास में प्रवीण थे या व्याडि द्वारा सुविरचित संग्रह नामक ग्रन्थ का अध्यापन करते थे, उन्हें साधुवाद प्राप्त थे या संस्कृत शब्दों का उन्होंने अभ्यास कर लिया था । समस्त पुराणों में आए हुए राजर्षियों के चरित उन्हें ज्ञात थे । उन्होंने महाभारत का अनुशीलन किया था । वे इतिहास के पंडित थे । महाविद्वान् और महाकवि थे । महापुरुषों के वृत्तान्त को सुनने के लिए उनके मन में विशेष कुतूहल था । सुभाषित के रस के वे रसायन थे ( अर्थात् सुभाषितों को सुना कर आनन्दित करते थे) । उनमें तृष्णा बिलकुल न थी । वचन में, अवस्था में, यश में, तप में, सभा में, तेज में, शरीर में, यज्ञ में सर्वत्र उनकी सबसे पहले गणना होती थी । वे पहले से ही परामर्श करके वहाँ आए थे और कुछ बोलना चाहते थे । मुसकान की सुधा से उनके कपोलों के मध्यभाग धवलित हो गए थे । तत्पश्चात् उन चारों में सबसे छोटा, कमल के समान बड़ी-बड़ी आँखों वाला श्यामल,
तृतीय उच्छ्वासः १४३ प्रेयान्प्राणानामपि वशयिता दत्तसंज्ञस्तैः सप्रणयं दशनज्योत्स्नास्नापित- ककुभा मुखेन्दुना बभाषे—'तात बाण ! द्विजानां राजा गुरुदारग्रहण- मकार्षीत् । पुरूरवा ब्राह्मणधनतृष्णया दयितेनायुषा व्ययुज्यत । नहुषः परकलत्राभिलाषी महाभुजङ्ग आसीत् । ययातिराहितब्राह्मणी पाणि- बाणेत्यादिना पूर्वराजदोषोद्भावनद्वारेण हर्षस्य गरीयस्तां ख्यापयति । अत्र क्वचि- च्छब्दद्वारेण क्वचिच्चार्थद्वारेण यथायोग्यं दोष उद्भाव्यः । चन्द्रादिशब्दाभिधानेन राजत्वप्रतीतिर्न स्यादिति द्विजानां राजेत्युक्तम् । गुरुर्बृहस्पतिः, पित्राद्याश्च गुरवः । अत्र कथा—पुरा पूर्णचन्द्रमुदितं वीक्ष्य कामयमानां गुरुपत्नीं ताराख्यामभिगच्छत् । तदसहमानेन च बृहस्पतिना यदेन्द्राद्याः प्रोत्साहितास्तदानयनाय, तदा चन्द्रेण शुक्रः शरणमाश्रितः । ततः शुक्रप्रेरितैर्दैत्यैः सह तेषामन्योन्यं दिव्यं वर्षसहस्रं युद्धमासीत् । तारापि नारदबोधिता सगर्भा सती पुनर्गुरुमेवाभिगतेति । दयितेना- युषा प्रियेण जीवितेन पुत्रेणायुर्नाम्ना । कथा चात्र—पुरूरवाः पूर्वां दिशं जेतुं गच्छ- न्केनाप्याहृतप्रभूतधनेन विप्रेण यज्ञे निमन्त्रितो लोभाच्चिस्तस्तद्धनं जिहीर्षुस्तच्छा- पान्नष्टः । तस्मिन्मृते स विप्रो नृपं विना प्रजा निवर्तेत इति ज्ञात्वा तदायुषा राजर्षिमायुर्नामानमजीजनदिति । भुजङ्गो विटोऽपि । पुरा वृत्रं हत्वा ब्रह्महत्यया शक्रः पलाय्य मृणालच्छिद्रान्तरे यदातिष्ठत्तदा नहुषो यज्वा शूरैश्च देवैरिन्द्रत्वं नीतो दर्पाच्छचीं प्रार्थयमानो बृहस्पत्युपदेशात्तयोक्तो यथा—‘यानेनापूर्वेणागच्छ' इति । ततो ब्रह्मर्षीन्वाहनीकृत्य व्रजन्कामवशाच्चरयमाणः पादेनाताड्य, ‘सर्प सर्प' इति चोदयन्नगस्त्येन ‘सर्पो भव' इति शप्तः सर्पोऽभवत् । पपातेति नरकगामी बभूव, स्वाचारभ्रष्टत्वात्पतितश्चाभूत् । वृषपर्वणोऽसुरराजस्य दुहित्रा शर्मिष्ठया कल- हायमाना ‘अस्मद्भृत्यसुता वराकी भूत्वा स्पर्धते' इत्युक्त्वा कूपान्तःपातितां शुक्र- सुतां देवयानीं ज्ञात्वा ययातिर्वनविहारी पाणिं गृहीत्वोजहार । गते ययातौ परि- भवोद्विग्ना वन एवावसत् । अथ नारदाद्यथावृत्तं ज्ञात्वा वृषपर्वा शुक्रस्य प्रार्थनामक- जो बाण के प्राणों को भी वश में रखने वाला प्रिय था, बड़ों का इशारा पाकर अपने मुखचन्द्र से प्रवाहित होने वाली दाँतों की चाँदनी से दिशाओं को नहलाता हुआ बोला—'तात बाण, द्विजों के राजा चन्द्र ने गुरुपत्नी तारा का गमन किया । पुरूरवा ब्राह्मण के धन को लोलुपता के कारण अपनी प्रिय आयु से वियुक्त हो गया । नहुष पराई स्त्री की इच्छा करने के कारण महालम्पट बना । ययाति ब्राह्मणकन्या के साथ विवाह करके पतित हुआ । राजा सुद्युम्न तो स्त्रीरूप ही बन गया था । जन्तु ( जन्तु नामक पुत्र या प्राणियों ) के वध करने से राजा सोमक की निर्दयता तो प्रसिद्ध ही है । राजा मान्धाता मार्गण अर्थात् याचना या युद्ध के व्यसन के कारण पुत्र-पौत्रों के साथ रसातल
