हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८ ) पर हिमालय की तराइयों में आखेट के लिये रुक जाता है। जब तक राज्यवर्धन परदेश से नहीं लौटा था, इसी बीच प्रभाकरवर्धन की मृत्यु हो गई और माता यशोवती भी न रहीं। हर्ष ने राज्यवर्धन के पास खबर भिजवा दी। इधर हर्ष के मन में बड़ी भारी चिन्ता यह होने लगी कि पिताजी का समाचार सुनकर बड़े भैया (आर्य) भी कहीं बुद्ध की तरह आचरण न कर बैठें। कहीं राजर्षि राज्यवर्धन आश्रम में प्रविष्ट न हो जायें ? कहीं वह पुरुष-सिंह किसी गुफा में न चला जाय। अनाथ पृथिवी को देखकर कहीं निरन्तर अश्रुधारा प्रवाहित न करने लगें। प्रथम बार इस आपत्ति से विह्वल होकर आत्मचिन्तन में न लग जायें। संसार को अनित्य समझकर पास आती हुई राज्यलक्ष्मी से विरक्त न हो जायें। कहीं दुःखज्वाला का शमन करने के लिये जल में न डूब जायें। यहाँ लौटने पर राजाओं के कहने पर पराङ्मुख न हो जायें। इस प्रकार हर्ष अपने मन में कल्पना करते हुए राज्यवर्धन की बाट देखते रहे। भ्रातृप्रेम से अभिभूत हर्ष के मन के ये भाव राज्यवर्धन के शम-प्रधान व्यक्तित्व की ओर संकेत करते हैं। लगता है राज्यवर्धन आरम्भ से ही भगवान् बुद्ध के धर्म से आस्थावान् था। जैसा कि एक ताम्रपत्र के अनुसार उसे परम- सौगत भी कहा गया है। हर्ष को भी उपर्युक्त चिन्ता में भी राज्यवर्धन में विरक्त होने के पश्चात् बुद्ध के जीवन की झलक मिलती है। हर्ष को यह सन्देह था कि बुद्ध के समान वे भी कहीं न चले जायें। पितृ-शोक से अभिभूत होकर राज्यवर्धन जब लौटा तब यही घटना घटी। हर्ष से उसने कहा—'तुम राज्यभार ग्रहण करो, मैंने आज शस्त्र छोड़ा।' और तलवार हाथ से फेंक दी। राज्यवर्धन के इस कथन में उसकी निःस्पृहता, पितृप्रेम, भ्रातृप्रेम आदि समस्त सद्प्रवृत्तियाँ एक साथ उमड़ पड़ीं हैं। इसी अवसर पर एक विचित्र घटना घट जाती है। एक परिचारक ने आकर खबर दी कि सम्राट् के मरने की खबर सुनकर दुरात्मा मालव- राज ने ग्रहवर्मा को जान से मार डाला और राज्यश्री को कान्यकुब्ज के कारावास में डाल दिया। इस समाचार से तत्काल राज्यवर्धन का शोक जाता रहा, उसके स्थान पर क्रोध प्रतिष्ठित हो गया। उसने हर्ष से कहा—'तुम राज्य सँभालो, मैं मालवराज के कुल का नाश करने चला।' हर्ष ने जब यह कहा कि 'आर्य के प्रसाद से पहले भी मैं कभी वञ्चित न रहा। कृपाकर मुझे भी साथ ले चलें।' तो राज्यवर्धन ने कहा—'तुम ठहरो, मुझे अकेले ही शत्रु का नाश करने दो।' यह कहकर उसने उसी दिन शत्रु पर धावा बोल दिया। राज्यवर्धन मालवराज की सेना को खेल ही खेल में जीत लेने पर भी गौड़ाधिप के कुचक्र से मारा जाता है। हर्ष के हृदय में राज्यवर्धन के प्रति अपार स्नेह था। उसने उसके मारे जाने का समाचार सुनकर उसकी चरण-रज का स्पर्श करके प्रतिज्ञा की—'कुद्ध