१४४ हर्षचरितम् ग्रहणः पपात । सुद्युम्नः स्त्रीमय एवाभवत् । सोमकस्य प्रख्याता जगति जन्तुवधनिर्घृणता । मांधाता मार्गणव्यसनेन सपुत्रपौत्रो रसातलमात् । पुरुकुत्सः कुत्सितं कर्म तपस्यन्नपि मेकलकन्यायामकरोत् । कुवलयाश्वो रोत् । संदिष्टा च—'कुमारी शतपरिवारवतीयं शर्मिष्ठा यदा मे दास्यं करोति तदा- गच्छामि' इति । शुक्रशापभीतेन वृषपर्वणा संपादितमनोरथा देवयानी पुनरपि दासीभूतया शर्मिष्ठया सह वने क्रीडन्ती ययातिमायान्तं दृष्ट्वा बभाषे—'क्वाद्य मां त्यक्त्वा पाणिग्राहो महानुभावो गतोऽभूत्' इति । ततो ययातिर्ब्राह्मणीत्वादनाङ्गी- कुर्वंस्तत्पित्रा शोकविधुरेण शुक्रेण 'पापं मास्तु, क्रियतामयं विधिः' इति बुद्ध्या तां स्वीचक्रे । कालेन चासौ पपातेति । सुद्युम्नो राजा, शोभनं द्युम्नं बलमस्येति च स्त्री- मयो महिलाकृतिः, कान्तानुरक्तश्च । योऽत्र तोयमुपयोक्ष्यति स स्त्रीत्वमापत्स्यत इति भगवता भवान्याभ्यर्थितेन भवेन शप्तः सन्ससरः पीत्वा तोयं सुद्युम्नो मृगया- विहारी स्त्रीमयोऽभूदिति । जन्तुर्नाम सोमकस्य राज्ञः पुत्रः, जन्तवः प्राणिनश्च । सोमकस्य राज्ञो जन्तुर्नामैकः पुत्रोऽभूत् । स चैकपुत्रत्वादपुत्रत्वं वरमिति जानद्म- द्विप्रैः पुरोधसाम्यधायि—'बहुपुत्रांश्चेदच्छसि तदास्य सुतस्य वपया होमः क्रिय- ताम् । ततो यावत्यो धूममाजिघ्रन्ति ताः पुत्रैर्युज्यन्ते' इति । स चापि घृणामपहाय तथा कारितवानिति । मार्गणं याच्ञा, शराश्च मार्गणाः । मार्गणेषु व्यसनं युद्धं व्यसनम् । रसातलंगमदधस्ताज्जगाम । विनष्ट इत्यर्थः । रसातलं पातालं च । मांधाता च भुवं जित्वा स्वर्गं जेतुं गतः । शकेणोक्तम्—'पातालं जित्वागतस्य तव दास्यं यास्यामि' । स च तद्वचनादविचार्यैव रसातलं गतस्तत्र हरप्रसादासादित- त्रिशूलेन लवणानाम्ना दानवेन ससुतसैन्योऽन्तमनीयत' इति । मेकलकन्या नर्मदा । पुरुकुत्सः पुरा तपश्चरन्नर्मदायां स्नानं कुर्वन्कामप्यञ्जनामालोक्य कामाविष्टो नीतिमत्ससर्जेति । भुजङ्गाः सर्पाः, विटा अपि । अश्वतरकन्यां वडवामपि । कुवल- याश्वो राजा मृगयाक्रीडाप्रसङ्गेन घर्मातुरो मज्जनरभसेन सरसीमवतीर्णो रसातलं प्राप्तोऽश्वतराभिधां नागकन्यामूढवानिति । प्रथम आद्यः, प्रधानश्च । कुत्सितः पुरुषः में चला गया (अर्थात् पतित हुए या पाताल में पहुँचे और मारे गए)। राजा पुरुकुत्स ने तपस्या के अवसर में किसी सुन्दरी को देखकर नर्मदा में स्नान करते हुए कुत्सित कर्म किया । राजा कुवलयाश्व ने भुजंगलोक में जाकर ( लम्पट लोगों की प्रेरणा से या नागलोक में जाकर ) अश्वतरा नामक नागकन्या (या घोड़ी) को भी नहीं छोड़ा। आदिराज पृथु पहला कुत्सित पुरुष है जिसने पृथिवी को अभिभूत किया। राजा नृग गिरगिट बनने पर भी वर्णसंकर (अर्थात कई रंग की मिलावट या कई ब्राह्मण क्षत्रिय आदि वर्णों के वीर्य से उत्पन्न) ही बना रहा। सौदास नामक राजा ने व्याकुल पृथिवी
तृतीय उच्छ्वासः १४५ भुजङ्गलोकपरिग्रहादश्वतरकन्यामपि न परिजहार । पृथुः प्रथमपुरुषऋः परिभूतवान्पृथिवीम् । नृगस्य कृकलासभावेऽपि वर्णसंकरः समदृश्यत । सौदासेन नरक्षिता पर्याकुलीकृता क्षितिः । नलमवशाक्षहृदयं कलि- रभिभूतवान् । संवरणो मित्रदुहितरि विप्लवतामगात् । दशरथ इष्टरा- पुरुषऋः । पृथुरादिनृपो भूधराक्रान्तां सर्वां गां विलोक्य चापकोट्या गिरीन् भुवः पर्यन्तेषु चिक्षेप । धरणकारणभूतभूभृत्परिभवाद्भवो विभवः । अत एवास्य कापुरुषत्वम् । विष्णुपुराणे तु—आकृष्टकार्मुकेन पृथुना 'देहि मे भर्त्तव्यभरणो- पायम्' इत्यनुबध्यमाना भूर्भुवनानि बभ्राम । ततः शरणमलब्ध्वा सास्य सर्वाः सस्यसंपदोऽजनयदि्रति वर्णितम् । एतस्मात्परिभूताऽभूदिति । कृकलासः प्राणिभेदः । तद्भावेऽपि तस्यां दशायामपि किं पुन राज्यस्थस्येति निन्द्यत्वम् । वर्णः शुक्लादिः, ब्राह्मणादिश्च । नृगो राजा दानप्रस्तावे कस्यचिद्विप्रस्य संबन्धिनीं गामविज्ञायैवान्यस्मै द्विजाय ददौ । कदाचिच्च तस्या गोः स्वामी तां गां परिज्ञाय तं ययाचे । न च तस्माद्गां लेभे । ततस्तौ द्वावपि राजद्वारं राजविज्ञापनाय गतौ । ग्राम्यभोगासक्तराजदर्शनमलभमानौ च क्रोधात् 'कृकलासो भव' इति राज्ञः शापं दत्त्वा कस्मैचिद्गां वितीर्य यथागतं प्रतिजग्मतुरिति । नरान्निक्षोतीति नरक्षिता, न पालिता च । सौदासो नाम राजा मृगयासक्तः पथि गच्छन्कदाचिन्मुनिं शक्त- नामानं मार्गमध्ये स्थितम् 'अपसर्प' इत्यवदत् । 'पन्था देयो ब्राह्मणाय' इति वचनान्न्यायमनुवर्तमानो यावन्न चलितस्तावद्राज्ञा कशयाभिहतः । अथ रोषावे- शात् 'गच्छ मनुष्यभक्ष्यो राक्षसो भव' इति तं शशाप । वशमायत्तम् । अक्षहृदय- मक्षज्ञानम् , अक्षाणीन्द्रियाणि हृदयं च । तच्च नलो राजा द्यूतव्यसनी तत्स्वरूपान- भिज्ञश्च कलिनाभिभूत इति प्रसिद्धम् । मित्रो रविः, सुहृच्च मित्रम् । तपती नाम मित्रस्य रवेर्दुहिताभूत् । तस्यां संवरणो नाम राजा व्यसनी बभूव । रामो दशरथ- सुतः, रामा स्त्री च । दशरथो मृगयासक्तो घटपूरणरवं श्रुत्वा बृंहितशङ्कया शब्द- पातिना शरेण मुनिपुत्रं व्यापादयत् । तेन च बोधितान्वयः पित्रोः समीपं तं निनाय । तद्वचनाच्छल्यमुद्धरति नृपे शिशुर्मृतः । अथ च सदारेण वृद्धतापसेन 'पुत्रादहमिव त्वमपि प्राप्स्यस्यन्तम्' इति शप्तो रामवियोगात्प्राणांस्तत्याजेति । गोनिमित्तं ब्राह्मणस्य जमदग्नेरतिपीडनम् । निधनमयासीत् । जामदग्न्येन हत की रक्षा नहीं की । जुआ के खिलाड़ी राजा नल को कलि ने अभिभूत कर दिया । संवरण नामक राजा ने तपती नामक (सूर्य या सुहृद) की पुत्री के प्रति अपनी कामवासना प्रकट की । राजा दशरथ ने अपने प्रिय पुत्र राम के विरहोन्माद (अथवा १० ह० च०
चतुर्थ उच्छ्वास: राज्यवर्धन व हर्ष जन्म तथा राज्यश्री विवाह
१४६ हर्षचरितम् मोन्मादेन मृत्युमवाप। कार्तवीर्यो गोब्राह्मणातिपीडनेन निधनम- यासीत् १। मरुत्त इष्टबहुसुवर्णकोऽपि देवद्विजबहुमतो न बभूव। शांतनु- इत्यर्थः। कार्तवीर्यो गवां कोटेरप्यधिकतरां धेनुमपहरन्मदद्भि व्यापादितवान्। अथ च तत्सुतेन रामेण क्रोधात्परशुच्छिन्नबाहुसहस्रोऽसौ सर्वक्षत्रियैः सह मृत्युं लेभे; इष्टः कृतः, अभिमतश्च। देवद्विजो बृहस्पतिः; अन्यत्र, —देवाश्च द्विजाश्चेति द्वन्द्वः। मरुत्तो नाम राजा बहुसुवर्णकाख्येन क्रतुनापि यक्ष्यमाणो देवपुरोधसम् 'मां याजय' इति याचमानस्तेन 'मनुष्योऽयमेव दृष्टः' इति। स चोपहसति धिषणे नारदेनोक्तो यथा—'गच्छ, अस्यैव भ्राता संवर्तको नाम प्रहगृहीतच्छद्मना वारा- णस्यां स्थितः। तं प्रार्थयस्व' इत्युक्त्वा च नारदोऽभ्रि विवेश। स च नारदोक्त- चिह्नस्तं भगवत्प्रमाणं कृत्वा निर्यान्तं परिज्ञाय बहुशो गालीर्ददतमप्यनुद्विजमानो याजनाय प्रार्थयामास। संवर्तकेन कथितं च—'नेदं तवोक्तं यावत्तं वक्ष्यामि। देवेभ्यश्च श्रुत्वा यज्ञभागो न दातव्यः' इति। राजा यथोक्तमनुतिष्ठंस्तेन योजितो देवद्विजस्य नाभिमतोऽभवदिति। अतिव्यसनादत्यन्तरागात्। वाहिनी नदी, सेना च। महाभिषः पुरा ब्रह्मसदसि गङ्गायाश्चामरग्राहिण्याश्चलितवाससोऽङ्गदर्श- नहृतहृदयः शृङ्गारपदानि वदन्ब्रह्मणा शप्तः, पतित्वा क्षत्रियगृहे शन्तनुर्नामाभूत्। गङ्गापि 'मत्कृतेऽयमिमां दशां प्राप्तः' इति मत्वा सखेदंमवतरन्ती धेनुहरणकुपित- वसिष्ठशापसंपन्नमनुष्यलोकावतरणदुःखितैर्वसुभिर्विदितवृत्तान्तैरभ्यधायि-'तत्र नृपे चेत्तव प्रीतिः, तद्द्वयं त्वय्येवोत्पत्स्यामहे। जातमात्राश्च वयं त्वया स्वजले क्षेप्सव्याः' इति। सा तु तथेत्यङ्गीकृत्य वने विहरन्तं प्रार्थयमानं शन्तनुमवोचत्—'यदहं करोमि तत्र त्वया निर्बन्धो न विधेयः। न चाहं त्वया जन्म प्रष्टव्या' इति। 'तथा' इति तेनाङ्गीकृतवता बहुतरं कालमरंस्त। अथ यः कश्चित्सूनुरुदपादि सर्वस्तया स्वजले क्षिप्तः। एवं सप्तस्वतीतेषु गङ्गामासेव्य निःसंतानोऽयं मा भूदिति मन्वानैः सप्तभिरेव वसुभिः कृतात्मसंनिधिर्भीष्मो जातः। ततस्तमपि जले क्षिपन्ती शन्तनुना निषिद्धा। तेन 'सापराधो भवान्' इत्युक्त्वा सा प्रति- प्रिय रामा अर्थात् पत्नी के उन्माद) से मृत्यु को प्राप्त किया। राजा कार्तवीर्य गौ के लिए ब्राह्मण को दुखी करने के कारण मारा गया। मरुत्त नामक राजा ने बहुसुवर्णक नामक यज्ञ किया फिर भी देवद्विज द्वारा (बृहस्पति द्वारा अथवा देवताओं और ब्राह्मणों द्वारा) सम्मान नहीं प्राप्त किया। व्यसन के अत्यन्त बढ़ जाने से राजा शन्तनु ने वाहिनी (गङ्गानदी या सेना) से वियुक्त होकर जंगल में अकेले भटकते हुए १. इतोऽग्रे—'रामो मनोभवभ्रान्तहृदयो जनकतनयामपि न परिरक्षितवान्' इत्यधिकः पाठः क्वचिदुपलभ्यते।
तृतीय उच्छ्वासः १४७ रतिव्यसनावेकाकी वियुक्तो वाहिन्या विपिने विललाप । पाण्डुर्वंनममध्य- गतो मत्स्य इव मदनरसाविष्टः प्राणान्मुमोच । युधिष्ठिरो गुरुभयविषण्ण- हृदयः समरशिरसि सत्यमुत्ससृष्टवान् । इत्थं नास्ति राजत्वमपकलङ्कमृते देवदेवादनुतः सर्वद्वीपभुजो हर्षात् । अस्य हि बहून्याश्चर्याणि श्रूयन्ते । तथा हि—अत्र बलजिता निश्चलीकृताश्चलन्तः कृतपक्षा क्षितिभृतः । अत्र प्रजापतिना शेषभोगिमण्डलस्योपरि क्षमा कृता । अत्र पुरुषोत्तमेन जगाम । ततस्तद्वियोगविधुरधीर्बहु विललापेति व्यसननिमित्तकः सेनया वियोगेन च विलापो विजिगीषोरनुचित एव । वनं तोयम् , विपिनं च । मदनः कामः, फलविशेषश्च मदनम् । पाण्डुर्वने मृगरूपया ब्राह्मण्या सह सुरतकर्मसक्तं मृगरूपं कर्दममाख्यं मुनिं शरेण जघान; तेन च म्रियमाणेन ‘स्त्रीसंभोगस्थो मरिष्यसि’ इति शप्तो माद्र्या सह स्मरार्तः क्रीडन्विपन्न इति । गुरोर्द्रोणाचार्यस्य भयेन, गुरुणा महता च त्रासेन । युधिष्ठिरो बलानि दग्धुमुद्यतं द्रोणाचार्यं रणमूर्धिन ‘अश्वत्थामा हतः’ इत्युक्त्वा पुत्रशोकाकुलमसत्येनासनुत्याजयदिति । इत्थमिति । इत्थं कृतयु- गादारभ्य कलिप्रारम्भपर्यन्तं राज्ञां नास्त्यपकलङ्कं राजत्वमिति । बलजिप्रजा- पतिमुखाः शब्दा राज्ञि यथार्था वेदितव्याः । बलं सैन्यम् , बलाख्यश्चासुरः । निश्चलीकृता इति सहायाभावाच्छत्रुषु यानं न विदधिर इति । अन्यत्र,—स्थावरत्वं लम्भिताः । पक्षाः सहायाः, पत्राणि च । क्षितिभृतो राजानः, गिरयश्च । प्रजा- पतिना राज्ञा, ब्रह्मणा च । शेषस्यावशिष्टस्य भोगिमण्डलस्य राजसमूहस्योपरि विषये क्षान्तिः कृता । अन्यत्र,—शेषाख्यस्य भोगिनो नागस्य मण्डलमाभोगस्तत्पृष्ठे भूमिनिर्हिता । पुरुषोत्तमो नरोत्कृष्टो राजा, हरिश्च । सिन्धुराजो सिन्धुदेशाधिपतिः, विलाप किया । मत्स्य के समान कामवासना से आविष्ट होने के कारण पाण्डु की जान गई । युधिष्ठिर ने गुरु द्रोणाचार्य से डर कर युद्ध की भूमि में सत्य का परित्याग कर दिया । इस प्रकार एकमात्र महाराजाधिराज हर्ष को छोड़ कर किसी राजा को कलंकरहित नहीं सुना है। उनके विषय में आश्चर्य की बहुत सी बातें सुनी जाती हैं। जैसा कि उन्होंने इन्द्र के समान अपने सैन्यबल से जीत कर शत्रु की ओर मिलने के लिए जाते हुए राजाओं के सहायकों को मार कर निश्चल कर दिया ( बल नामक असुर को जीतने वाले इन्द्र ने भी पर्वतों के पंख काट-काट कर उन्हें निश्चल बना दिया) । प्रजापति हर्ष ने बचे हुए भोगिमण्डल अर्थात् राजाओं के ऊपर क्षमा की ( और उसी प्रकार ब्रह्माजी ने भी शेषनाग के फनों पर क्षमा अर्थात् पृथिवी को आरोपित किया) । पुरुषों में श्रेष्ठ हर्ष ने सिन्धुराज के मद का मथन करके उसकी राजलक्ष्मी को अपना किया
[Page Header] १४८ हर्षचरितम्
[Main Text] सिन्धुराजं प्रमथ्य लक्ष्मीरात्मीकृता। अत्र बलिना मोचितभूभृद्वेष्टनो मुक्तो महानागः। अत्र देवेनाभिषिक्तः कुमारः। अत्र स्वामिनैकप्रहार- प्रपतितारातिना प्रख्यापिता शक्तिः। अत्र नरसिंहेन स्वहस्तवविशसिता- रातिना प्रकटीकृतो विक्रमः। अत्र परमेश्वरेण तुषारशैलभुवो दुर्गाया गृहीतः करः। अत्र लोकनाथेन दिशां मुखेषु परिकल्पिता लोकपालाः,
[Sanskrit Commentary] क्षीरोदधिश्च। लक्ष्मीरच्छत्रचामरादिरूपा, देवताकृतिश्च। बलिना बलवता, असु- रेश्वरेण च भूभृद्राजा श्रीकुमाराख्यः। श्रीकुमारो नाम राजा किल दर्पशातेनोपजात- मदेन हस्तिना वेष्टितः। ततः श्रीहर्षेणाकृष्य खड्गं तस्मान्मोचितोऽसौ दन्ती च रोषाद्वने परित्यक्त इति वार्ता। भूभृच्च पर्वतो मन्दराख्यः। महानागो दर्प- शातः, वासुकिश्च। मोचितभूभृद्वेष्टनोऽमृतमन्थनार्थे। मन्थनार्थे कुमारः कुमार- गुप्ताख्यः, कुमारो वा यो दर्पशातान्मोचितः। कुमारो गुहः, पुत्रश्च कुमारः। स्वामी प्रभुः, कुमारश्च। अरातयः शत्रवः, तारकश्चासुराधिपतिः। शक्तिः सामर्थ्यम्, आयुधभेदश्च। नरसिंहः उत्तमो नरः, नृसिंहरूपो हरिश्च। सहस्तेनेति। न तु साधनबलेन। अन्यत्र तु चक्रादिनिजायुधेन। परमेश्वरेण सार्वभौमेन। न तु मण्डलमात्रस्य भोक्त्रा हरेण। दुर्गाया दुर्गमायाः, गौर्याश्च। करो दण्डः, पाणिश्च। लोकनाथो राजा, हरिः, बुद्धश्च। दिशां मुखेषु सीमासु। लोकनाथाः (लोकपालाः)
[Hindi Translation] (और पुरुषोत्तम कृष्ण ने सिन्धुराज अर्थात् क्षीरसागर को मथकर लक्ष्मी को अपनाया)। पराक्रमी हर्ष ने अपने महाग़ज दर्पशात को श्रीकुमार नामक राजा को सूंड में लेकर दबोचते हुए देख कर छुड़ाया और उसे जंगल में छुड़वा दिया (और दैत्यराज बलि ने महानाग वासुकि को मन्दराचल से लिपट कर समुद्रमंथन के बाद छोड़ दिया)। देव हर्ष ने कुमार का अभिषेक किया (और देवराज इन्द्र ने कुमार कार्तिकेय को सेनापति के पद पर अभिषिक्त किया)। स्वामी हर्ष ने एक ही प्रहार से शत्रुओं को मार गिरा कर अपनी शक्ति का परिचय दिया (और स्वामी कार्तिकेय ने एक ही प्रहार से तारकासुर का वध करके अपनी शक्ति (अस्त्रविशेष) प्रसिद्ध कर दिया)। नरों में केसरी हर्ष ने अपने भुजबल से शत्रु को मार कर अपना पराक्रम दिखाया (और भगवान् नृसिंह ने भी शत्रु हिरण्यकशिपु के वक्ष को अपने हाथों से फाड़कर अपना पराक्रम दिखाया)। परमेश्वर हर्ष ने हिमालय के दुर्गम प्रदेश के राजाओं से भी कर लिया (और परमेश्वर शिव ने हिमालय की पुत्री पार्वती का करग्रहण किया)। राजा हर्ष ने प्रत्येक दिशा में प्रजापालकों को देखभाल के लिए नियुक्त किया (और प्रजापति ब्रह्मा ने भी इन्द्र आदि लोकपालों को प्रत्येक दिशा की रक्षा के लिए नियुक्त किया)। समस्त धन के भाण्डागारों
तृतीय उच्छ्वासः १४६ सकलभुवनकोशश्चाग्रजन्मनां विभक्तः, इत्येषमादयः प्रथमकृतयुगस्येव दृश्यन्ते महासमारम्भाः । अतोऽस्य सुगृहीतनाम्नः पुण्यराशेः पूर्वपुरुष- वंशानुक्रमेणादितः प्रभृति चरितमिच्छामः श्रोतुम् । सुमहान्कालो नः शुश्रूषमाणानाम् । अयस्कान्तमणय इव लोहानि नीरसनिष्ठुराणि क्षुल्ल- कानामप्याकर्षन्ति मनांसि महतां गुणाः, किमुत स्वभावसरसमृदूनी- तरेषाम् । कस्य न द्वितीयमहाभारते भवेदस्य चरिते कुतूहलम् ? आचष्टां भवान् । भवतु भार्गवोऽयं वंशः शुचिनानेन पुण्यराजर्षिचरित- श्रवणेन सुतरां शुचितरः, इत्येवमभिधाय तूष्णीमभूत् । बाणस्तु विहस्याब्रवीत्—आर्य ! न युक्त्यनुरूपमभिहितम् । अघट- मानमनोरथमिव भवतां कुतूहलमवकल्पयामि । शक्याशक्यपरिसंख्या- नशून्याः प्रायेण स्वार्थतृषः । परगुणानुरागिणी प्रियजनकथाश्रवणरस- सीमापतयः, इन्द्राद्या दिक्पालाश्च । कोशो(गञ्जं) धनसंचयः मध्यम् , ग्रन्थभेदश्च । अग्रजन्मानो द्विजाः, आदिनृपाः, श्रमणाश्च । एवमादय इति । न ह्येतावन्त एव । प्रथमकृतयुगस्येवेति । पर्वतपक्षशातनादयो वृत्तान्ता अभवन् । मणय इवेति । मणिशब्देनोपमेयानां गुणानां रत्नत्वमुक्तम् । लोहान्यपि नीरसनिष्ठुराणि । क्षुल्लकाः खलाः । बाला इत्यन्ये । आचष्टामाख्यातु । भार्गव इति भृगुगोत्रत्त्वम् । अवकल्पयामि निश्चिनोमि । शक्तमिदमित्येवंरूपेण परिसंख्यानेन गणनया स्वार्थतृषो गृध्नवः, शून्याः । शक्याशक्यविवेकं गृध्नवो न जानन्तीत्यर्थः । बहु- को उन्होंने ब्राह्मणों को अर्पित कर दिया ( और लोकपाल भगवान् बुद्ध ने भी कोश नामक ग्रन्थ को विभक्त करके श्रमणों को अर्पित किया ) । इत्यादि सत्युग के समान उनके अनेक महान् कार्य दिखाई पड़ते हैं । इसलिए प्रातःस्मरणीय पुण्यों के राशि देव हर्ष का चरित पूर्वपुरुषों की परम्परा के साथ हम सुनना चाहते हैं । बहुत दिनों से हम लोगों की यह इच्छा बनी है। महापुरुषों के गुण क्षुद्र लोगों के नीरस और निष्ठुर मन को इस प्रकार खींच लेते हैं जैसे चुम्बक लोहे को, और जो स्वभाव से ही सरस और कोमल स्वभाव के लोग हैं उनकी तो बात ही क्या ? दूसरे महाभारत के समान उनके चरित को सुनने के लिए किस के मन में कुतूहल न होगा ? अतः आप कहें । यह भार्गववंश उस पुण्यवान् राजर्षि का पवित्र चरित सुन कर और भी पवित्र बन जाय ।' यह कह कर वह चुप हो गया । बाण ने हँस कर कहा—'आर्य आपने युक्तिसंगत बात नहीं कही । मेरा निश्चय है कि इस कुतूहल में आपका मनोरथ सिद्ध न होगा । प्रायः ऐसा देखा जाता है कि स्वार्थ
१३० हर्षचरितम् रभसमोहिता च मन्ये महतामपि मतिरपहरति प्रधिवेकम् । पश्यत्वार्य्यः- क परमाणुपरिमाणं बटुहृदयम्, क समस्तब्रह्मास्तम्भव्यापि देवस्य चरितम् ? क परिमितवर्णवृत्तयः कतिपये शब्दाः, क संख्यातिगा- स्तद्गुणाः ? सर्वज्ञस्याप्ययमविषयः, वाचस्पतेरप्यगोचरः, सरस्वत्या अप्यतिभारः, किमुतास्मद्विधस्य ? कः खलु पुरुषायुशतेनापि शक्नु- याद्विकलमस्य चरितं वर्णयितुम् ? एकदेशे तु यदि कुतूहलं वः, सज्जा वयम् । इयमधिगतकतिपयाक्षरलबलघीयसी जिह्वा कोपयोगं गमिष्यति ? भवन्तः श्रोतारः । वर्ण्यते हर्षचरितम् । किमन्यत् । अद्य तु परिणतप्रायो दिवसः । पश्चाल्लम्बमानकपिलकिरणजटाभारभास्वरो भगवान्भार्गवो राम इव समन्तपञ्चकरुधिरमहाह्रदे निमज्जति संध्यरागपटले पूषा । द्विजशिशुः । ब्रह्मस्तम्भं जगत् । पुरुषायुषेत्यादिना योग्येऽपि मयि वर्णयितरि वर्णनीयस्य भूयस्त्वम्, अल्पीयस्त्वाच्चायुषः सामास्येन वर्णनं न घटत इति प्रति- पादितम् । अत एवाह — एकदेश इति । संझा ( सज्जा ? ) वर्णनाभिमुखा इति । भवन्त इति ? न तु यादृशतादृशाः । हर्षचरितमिति । न तु यदेव किंचित् । समन्त- पञ्चकं कुरुक्षेत्रम् । तथेति एवमस्त्विति । प्रत्यपद्यन्ताङ्गीकृतवन्तः । की चाह में लोग सामर्थ्य और असामर्थ्य की बात को ध्यान में नहीं लाते । मैं समझता हूं कि दूसरे-दूसरे के गुणों में अनुराग करने वाली और अपने प्रियजन के कथामृत का पान करने के मोह में पड़ी हुई बड़े-बड़े लोगों की बुद्धि भी तत्काल विवेक को छोड़ देती है । हे आर्य, स्वयं आप ही देखें, परमाणु की भाँति मेरे जैसे बटु का हृदय कहाँ और सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त देव हर्ष का चरित कहाँ ? कुछ थोड़े से अक्षरों वाले मेरे शब्द कहाँ और देव के असंख्य गुण कहाँ ? अगर कोई सर्वज्ञ भी हो तो इसे नहीं जान सकता, और तो क्या, साक्षात् बृहस्पति भी नहीं बता सकते । सरस्वती के लिए भी यह बहुत भारी बोझ है, तो हम जैसे लोगों की क्या गणना है ? पूरे सौ वर्ष जीकर भी कौन उनके सारे चरित को सुनाने में समर्थ हो सकता है ? यदि आपका उस चरित के एकदेश में कुतूहल है तो हम सुनाने के लिए तैयार हैं । यह मेरी छोटी-सी जिह्वा, जिसने लवमात्र कुछ अक्षरों का ग्रहण किया है, किस जगह उपयोग में आएगी ? आप जैसे लोग सुनने वाले हैं । हर्ष- चरित का वर्णन करता हूँ । और क्या ? अब तो दिन ढलने लगा है । जैसे पीली जटाओं से देदीप्यमान भगवान् परशुराम ने कुरुक्षेत्र के रुधिर-सरोवर में स्नान किया था उसी प्रकार सूर्य भी अपने पीताभ किरण-समूह को लटकाते हुए संध्या की लाली में डूबते जा
तृतीय उच्छ्वासः १५१
श्वो निवेदयितास्मि' इति । सर्वे च ते 'तथा' इति प्रत्यपद्यन्त । नाति- चिरादुत्थाय संध्यामुपासितुं शोणमयासीत् । अथ मधुमदपल्लवितमालवीकपोलकोमलातपे मुकुलितेऽह्नि, कम- लिनीमीलनादिव लोहिततमे तमोलिहि रवौ लम्बमाने, रविरथ तुरग- मार्गानुसारेण यममहिष इव धावति नभसि तमसि, क्रमेण च गृहता- पसकुटीरकपटलावलम्बिषु रक्तात्तपच्छेदैः सह संहृतेषु वल्कलेषु, कलि- कल्मषमुषि मुष्णति गगनमग्निहोत्रधामधूमे, सनियमे यजमानजने मौनव्रतिनि, विहारवेलाविलोले पर्यटति पत्नीजने, विकीर्यमाणहरितश्या- माकशालिपूलिकासु दुग्धासु होमकपिलासु, हूयमाने वैतानतनूनपाति, पूतविष्टरोपविष्टे कृष्णाजिनजटिले जटिनि जपति बटुजने, ब्रह्मासनाध्या- सिनि ध्यायति योगिगणे, तालध्वनिधावमानानन्तान्तेवासिनि अलस-
अथेत्यादौ । अस्मिन्नस्मिन्सति बाणस्तयैव गोष्ठ्या तस्थाविति संबन्धः । कपोल- कोमलो गण्डसदृशः । मुकुलिते प्राप्तसंकोचे । कुटीरं जरद्गृहम् । पटलं छादनम् । विहारो वह्निसंधुक्षणमग्निहोत्रार्थम् । पूलिका वरण्डः परिमाणभेदः । तनूनपाद्वह्निः । विष्टरमासनम् तालध्वनिरङ्गुलीजः शब्दः । अन्तेवासिनः शिष्याः । श्रोत्रिये-
रहे हैं । इसलिए कल निवेदन करूँगा ।' तब सबने 'ऐसा ही' कहकर स्वीकार किया । बाण थोड़ी देर में सन्ध्योपासन के लिए शोण के तीर पर चले गए । दिन ढलते ही मधुपान करने से रक्त मालव-सुन्दरियों के कपोल की भाँति आतप कोमल हो गया । कमलिनी द्वारा आँख बंद कर लेने से मानों क्रोध से लाल होकर सूर्य लटकने लगा । अन्धकार मानों सूर्य के रथ के घोड़ों का पीछा करता हुआ यमराज के भैंसे की भाँति आकाश में दौड़ने लगा । क्रम से गृहस्थ-जीवन व्यतीत करने वाले तपस्वियों की कुटियों की छान्द पर सूखने के लिए लटकाए गए वल्कल आतप के लाल टुकड़ों के साथ बटोर लिए गए । कलि के पापों को दूर करने वाला अग्निहोत्र-गृह का धुआँ आकाश में छाने लगा । याज्ञिक लोग नियम-पूर्वक मौन होकर बैठ गए । उनकी पत्नियाँ चारों ओर अग्निहोत्र के लिए आग जोरने की तैयारी में घूमने लगीं । हरे-हरे साँवा के पुआल की ओटियाँ छींट कर होमधेनुओं का दुहना आरम्भ हो गया । यज्ञ की अग्नि में हवन होने लगा । कृष्णाजिन ओढ़े, जटा बढ़ाए बटुजन पवित्र आसन पर बैठ कर जप करने लगे । योगी लोग ब्रह्मासन जमाकर ध्यान करने लगे । ताली बजते ही बहुत से शिष्य दौड़ मारने लगे । लुहेड़ा स्वभाव वाले मूर्ख शिष्य ऋचाओं के उच्चारण
[Page Header] १५२ हर्षचरितम्
वृद्धश्रोत्रियानुमतेन गलद्ग्रन्थदण्डकोद्गारिणि संध्यां समबधारयति बठरवि- टबटुसमाजे, समुन्मज्जति च ज्योतिषि तारकाख्ये खे, प्राप्ते प्रदोषारम्भे भवनमागत्योपविष्टः स्निग्धैर्बन्धुभिश्च सार्धं तयैव गोष्ठ्या तस्थौ । नीत- प्रथमयामश्च गणपतेर्भवने परिकल्पितं शयनीयमसेवत । इतरेषां तु सर्वेषां निमीलितदृशामप्यनुपजातनिद्राणां कमलवनानामिव सूर्योदयं प्रतिपालयतां कुतूहलेन कथमपि सा क्षपा क्षयमगच्छत् । अथ यामिन्यास्तुर्ये यामे प्रतिबुद्धः स एव बन्दी श्लोकद्वयमगायन्— 'पश्चादङ्घ्रि प्रसार्य त्रिकनतिविततं द्राघयित्वाङ्गमुच्चै- रासज्याभुग्नकण्ठो मुखमुरसि सटा धूलिधूम्रा विधूय । घासग्रासाभिलाषादनवरतचलत्प्रोथतुण्डस्तुरङ्गो मन्दं शब्दायमानो विलिखति शयनादुत्थितः क्ष्मा खुरेण ॥५॥ वेदोपाध्यायः । तदनुमतेन संध्यां स संधारयति । वदनन्यग्रत्वाद्गलतो विस्मरतः । बन्धमाने व्यग्रत्वादङ्गलन्ति । विस्मरन्तं ग्रन्थदण्डकं ऋग्गणं उद्गिरति यस्तस्मिन् । बठरा मूर्खाः । विटा भुजङ्गप्रायाः । बटवो बालाश्च। गृहश्रोत्रियैर्बालाः संध्यावन्दनाय प्रवर्त्यन्ते निर्विवेकत्वात् । तुर्यश्चतुर्थः । त्रिकं पृष्ठकटीसंधिः । द्राघयित्वा दीर्घतरीकृत्या । आभुग्नो नमितः कण्ठो यस्य तत् । मुखमुरसि । आसज्य कृत्वा । धूम्रा धूसराः । प्रतानस्यो- में मटक जाते थे, उनको आलसी वैदिक संध्यावंदन का नियम सिखाता था। धीरे-धीरे आकाश में तारे उगने लगे । शाम होने लगा तो बाण घर आ गया और वहाँ भी प्रेमी बांधवों के साथ गोष्ठी का आनन्द लेने लगा । एक पहर रात बिता कर गणपति के भवन में बिछी हुई शय्या पर सो रहा । दूसरे सब लोगों ने आँखें बंद कर लीं मगर नींद नहीं आई । जैसे कमल के वन रात भर सूर्योदय की प्रतीक्षा करते हैं उसी प्रकार वह रात कुतूहल के कारण किसी-किसी प्रकार करवट बदल-बदल कर बीती । रात के चौथे पहर में बंदी उठा और उसने दो श्लोकों का गान किया— घोड़ा सोकर उठ गया, और वह पिछाड़ के पैरों को तान, पीठ की रीढ़ गढ़ा, अपने अङ्गों को जोर से फैला, गर्दन झुका, मुँह को छाती में लगा, धूल से मटमैले अयाल को झाड़, घास के कौर लेने की इच्छा से हमेशा अपनी थुथुन को लुपलुपाता हुआ और मंद मंद घुरघुराता हुआ खुरों से जमीन कुरेद रहा है ॥ ५ ॥
तृतीय उच्छ्वासः १५३ कुर्वन्नामुग्नपृष्ठो मुखनिकटकटिः कंधरामातिरश्चीं लोलेनाहन्यमानं तुहिनकणमुचा चञ्चता केसरेण । निद्राकण्डूकषायं कषति निबिडितश्रोत्रशुक्तिस्तुरङ्ग- स्त्वङ्गत्पक्ष्मग्रलग्नप्रतनुबुसकणं कोणमक्षणः खुरेण ॥ ६ ॥ बाणस्तु तच्छ्रुत्वा समुत्सृज्य निद्रामुत्थाय प्रक्षाल्य वदनमुपास्य च भगवतीं संध्यामुदिते च भगवति सवितरि गृहीतताम्बूलस्तत्रैवातिष्ठत् । अत्रान्तरे सर्वेऽस्य ज्ञातयः समाजग्मुः, परिवार्य चासांचक्रिरे । असा- वपि पूर्वोद्घातेन विदिताभिप्रायस्तेषां पुरो हर्षचरितं कथयितुमारेभे— श्रूयताम्—अस्ति पुण्यकृतामधिवासो वासवावास इव वसुधामव- तीर्णः सततमसंकीर्णवर्णव्यवहारस्थितिः कृतयुगव्यवस्थः, स्थलकमल- बहलतया पोत्रोन्मूल्यमानमृणालैरुद्गीतमेदिनीसारगुणैरिव कृतमधुकरको- परि प्रोथः प्रतानमुत्तरोष्ठमध्यम् । 'वक्रास्ये वदनं तुण्डमाननं लपनं मुखम्' । तुहिनमवश्यायः । केसराणि ललाटतटस्थाः केशाः, अश्वकृकाटिकाालम्बनः केश- पाशो वा । कषायमापिङ्गलम् । त्वङ्गदुच्चम् । कोणं प्रान्तम् । उद्घातः कथाप्रस्तावः । अस्तीत्यादौ । श्रीकण्ठनामा जनपदोऽस्तीति संबन्धः । पुण्यकृतो देवा अपि । अधिवासो वसतिः । वासवावासः स्वर्गः । पोत्रं हलमुखम् । सारा उत्कृष्टाः । जिसके कान की सीपी भरी हुई है ऐसा घोड़ा अपनी पीठ सिकोड़, मुँह के पास कमर को ला और ग्रीवा को बिल्कुल टेढ़ी करके आँख के कोने को खुर से खुजला रहा है। अपनी चमकीली चंचल अयाल से पानी के फुहारे उड़ाता हुआ मुँह पर झार रहा है। उसकी आँख निद्रा के आवेग से लाल हो गई है। आँख की पपनियों में भूसे की खर चिपक गई है ॥ ६ ॥ श्लोकों को सुनकर बाण नींद छोड़ उठा और मुँह धो, भगवती संध्या की उपासना कर भगवान् सूर्य के उदित होने पर मुँह में पान का बीड़ा रख वही बैठा। इसी बीच उसके सब भाई-बन्धु जुट आए और घेर कर बैठ गए। बाण ने भी पहले के प्रस्ताव से उनका अभिप्राय समझ, उनके सामने हर्षचरित कहना आरम्भ किया— सुनिए—श्रीकण्ठ नाम का एक था जनपद । वह मानों पृथिवी पर उतरा हुआ पुण्य- शाली लोगों का निवास स्वर्ग था। वहाँ ब्राह्मण आदि वर्णों की मर्यादा एक में एक घुली- मिली न थी, मानों वहाँ सतयुग की व्यवस्था हो गई हो । हल से वहाँ खेत जोते जा रहे थे, स्थलकमलों के अधिक होने के कारण हल के फार से मृणाल उखाड़े जाते थे और कमलों में बैठे हुए भौंरे जब गुञ्जारने लगते तो लगता कि पृथिवी के उत्कृष्ट गुणों का